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शुक्रवार, 14 मई 2021

आवव मोर गाँव मा

आवव मोर गाँव मा


बालोद जिला के डौंडीलोहारा ब्लाक मा मुख्यालय ले तीन किलोमीटर पश्चिम में बुड़ती डाहर जग परसिध खरखरा मोहदीपाट बाँध के तीर मा  गाँव धनगांव बसे हे। साढ़े चार सौ के छानी वाले गाँव मा कच्चा अउ पक्का घर हे जेहा दू हजार ले जादा जनसंख्या के अबादी मा पसरे हे।गाँव के बीचोबीच खरखरा नहर आठोकाल बारो महिना गंगा बरोबर बोहावत हे।
*धनगांव के नामकरन*

सियानन मन बताथे कि धनगांव के नाँव धनगांव काबर परिस कहिके।पहिली धनगांव मा भगवान अउ गाँव के देवधामी के आशीर्वाद ले अन्नधन के भंडार अड़बड़ राहय ।धन धान्य के कमती नंइ होय।सबोबर धन के पूरती होवत रिहिस हे। तेकर सेती धनगांव नाँव पड़िस।
*बिकटराव बाबा*
गाँव के मड़ियाकट्टा बाट मा गाँव के बांध घलो हे जेखर नाँव धनगांव झरझरा बांध हे।जेकर गाँव के सबले बड़का मानता देवता बिकटराव के धाम हे। बिकटराव बाबा सबके आस ल पुरोवत आज पूरा गाँव ल अपन आशीर्वाद ले समरीध करत आवत हे। गाँव मा आठोकाल बारोमहिना इतवार के दिन इतवारी तिहार मानथे ए दिन पूरा काम धाम बंद रथे।
*शीतला मंदिर*
 सब गाँव मा एकठन शीतला मंदिर हे फेर धनगाँव मा दू ठन शीतला मंदिर हे एकठन गाँव भीतरी अउ एकठन गाँव ले एक किलोमीटर के दूरी मा। जिंहा नवरात मा जोत जँवारा  के माध्यम ले माता जी ला मनाथे।माता ह घलो अपन भगत मनके आस ला पूरा करथे ।ठाकुर देव,सियार देवता भुमियार देवता अउ जम्मो मानता देवता के आशीर्वाद ले गाँव ह सुख समरीध हे।
*हनुमान मंदिर*

गाँव के बीच गली मा सांस्कृतिक कला मंच करा रामभक्त हनुमान के मंदिर हे।जिहा पुजारी बाबा ह गाँव वाला के सहयोग ले पूजा पाठ आज तकले करत आवत हे।गाँव के सुख दुख के बात ,गाँव के सारजनिक बैठका इही मंदिर के सम्हेरा मा करे जाथे।
*शिव मंदिर*

गाँव के बीचो बीच बोहावत खरखरा नहर के पार मा आजू बाजू दूठन शिवमंदिर हे जिंहा हर शिवरात्रि मा पूजा पाठ करके गाँव के जम्मो नर नारी भाई बहिनी मन अपन मनोकामना ला पूरा करथे।
*साँहड़ा देव*

गाँव मा दू ठन गौठान हे।जिंहा लगभग 700 गाय बछरू बइला ह सकलाथे। एखर रकछा करे खातिर गौठान मा साँहड़ादेव बिराजे हे ।राऊत मन जेकर पूजा पाठ करके गौधन ला बढ़ाय बर ।कोनो अलहन के सामना करेबर मत पड़े कहिके मनोकामना करथे।अउ आशीर्वाद लेथे।
*मातर मढ़ई*

देवारी तिहार लक्ष्मी पूजा गोवर्धन पूजा के बिहान भाई दूज के दिन पूरा गाँव भर के मन मिलके मातर मढ़ई मनाथे।गाँव के सब देवता मनके पूजा पाठ करके गौठान मा गाय बछरू ला खिचरी भात खवाथे। एखर आनंद ले बर दूर दराज के गाँव के मनखे मन देखेबर भारी संख्या मा सकलाथे।सब झन ला परसादी घलो बाँटे जाथे।अउ रातकुन सबझन के स्वस्थ मनरंजन बर नाचा के आयोजन घलो करे जाथे।

             ए परकार ले धनगांव के सब नारी लइका सियान जवान मितान मन सुख दुख सहिके एक दूसर ला सहयोग करत गाँव के संस्कृति अउ परंपरा ला मानत हे।
लेख:-
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडी लोहारा 
बालोद छत्तीसगढ़

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

नेंग जोग

बिहाव मा मड़़वा के आगू चुल्हा अउ सील बनाय के परिपेक्ष मा थोरिक मतिअनुसार जानकारी....

