मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

तै बरत रहिबे बाबा....

पंथी गीत
तै बरत रहिबे बाबा....
तै बरत रहिबे बाबा दीया बरोबर जैतखाम में
दीया बरोबर जैतखाम में हो२
तै बरत रहिबे....

अमरौतिन दाई तोर ददा महंगुदास हे
गिरौदपुर म जनम धरे नांव घासीदास हे
तै चमकत रहिबे बाबा चंदा बरोबर पुन्नी रात में
तै बरत रहिबे....
ज्ञान सत खोजे बर निकले जंगल झाड़ी हो
धरके तपसी बेस तै आसन लगे पहाड़ी हो
तै दमकत रहिबे बाबा सुरूज बरोबर सुब शाम ले
तै बरत रहिबे....
राखव मन शांति कहिके जग ला बताय हे
जग कल्यान बर गुरू बनके आय हे
तै महकत रहिबे बाबा फूलवा सही हिन्दूस्थान में
तै बरत रहिबे...
मनखे मनखे एके हन एके जीव समाय हे
रख मया सब बर गुरू ज्ञान बताय हे
तै चहकत रहिबे बाबा बनके चिरइया बिहान के
तै बरत रहिबे...
तोरे चरन मा बाबा "जोहर" मांथ नवांय हे
आसीस तोरे पाके बाबा "तोषण" गीत बनाय हे
मैं गावत रइहौं बाबा महिमा गा तोर सतनाम के
तै बरत रहिबे....
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़

रविवार, 18 दिसंबर 2016

पितर

पितर

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भादो महिना अंधियारी पाख
लगे हावय देखव पितर शाख
पानी देवत दुनो अजुरी जोड़
पुरखउती परमपरा बात राख
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होवत बिहनिया अंगना लिपे
सुघ्घर चकचंदन चउंक पुराय
तोरई पाना फूल नीक लगे बेला
पिडहा माढे लोटा दतवन चाय
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पाना तोरई के भाग संहरावय
बरबट्टी करिया मेछरावत हो
फर तोरई संग साग बनावय
बड जोरदरहा रंग जमावत हो
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तीन-तीन घांव तिलांजलि देवय
दाई ददा अऊ पुरखा सोरियाके
भोग लगाथे आके करिया कागा
घूमत घामत सबझन सकलाके
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कथे सियानन पंदरा दिन बर
पुरवज मन परिवार तीर आथे
जनम जनम के भटकत जीवरा
लइका बर आशीष छोड़ जाथे
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-आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा
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मया दुलार हो

लाली लाली चुनरिया दाई साजे सोला सिंगार हो
आस पुरो सब भकतन के रख लेबे लाज हमार हो
आके गोहरावंव मन के दुख पीरा दाई दुवार तोर
बरसावत रहिबो मोर बर अछरा भर मया दुलार हो

