पीतल-काँसा छोड़ के,
ताँबा लोटा भाय।
अमरित कस पानी लगय,
तन-मन सब हरियाय।।
बिना धुरी लोटा असन,
झन बनिहव इंसान।
येती-ओती झन घुमर,
नइ मिलही पहिचान।।
मत बन रहव गिलास सब,
लोटा बने रहाव।
प्यास बुझावव चार के,
जिनगी सुफल बनाव।।