मनखे के जनम ले मरन तक सोला संस्कार होथे।जेमा बिहाव संस्कार भी शामिल हे।वइसे तो बिहाव मा घलो बड़ाकन नेंग होथे जइसे बहु खोजइ ले धरम टीकावन अउ बेटी बिदाई अउ आनी बानी के।त बात होत हे मड़वा के आगू मा चुल्हा अउ सील के। सियान मन कथे कि नोनी अउ बाबू मन के जब बिहाव मढ़ाथे त चुलमाटी लानके यथा स्थान जइसे चुलघर मड़़वा ठऊर आदि जगा म रखे जाथे। नोनी बाबू मन के जब बिहाव होथे त ओमन अपन कँँवारा पन ल छोड़ के घरू (गृहस्थ)जिनगी म कदम रखथे । गृहस्थ ल चलाय बर घर मा चुल्हा के जलना जरूरी हे। अउ चुल्हा कब जलही जब दुनों जुग जोड़ी के मन,तालमेल,आपसी सूझबूझ ,सांठगांठ ह बने रही।रही बात सील के त ओकरो कारण हे कथे सियान मन कि सील ह सबो मसाला ल पीस के एक कर देथे ।अउ साग के सवाद ल बढ़िहा बनाथे। ओइसने ढंग ले।जुग जोड़ी के घर मा सबरदिन सुख के दारभात चुल्हा म चुरत राहय अउ बढ़िहा गुरतुर मसलहा साग पान खाके जिनगी जुग जोड़ी कमावत खावत राहय। मोर मतिअनुसाआर

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

परिचय

संक्षिप्त परिचय
नाम तोषन कुमार चुरेन्द्र साहित्यिक नाम "दिनकर"। पिता श्री जोहर लाल चुरेन्द्र माता श्रीमती कैलेन्द्री बाई चुरेन्द्र ।ग्राम धनगांव में मेरा जन्म 28 जून 1984 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। चार भाई बहनों में सबसे बड़ा हूं। पत्नी श्रीमती चित्ररेखा चुरेन्द्र पुत्र डुमेश कुमार चुरेन्द्र ।मेरी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम धनगांव में ही हुई ।हायर सेकेंडरी की शिक्षा डौंडीलोहारा में हुई। माताजी के देहावसान पश्चात परिवारिक जिम्मेदारी के कारण शादी हो गयी तो आगे की पढ़ाई नहीं कर पाया।इग्नू के माध्यम से डी एड की परीक्षा उत्तीर्ण की। सत्र 2008 से लेकर 2019- 20 तक सरस्वती शिशु मंदिर डौंडीलोहारा आचार्य के पद पर दायित्व निर्वहन करता रहा। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में विजयी होकर आज सरपंच पद का दायित्व निर्वहन कर रहा हूं साहित्य के क्षेत्र में मधुर साहित्य परिषद इकाई डौंडीलोहारा जिला बालोद छत्तीसगढ़ के उपाध्यक्ष पद पर कार्य कर रहा हूं।

छत्तीसगढ़ में बिहाव के परंपरा*

*छत्तीसगढ़ में बिहाव के परंपरा* 

                मनखे के जिनगी मा सोला ठन संस्कार होथे जेमां नाम रखई संस्कार से लेके अंत्येष्टि संस्कार तक के माने जाथे। बात अगर देखन बिहाव संस्कार के जेमा दू परिवार, दू कुल, दू गांव ,दू सियार, हर आपस में मिल जाथे। बिहाव संपन्न करे बर बड़कन  बिधि -बिधान करे जाथे जेकर कुछ अंश आप सब के आघू परोसत हँव:-

*लड़की के खोज*
               बिहाव करे के पहिली सियानन मन उदीम करथे कि ऐसो हमन अपन बेटा या बेटी के बिहाव करबोन। बेटा वाले टुरी खोजे बर निकलथे, बेटी वाले मन घलक सगा के अगोरा करत रथे। 