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मोर जिंनगी होगे हे अंधियार

सत्य घटना पर आधारित कविता
आप तक सादर समर्पित----------
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
~~~~~~~~~$$$~~~~~~
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार

नौकरी करत हन जी नाम के
पइसा कउड़ी के ठिकाना निंही
मिल जथे जी दू.....तीन हजार
लाज..शरम सेती बताना निंही
दुसर घर सउघा दीया बरत हे
गरीबी म होवत हे बंटा―धार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
नंइ लेवाय हे ददा बर कुरथा
एकझन लइका बर जींस सेट
बाई कथे मोर बर लेदे लुगरा
सन्न रहिगेंव मेहर सुनके रेट
काहत हवय उपराहा एकठन
मोर बर लेदेतेस सोनहा हार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
खेती खार के गोठे झनकर
बनी भूती म चलथे गुजारा
मिल जथे एदे पैंतीस किलो
आधा बोरी चँउर के सहारा
सोंचथों जातेंव परदेश कमाए
ददा के आंखी होगे हे अंधियार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
करजा के मारे चिंता धरेहे
गुनथों एहा कइसे छुटाही
कब किरपा होही लछमी के
दुख दलिदरी कब ए सिराही
सोंचत-सोचत तन ह घुरत हे
जिंनगी म होही कब उजियार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
©®
आचार्य तोषण, धनगांव डौंडीलोहारा, बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१

हमर मन के गोठ


हमर बने हे अघवा जतका गोठ करथे बड मीठ-मीठ
पेराय खूसियार बरोबर हम हो जाथन सीठ-सीठ
काम करथन हम्मन घंस घंस मंजा कस कस के उड़ाथे
उरक जथे कंहूँ पइसा थोरको हमी ल दोसी ठहराथे
जाथन तिंहा तो कामे करथन घर के काम तियार देथे
कभू खेत डोली कभू सिलेंडर टंकी धरा के बइठार देथे
दस बज्जी जाथन कमाए बर टेम ले कुटेम कमाथन
आथन घर में थके मांदे गोसईनीन ले अउ गारी खाथन
हमर काम ल सेवा हे कहिथे तभो मिलत नंइहे फल
दु आना कि चार आना बढाही मिल जतीस आज कल
काडी मिठई ह बनगे हावे लइका सही भुरियारथ हे
चार महीना बीतत हावे मदारी कस नांच नंचावत हे
जेझन के मुडी म पागा हे सब अपन-अपन में मस्त हे
अइसन मस्तीजाद के मारे हालत हमर इहाँ खस्त हे
देख इंहा के रांगा चागा मुंह ले बिलई के नंइ निकले मिऊ
असने करम देख कथे सियान लल्लड जांता के लल्लड पऊ
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा

मन का बिचार

एक सिपाही सीमा मे डटे हे ।अइसन देवारी तिहार म । त मन म का बिचारत हे। का काहत हे
आवव देखन ।कविता के चार लाइन हमर देस के जवान मन बर सादर समर्पित.......
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स्वदेश सेवा म लगे मोर तन कइसे गांव आवव
मोर जोही दिल के रानी कइसे देवारी मनावंव
दाई ददा ल समझादेबे आस के दीया जलालेबे
आज नही ते काली बैरी लहुट आहूं अपन मैं ठांव
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आथे सुरता घर-परवार के ओ गली-खोर अंगना
ओ गांव के सुखा मैदान खेलन जिंहा संगी संगना
मोला सताथे मुसकावत चेहरा आघू-आघू झूलय
पैरी के छून-छून रानी हांथ ल भावय तोर कंगना
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भेजदेबे देवारी खीचरी दीया फरा नवा पिसान के
तोर मया के चिनहारी मोर बिरह पीरा ल सान के
मोर गांव शोर संदेश बतादे बबा के गोठ सुनादे
गाय बछरू के हाल सुनादे कइसे हाल गौठान के
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रद्दा मोर देखत रहिबे आंखी ले रातदिन निहारत
आ जहूं मैं झटकू रानी कोयली कस कुकुही पारत
झन करबे तै शोक शोगारत अइसन खुसी के बेरा
कहे जवान 'तोषण' परब देवारी मनाले दीया बारत
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जम्मो मोर देश के जवान मन शत् शत् नमन करत देवारी तिहार के खाला खूझर बधाई
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छत्तीसगढ़

गोवरधन पहार

गोवरधन पूजा के बधाई देवत चार लाईन
समरपित
गोवरधन पहार
कुम्हड़ा कोचई कटकट मही
चुरत हाबे बरा अउ सोहारी
नवा चंऊर के खीचरी राधे
जुरमिल खवाबो आरी पारी
गोरधन खोंचे मेंमरी सिंघोटी
हुम धुप नरिहर धरके मनाबो
अन्नकूट सम पबरित तिहार
गउ महतारी के आशीष पाबो
जेकर कोरा म जड़ी बूटी दवई
भरे हबे जिंहा अकछय भण्डार
सबके आस पुरोथे निसदिन
अइसन हवे गोवरधन पहार
राऊत मनके पुरखौती देंवता
नीत कोरा म गइय्या चरावय
बनके गोप गुवाला संन मा
मुरलीधर मुरली बजावय
सरदी गरमी बरसात सहिके
गउ माता के पोसन करथे
