आँसू कहते
कब आओगे तुम
दिन ढलते.....
निहारुँ राह
है मन आनंदित
प्रेम की चाह...
हो आगमन
चकवा निहारती
स्वाती की बूँद....
तोषण कुमार चुरेन्द्र
आँसू कहते
कब आओगे तुम
दिन ढलते.....
निहारुँ राह
है मन आनंदित
प्रेम की चाह...
हो आगमन
चकवा निहारती
स्वाती की बूँद....
तोषण कुमार चुरेन्द्र
एकता शक्ति
पूरे हो अरमान
शुभकामना
ओस की बूँदे
टिमटिमाते तारे
धरा अम्बर...
कर्म है तेरा
न हो इच्छा फल की
कृपा ईश की...
खेलते बच्चे
धरना में शिक्षक
तम भविष्य
माँ की डाँट
नसीब में भी नही
रुठी किस्मत.. .
माँ की यादें
है अंतरात्मा बसी
भीगी पलकें
तोषण कुमार चुरेन्द्र
तरु की छाँव
खेलता बचपन
अपना गाँव
मिट्टी चंदन
निखरित मस्तिष्क
कोटि वंदन
बहे सरिता
है धरा पल्लवित
मग पुनिता
कुँजती पिक
लगे मनभावन
देती सीख
कृषक झुमे
लहलहाते धान
माथा चुमे
पुष्प पलाश
देती नव चैतन्य
पूरी तलाश
तोषण कुमार चुरेन्द्र
बताएँ क्या हम अपनी दिल की दास्तान को
प्यासी धरती देखे जैसे ऊपर आसमान को
आरजू है बस उनसे आखिरी मुलाकात की
लगे न नजर किसी की मेरे दिले अरमान को....
तोषण कुमार चुरेन्द्र
संकल त्रय
सप्तविंशति पुष्प
मंगलमय
दर बदर
है चहल - पहल
चार पहर
करें सम्मान
होकर आगाहित
बनें महान
तोषण कुमार चुरेन्द्र
राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...