*बहु चिन्हई* :- 
                लड़का पक्ष ला लड़की मिल जाथे । एक दूसर के चिन पहिचान के बाद एक बंधना करे जाथे जेला बहु चिन्हई कहे  जाथे। जेगर ले अब वह लड़की ला कौनौं दूसरा सगा ला नहीं दिखाय जाय। ये परकार ले बिहाव के पहिली नेंग बहु चिन्हई से होथे।

*सगाई* :- 
                बिहाव तिथि के तीर मा  सगाई के कार्यक्रम रखे जाथे। जेमा लड़का पक्ष और लड़की पक्ष के डहर ले नरिहरफल  लायची दाना अउ बड़कन परकार के मेवा मिष्ठान के आदान प्रदान करके लड़का पक्ष द्वारा  लड़की पक्ष मुँदरी भेंट कर जाथे। एक दूसरा ल पहनाए जाते ये कार्यक्रम निपटे के बाद जम्मो सगासोदर ल यथाशक्ति तथा भक्ति भोजन प्रसादी करवाय  जाथे।

*बिहाव के दिन बादर* :- 
                एकर बाद दिन तिथि धरई के काम शुरू हो जाथे। बड़े-बड़े सियान मन मिलकर बिहाव ला कब मढ़ाना है कहिके शुभ मुहूरत निकाल के लड़का पक्ष के डहर ले लड़की पक्ष ला संदेश दिए जाथे।ओकर बाद फेर  लड़का और लड़का पक्ष कारट छपवा के अपन - अपन पूरा परिवार, सगा सोदार ल बिहाव के नेवता दे जाथे।
जइसे-तइसे बिहाव के दिन बादर आथे।तब सब सदस्य मन सकलाके ढेरहीन सुआसीन मिलके  बिहाव के नेंग नता ला शुरू करथे।

 *बिहाव के पहिली दिन* :-
               बिहाव मा ढेरहीन ढेरहा के विशेष योगदान रथे। जिखर हाथ ले बिहाव के नेंग नता सुरू से अंत तक ईखर भूमिका रथे। बिहाव के दिन ले सबले पहिली गांव की पतिहा भाई मन डारा छाय बर जाथे, जेला मंडप आच्छादन कहे जाथे। ओकर बाद सांझ के समय ढेरहीन हुआ सीन मन ढेरहा सन में बाजा गाजा के संग मडवा पूजन, चुल माटी लानेबर जाथे ।त *इही गीत गाथे:- तोला माटी कोड़ेन नंइ आवय मीत धीरे धीरे...तोला पर्रा बोहे नंइ आवय मीत धीरे धीरे...* चुलमाटी लाके मड़वा  के चारो मुड़ा ला सजाथे। सांझ के पांच सात झन मिलके मड़वा मा चार ठन दीया बार के कुँआरी धागा ले बंधना करत चारो दिशा ला चारों धाम के देवता मनला नेवता देके मंडवा मा बलाथे।गाँव के शीतला माता ल घलक करसा अऊ कच्चा हरदी भेंट करके बिहाव मा नेवता देथे।  खाना पीना खाए के बाद रात कुन घर के भीतरी मा दूल्हा दुल्हिन के मुड़ी मा मँऊरर बांध के चोर तेल चढ़ाय  जाथे। दूल्हा अउ ढेरहा दोनों मिलकर मडवा मां भीतर ले करसा  मड़वा मा लाथे। तहाँन तेल हरदी चढ़ाई शुरू होथे। त *इही गीत गाथे :- एक तेल चढ़गे दाई तोर जनामन मड़वा मा दुलरू तोर बदन कुमलाय...*  *झुलना गीत आमा मँऊरे बोईर झंऊरे बोईर झंऊरे...नदी नरवा ल छ़ोडके कुआँ म तँऊरे...* तेकर बाद *इही दोहा जय जननी ज्वाला मुखी सकल हरन भुइ भार ,लजजा मोरे राखो माता भरे सभा दरबार...* के संग  मैंन नाचा आणी बाणी के दोहा ददरिया करमा पंथी गाना गा गा के मैंन नाचना शुरू हो जाथे।दूल्हा बाबू के हाथ गोड़ मा मनमाड़े हरदी चुपरथे। *हाथ गोड़ म हरदी चुपरे के समय इही गीत कथे :- कोन तोरे लाने दूलरू पथरा के हरदी बने.. कोने तोरे बिरही सजाय चंदन रूख आय सजन घर मड़वा गड़े...* अव हाथ मा कंकण नहडोरी घलक बांधथे।

 *दूसर दिन* :-
                बिहान दिन दूल्हा राजा ला नउहा खोरा के बरतिया जाए बर नवा नवा कपड़ा लत्ता पहिना के तइयार करे जाथे। जेमा  हमर  समाज के एक ठन नियम हे कि दूल्हा ला सफेद कमीज अउ धोति पहना के अउ तेंदू सार के लउठी धराके बरतिया जाए बर तइयार करथे। बरतिया घर ले निकल जाथे ।

*बारात स्वागत* :-
               बारात निकलके दुल्हिन के गाँव पहुंच जाथे। ऊँहां जाए के बाद दूल्हा बाबू दुल्हिन के घर मड़वा छुए बर जाथे। तो बढ़िया धूमधाम के साथ स्वागत करत दुल्हिन के कका बाप जम्मो भाई मन मिल के दूल्हा राजा के स्वागत करथे। दूल्हा राजा दुल्हिन के घर मुहाटी म जाथे ।तब दुल्हिन पक्ष के ढेरहीन सुहासिन मन  मुहाटी में घघरा मा पानी लेके खड़े रथे। जेमा  दुल्हा राजा हा  10 के सिक्का नंइते 5 के सिक्का डालथे अउ पर्रा ला तेंदूसार के लउठी मा 7 घाँव ले धीरे-धीरे ठठाथे। तेकर बाद दूल्हा राजा  दुल्हिन पक्ष से दुल्हिन के काकी महतारी मन अपन तरफ से फुल पैंट कमीज घड़ी उपहार में दे थे। 

*लाल भाजी खवइ* :-
               यह सब चीज होय के बाद दूल्हा राजा ला लाल भाजी खवा के नियम हे । त जेवनास डेरा मा ढेरहीन सुआसीन मन जाथे जिहाँ दूल्हा के सारी मन, ढेरहीन सुआसीन मन मिलके लाल भाजी खवाय बर जाथे त इही ददरिया गाथे  *दर दर दर दर आए बरतिया कोठा मा ओईलाई रे भूख लगीस तहाने पैरा भूसा खाई रे*  अईसन ढंग ले भडौनी गीत आनंद लेथे।अऊ लड़की पक्ष में लड़की के  तेल हरदी कंकण नहडोरी के बाद नहवाथे।

*लगिन भाँवर* :-
               अऊ सांझ की बढ़िया शुभ मुहूरत देखके नवा नवा साज सिंगार के संगे दुल्हा अउ दुल्हिन के लगिन चाँऊर संग लगिन भाँवर परथे।तेखर बाद दाई ददा मन अपन हाथ ले कन्यादान करथे। *त इही गीत आगू मा गाथे...तोरे धरम ले धरम हे वो आओ मोरे दाई तीनों तिलीक जीत डारे ओ...*  सेन्दूरदान होय के बाद ममा नंइते जेठ के डहर ले मुड़ी ढंकइ के नेंग पूरा करे जाथे। ढेरहीन सुवासीन.मन टिकान देव इय्या मन ल *इही गीत सुनाके का कथे :- भैंसी के दूध भैंसाईन ओ आगा मोरे ममा चना खायबर पैसा देबे गा...*  पूरा परिवार मिलके अपन इच्छा मुताबिक उपहार, भेंट करथे अउ दूल्हा- दुल्हिन ला  आशीर्वाद देथे।पूरा टिकावन होय के बाद  एक साथ हिल मिल के प्रीतिभोज कराए जाथे।

*बेटी बिदाई* :- सब जन अंतिम समय में दुल्हिन ला दूल्हा सन में जोरन धरा के बेटी ला विदा करथे *त इही गीत कथे :- जा दूलौरीन बेटी तै मईके के सुध झन लमाबे...* बहिनी के बिदा करत घलक भाई ह कल्हरत नानकुन गुड़ खवाके बहिनी के मुँह ल मीठ करथे। बेटी के विदा हो जाथे। सीधा दूल्हा और दुल्हिन ला लेके अपन गांव आजथे। तब गांव के सियान मन सदस्य मन दूल्हा दुल्हिन के बाजा गाजा के साथ पटाखा फोड़त स्वागत करथे। माई घर में जाके माता रानी के, अपन पुरखा के  देवी देवता के आशीर्वाद लेथे।बिहाव घर म जाय के बाद जम्मो परवार मन दूल्हा दुल्हिन के मँऊर सौंप के आशीष देथे।

*चवथिया स्वागत* :-
               दुल्हिन पक्ष के पूरा परिवार मन अपन बेटी के डेहरी ल देखे खातिर अउ बेटी ल संग म लेगे बर चवथिया बनके आथे। बाजा गाजा के साथ बने- बने स्वागत सत्कार घलक होथे। समधी ह समधी ल दूबी चाऊँर खोचके समधी भेंट करथे। समधीन ह समधीन ल दूबी चाऊँर खोचके समधीन भेंट करथे। अऊ एक दूसर के हाथ ल धरके घर कोती आएल लगथे।

*धरम टीकावन* :-
                सांझ के समय दुल्हा पक्ष के जम्मो परिवार मध धर्म टिकावन के अवसर मा अउ सगा सोदर मन अपनी इच्छा अनुसार दूल्हा- दुल्हिन ला उपहार भेंट करके आशीर्वाद देथे । फेर अंत में सबो सगा संबंधी मन ला प्रीतिभोज कराय जाथे। 

              ये परकार ले हमर छत्तीसगढ़ में बिहाव की संस्कृति परंपरा साफ व सुंदर रूप से संचालित करे जाथे।

लेख:- 
तोषण कुमार दिनकर
डौंडी लोहारा बालोद
छत्तीसगढ़ 491771
च.भा. क्र.6267538036

सोमवार, 29 जुलाई 2019

आचार्य जी


आचार्य जी....

कितना सम्मानजनक शब्द है,किंतु शब्दार्थ अथाह ।जिसे समझ पाना हर किसी के लिए संभव नही है। जिन्हे इनकी समझ है वह स्वयं ब्रह्म से कम नही है। कोई भी व्यक्ति आचार्य तभी हो सकता है जब वह सही और गलत का अंतर स्पष्ट करते हुए भैय्या बहनों के अंतकरण में अपनी अमिट छाप छोड़ सके। जो अपने कर्मो के द्वारा अपने पूर्वजों ,महापुरूषों से प्रेरणा पाकर अपने अनुशरणकर्ताओं का पथप्रदर्शक बनकर संबल व प्रोत्साहित करे। आचार्य को मन ,शरीर,बुद्धि ,नैतिक व आध्यत्म दृष्टि से परिपक्व होने की आवाश्यकता है जो राष्ट्र के निर्माण में सहयोगी बन सके।जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाने के लिए अनेक कठिनाईयों का सामना करते हुए उसका निर्माण करता है ठीक वैसे ही आचार्य भी अपने भैय्या बहनों के सर्वागिण विकास के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयोग नवाचार आदि प्रतिपादित करता है। श्री रामचरित्र मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास जी ने अपनी धर्मपत्नी से प्रेरित होकर महान ग्रंथ की रचना की।जो आज हम सबके लिए प्रेरणादायी है।अगर हम अपने आने वाली पीढ़ी, समाज, राष्ट्र और विश्व व भैय्या बहनों का कल्याण करना चाहते हैं प्रेरणा बनना चाहते हैं   तो हमें अपने दुर्गुणो का त्यागकर एक अच्छे आचरण करने वाला आचार्य बनना होगा।

रविवार, 18 दिसंबर 2016

परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

मेरा लेख आप सबको समर्पित

परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

एक गरीब लड़का है सोनू । जो अपने पिता जी के होटल मे दिन रात काम करता है। उसके मन मे पढने की तीव्र इच्छा थी। लेकिनस परिवार की स्थिति को देखकर अपनी इच्छा अपने मन के अंदर ही दबाकर रखा रहता। क्या करता बेचारा पिताजी एक पैर से अपाहिज होटल का गल्ला सम्हालता । माताजी और छोटी बहन सोनिया होटल के काम मे हाथ बटाती। इस तरह उसका जीवन चल रहा था।
एक दिन एक गुरूजी होटल मे चाय पीने आए ।चाय का आर्डर देते हुए पेपर पढने लगा । सोनू चाय लाकर गुरूजी को देकर वहीं खडा हो देखने लगा । जिस पर लिखा था " तेरह वर्ष का बालक पढाई स्तर पर जिला में अव्वल आया है।"इसे देखकर सोनू दुखी हो गया । सोनू को दुखी देखकर गुरूजी कहने लगा -अरे सोनू आज दुखी क्यों है ?इतना उदास क्यों है? तब सोनू कहता है-"काश !वो अव्वल आने वाला बालक मैं होता। इस बात को गुरूजी सुनकर चौंक जाता है और सोनू से पूछता है । भला तू ऐसा क्यों कह रहा है? तब सोनू अपनी सारी व्यथा गुरूजी के सामने रख देता है। सारी सच्चाई जानने के बाद गुरूजी सोनू के माता पिता को समझाईश देते हुए कहते है-"अपने बच्चे सोनू और सोनिया को पढने के लिए स्कूल जाने दो ।पढेंगे लिखेंगे तुम दोनो का नाम रौशन करेंगे। इस तरह होटल मे काम करने से इनका जीवन यहीं सीमित हो जाएगा। मैं इन दोनों की पढाई का जिम्मा लेता हूं। इनके बदले मजदूर लगाकर अपना होटल सम्हलना । गुरूजी का उपकार मानते हुए अगले दिन सोनू और सोनिया को स्कूल भेजने लगे।
सोनू और सोनिया की पढाई रंग लाने लगी ।हमेशा अव्वल आने लगे। माता पिता और गुरूजी भी खुश होने लगे।
गांव की पढाई खत्म होने के बाद सोनू और सोनिया को शहर के अच्छे कालेज मे दाखिला मिल गया ।दोनों भाई बहन मन लगाकर पढने लगे। समय ने ऐसा रंग लाया दोनो एक बार फिर अव्वरल दर्जे से पास हो गये। दोनो भाई बहन बहुत खुश होने लगे ।इस खुशी को मनाने वे दोनो अपने गांव गाव आना चाह रहे थे। फिर क्या था ।एक दोनो भाई बहन अपने गांव आये और सीधा अपने माता पिता के पास होटल में पहुंचकर चरण स्पर्श किए और सीधा एक ही सवाल सोनू ने पूछा-"क्या ?वह गुरूजी आज भी हमारे होटल में चाय पीने आते है । सोनू के इस सवाल को सुनकर बीती बातों को सोंचते हुए माता पिता की आँखों में आँसू आ जाता है ।उसे पोछते हुए बड़े सरल भाव से अपने बच्चों से कहते है -"हां बेटा !
उसी समय वह गुरूजी होटल में आकर चाय का आर्डर देते हुए पेपर पढने लग जाता है तब सोनू अपने हाथ से गुरूजी को चाय सौंपकर प्रणाम करता है । तब गुरुजी पूछने लगता है -"अरे भाई तुम कौन हो ?और मेरा पैर क्यो छू रहे हो? तब सोनू अपनी पूरी कहानी बताता है और धन्यवाद देता है-"आज अगर हम यहाँ पर इतनी पढाई लिखाई किये है तो सिर्फ आपकी ही वजह से किये । गुरूजी उन बच्चों को आशीर्वाद देते हुए अपने घर की ओर चल पडते है

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आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा

रविवार, 20 नवंबर 2016

सूरोती के दीया


कातिक अमावस के रात दाई लछमी के पूजा करे के साथ साथ हम छत्तीसगढ़िहा मन देवारी ल सूरोती के परब के रूप म मनाथन।गोंड भाई मन स मिल के गौरा गौरी ल घलक मनाथन । नवा चंऊर के पिसान के फरा रोटी अऊ दीया जलाथन फेर आज हमन चकाचौंध के दुनिया म भुलाके अपन संस्कृति धरोहर अऊ पुरखा मन के गोठ बात ल बिसरत जात हन येहा हमर मन बर बड़ा दुख के बात आय । मैं तो ठेठ जंगलिहा धनगांव के रहवासी हंव ।हमर कोती नंवा पिसान के दीया बनाके अपन आरा पारा के देव धामी के जगा कोठार खलिहान आदि म दीपदान करके अंजोर करे के प्रयास करथन।। आप सबो संगी संगवारी मन ले बिनती हे माटी के दीया के संग संग नवा पिसान के दीया के दीपदान करव।
आप ल पुनः धनतेरस नरकचौदस लछमी पूजा गोवरधनपूजा अऊ भाईदूज के खालाखूझर बधई अउ शुभकामना

आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

एक गांव

एक गांव जहाँ एक मुखिया रहता था जो सर्व गुण संपन्न था सभी उनका आदर सम्मान करते थे। हर जगह उनकी पूछ परख थी । लेकिन खुद मुखिया के घर मे हमेशा कलह परेशानियों का बाज़ार लगा हुआ था। दुनिया के लिए वह बहुत ही अच्छा इंसान साबित हुआ लेकिन अपने घर के लिए ढोल के भीतर पोल वाली कहावत को साबित करता । लोगों के समक्ष बड़ी बड़ी बात रखना लेकिन जब खुद के घर की बारी आती तो पांच कदम पीछे। मुखिया से सारा घर परेशान था। उनसे कोई भी खुश न था। और अंत मे वह मुखिया अपने पूरे परिवार के बिखरने का कारन बना गया । कोई भी उसके कार्य करने के तरीके से खुश नही थे क्यों कि वह मुखिया हर जगह अपनी ही मनमानी चलाता था । परिवार के सब सदस्य उनसे दुखी थे। लेकिन कर भी क्या सकते थे उसके खिलाफ जाने की किसी भी सदस्य में हिम्मत भी न थी । एक था जो मुखिया जी को झकझोर देता लेकिन घर के बाकी सदस्य उनकों रोक देते थे। अब क्या था गाड़ी जैसे तैसे चल रही है।
आपके विचार से क्या लगता है ?
गलती किसकी है ?

(यह वर्तमान मे संचालित संस्था की सत्य घटना है जोआज घटित हो रही है जिसे मैने भूत काल मे परिवर्तित करके लिखा है)

बुधवार, 13 जुलाई 2016

दाई के हांथ के भात

दाई के हांथ के भात... 'मातृ हस्तेन भोजनम्' जेकर सरल अरथ दाई के हांथ ले बनाय भात। नाननान जब रेहेन त दाई के हांथ ले सबझन भात खाए हन। फेर आज एहा धीरे धीरे बदलत हावय। आज हमन होटल बासा के भात साग ल बने रथे कहिके मंगा मंगा के घर म खाथन अउ अपन सरीर ल बहिरी के खाना ल खा खा के बिगाड डरथन। आजकल फेशन के दुनिया मा देखथन त मिलथे महतारी मन अपन ल इक लइका मन बर खाना बनाए के घलक टेम नी रहय इसकूल के टिफिन म होटल ले मंगा के जोर देथे। संझौती बेरा घर म नासता पानी बनाए ल झन परे कहिके लइका ल पइसा धरा देथे जा बेटा गुपचुप वुपचुप खा लेबे। आज भागम भाग के दुनिया म घर के खान पान अउ सब जीनिस ह नंदात हे। महतारी के हाथ ले बने भात साग नासता पानी म कतका मया दुलार रथे ।एखर बरनन करे नी जा सकय ।महतारी के हाथ ले खाएबर भगवान ह घलक तरसथे। एक ठन कथा कहनी बतात हंव मन लगा के पढिहव। जमदग्नि अऊ दुर्वासा रीसि मन अपन घुस्सइल सोभाव ले ही जाने जथे। एक घांव दुर्वासा रीसि ह भगवान कृष्ण ल घुंस्सा आथे के नी आय तेकर परीच्छा ले बर द्वारिका पंहुचिस। भगवान ह सब परकार ले रीसि के आवभगत करिस। रीसि महराज ह जेन काम म गे रहय ओला सुरू करिस। हर परकार ले भगवान ल घुंस्सा आय अइसन जुकति बनइस।तभो ले भगवान ल घुंस्सा नी अइस। अतिक सब ल देख रीसि महराज कथे 'भगवन, मेहा तोर परिच्छा के ले के हर संभव परयास करेंव जेमा आप सफल होगेव। तै तो जितेन्द्रिय हावस ।तोर जय होगे। का बरदान देवंव बताव। भगवन ल बरदान के का आवस्यकता तभो ले रीसि के मन ल राखे बर जोरदरहा बरदान मांगिस। भगवन कथे 'हे रीसि महराज! तै मोर ले खुस हस त मोला ये बरदान दे कि मेंहा आजन्म अपन महतारी के हांथ ले भात खांव। अतरी बिनती हे। रीसि महराज ह तथास्तु कहिके उंहा ले चले लगिस। बरदान के फलसरूप भगवान कृष्ण ल जीवन के अंत होत तक दाई के हांथ ले बने भात साग रूपी मया दुलार मिलिस। आज हम मन सोंच के देखन गुन के देखन कि आज हर घर म भगवान जइसे हर लइका ल दाई के हांथ ले खाना मिलत हे का ??? टीप:- सुनल कहनी हरे कोई गलती होय होही ते छमा चाहूं -आचार्य तोषण

गलती किसकी ????

सत्य घटना २०१५-१६ की एक दिन एक आचार्य की पत्नी अपने मायके से बस में आई ।स्टेशन से उतर कर घर आने को पैदल चल पड़ी कि अचानक एक बाईक वाला आके एक्सीडेंट कर देता है। कोई उसे कुछ ना कहे ऐसा सोच वह उसकी पत्नी को हास्पिटल ले जाता है। इस बात का पता जब उस औरत के पति (आचार्य) को चलता है वह अपने प्राचार्य व दो अन्य आचार्य के साथ तुरंत हास्पिटल पहुंचता है । तो एक्सीडेंट करने वाला व्यक्ति उससे कहता है कि गलती मेरी है ।आप ईलाज करवाइये जो भी खर्चा आएगा हम वहन करने को तैयार है ।प्राचार्य व अन्य दो आचार्य को पता था कि वह एक्सीडेंट करने वाला सरस्वती शिशु मंदिर का विद्यार्थी रह चुका है इसलिए अपने आचार्यों के भरोसे को नहीं तोडेगा इस भरोसे वह आचार्य जिसकी पत्नी का एक्सीडेंट हुआ था उनहोंने एफ आई आर नही करवाया क्यों कि वह समझ गया था अगर ऐसा करेगा तो वह व्यक्ति आगे कक्षा की पढाई नहीं कर पाएगा और इसका भविष्य खराब हो जाएगा। ये बात उस आचार्य को समझ में आ गई। अब इधर इलाज शुरू हुआ । खर्चे भी बहुत आई। जब सारा बिल उस व्यक्ति और उसके माता पिता के पास पहुँचा तो वहां का नजारा ही पलट गया ।जो बात भरोसे पर विश्वास पर कायम थी वह अविश्वास मे बदल गया ।भरोसा पूरी तरह से टूट गया ।जब उनका जवाब सुना कि हमने ऐसा कुछ नही कहा ।आपने एफ आई आर नहीं की आपकी गलती। वह आचार्य अपने को कोसता हुआ व़हां से चलल पड़ा कि मैने अपने विद्यालय में पढे हुए उस व्यक्ति पर विश्वास क्यों किया। अब आप ही बताएं गलती किसकी??? -आचार्य तोषण

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

सबले बड़े चोर...

सबले बड़े चोर...
एक घांव एक झन राजा के सभा लगे रिहिसे। राजा हूरहा एक ठन सवाल पूछ दिस-"सबले बड़े चोर कोन आए ? कोई ह धरम के चोर ल सबले बड़े चोर कहे ,त कोई ह स्त्री चोरइय्या ल ,कोई ह लईका चोरइय्या ल। सब झन अपन अपन हिसाब ले बतइस आखरी में एक झन सियनहा अउ अनभव करइय्या सियान ल पूछिस त बतइस कि एमन तो अईसने नान्हे चोर हरे, एमन ल तो परेम से अउ सजा देके सुधारे जा सकत हे, उंखर अपराध ह तो इसपस्ट होथे। कामचोर ह अइसे चोर ए जेकर अपराध ह इसपस्ट नइ होय, लेकिन एहा घुना कीरा कस समाज के बेवस्था अउ खुद वो मनखे ल पोंडा कर देथे । एखर सेती काम ले जी चोरइय्या ह सबले बड़े चोर हे।।
कई झन मन एखरो ले बड़े कमचोरहा हे । इंखर असूल रथे-
अजगर करे नी नौकरी, चिरई करै नही काम।
दासमलूका कहे गईस, सबके दाता राम।।
सअभार:जीओ तो ऐसे जीओ की "हाथ की सच्चाई" से छत्तीसगढ़ी रूपांरतन।
अनुवादक :-आचार्य तोषण

राम नाम

राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...