सबके गोवरधन पहार तै
"तोषण" घलक पाव परथे
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छत्तीसगढ़

लिये मुसकान होंठों पे

लिये मुसकान होंठों पे दिलबर हमसे
खुली छत पर युँही मिलने आ जाते हो।
करके चोरी दिल की चुपके―चुपके तुम
उड़ते बादल की तरह छुप जाते हो।
आँखों ही आँखों में अपनी करके इशारा
गहराइयों में दिल की उतर जाते हो।
आते नहीं कभी मुलाकात करने 'तोषण'
रातों की तन्हाई में तुम तड़पाते हो
©®
आचार्य तोषण धनगांव९६१७५८९६६७
१६/११/१६

सुप्रभातम्...


छोड़ पंछी अब नीड को ,बढ़े गगन की ओर।
इंद्रधनुषी किरणों संग, जगा रही है भोर॥
जगा रही है भोर , करले कदम तू आगे।
हुआ दिवस देखकर,निशा दूर-दूर भागे।।
सूरज आया देख,किसन छेेेड़े है बंशी।
सरर सरर की तान,नीड को छोड़े पंछी।।

© ®आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

है सुनिश्चित

है सुनिश्चित जनम मरण, मनवा क्यों तू सोंचे।
चिंता से चतुराई घटे, केश बिरथा क्यों नोंचे।।
कर्म तेरा अधिकार है, फल की चिंता छोड़।
भर भर देंगे ईश्वर तुमको, कर्म से रिश्ता जोड़।।

जो नर श्रद्धावान यहाँ, प्राप्ति ज्ञान की होत।
अज्ञानता की यान में,अशांत मन क्यों ढोत।।
सत्संग है कुबुद्धि हरती,वाणी सत्य से सींचती।
ज्ञान पापों से करते दूर,चहूँ दिक् बढती कीरती।।

करले संगत सज्जन के,मिलेगा सच्चा ज्ञान।
गुणी विवेकी बनोगे तुम, कहाओगे श्रद्धावान।।
विद्या देती विनय सबको, मिलता सबका मान।
विद्या सम कोई चक्षु नही,तम हरती दीप समान।।

सबको अपना जानों तुम, करो सभी का आदर।
कहना सबसे मीठी वाणी,कभी न होगा अनादर।।
मान मिले सम्मान मिले, बनके रहो नित प्रिय।
लगे रहो हित करने सबके, करम न हो अप्रिय।।

झुकाना है गर संसार को, सीखें सर्वदा झुकना।
आँधी आए तूफाँ आए,मग में कभी न रूकना।
कोई रोके कोई टोके, मत किसी की सुनना।
करना है कर्म तुमको, सदा हृदय में गुनना।।

कर्म अच्छा करते जाना,करना कभी गुमान नही।
राह मिलेगी फूलों की, मिलेगा न चट्टान कहीं ।।
दोष न देना जगवालो, मुझको कुछ नही आता।
लिख देता मन की बातें,जो मेरे मन को भाता।।

बनके तारा एक दिन मैं, घोर निशा में चमकूँगा।
बनकर फूल बगिया में, बहती पवन संग महकूगा।।
उडता रहूँ उन्मुक्त गगन में,पक्षी बनने की कामना।
मिलती रहे हमें सदा,विप्र आपकी शुभकामना।।
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगांव
डौंडीलोहारा छतीसगढ ४९१७७१

एक पाव

आज काल के दिन म अइसने चलत हे
 तेला चार लैन म तुंहर आगू समरपित


जाथों ददा सन टूरी खोजे गांव ले ओ गांव
होथे सांझ मोर ददा जमा देथे एक पांव
टुरी खोजय म गोड हाथ पिरागे कथे ग
एक पाव पीये बिन घर म नंइ जांव
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

वाह रे आतंकवाद..."

एक नानकून ल इका के मनोभाव ल उकेरत चार लैन आप सबके नवकंज पद म समरपित

वाह रे !आतंकवाद
बनहूँ तोर बर फौलाद

होन दे मोला बड़े
देखत रहिबे खड़े-खड़े
सैनिक देशी बनके
रहूँ सीमा तीर तनके
आ कभू सीमा तोड़
देंहूँ तोर आँखी फोड़
आगु म बम बन जाहूँ
तन ल तोर आगि लगाहूँ
कसम हवे माटी के
पिहुँ लहू तोर छाती के
तिरंगा मोर मान हे
मोर भारत के शान हे
मिट जही नाम निशान
करबे कोंनो अपमान
भारत के लइका अंव
एक में कोरी खइका अंव
लड़त भले मर जाहूँ
फेर पहिली मार गिराहूँ
होही जी नांव अमर
भजही तोषण डगर-डगर
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१

क्यूँ

क्यूँ

इंसानियत को मारकर मर रहा है क्यूँ
होकर इंसान इंसान से डर रहा है क्यूँ
जगा अपनी ईमान खड़े हो अपने पैरों में
बिना पिये शराब यहाँ बहक रहा है क्यूँ

सुप्रभातम् सूरज

सुप्रभातम्
सूरज भास्कर नाम तुम्हारे
सदा करते हित का काम..
हो तुम सबकी प्रेरणा पुंज
तुमको मेरा कोटि प्रणाम...

अलसुबह होता है दीदार तेरा
कली खिल जाती तेरे आने से..
यूं ही हमेशा मुस्कुराते रहना
जगता जहान तेरे मुस्कुराने से...
है दमकता गुलशन गुलशन
आलोकित होता जहान है..
अवनि है तुझसे ही शोभित
तुझसे ही आसमान है...
सबको मेरा सुप्रभातम् है
पूर्ण हो सबकी कामना ..
पथ निरतंर चलते रहना
रूकने का हो नाम ना...
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद

संगवारी के गोठ

संगवारी के गोठ ल का काहंव
मोर बर मंदरस के झोर हे
बंधाय अइसन पीरीत के बंधना
जइसे पटवा के डोर हे

 आज नहीं तो कल होगा
हर मुश्किल का हल होगा
आँख से आँसू बहाना मत
यह इक दिन गंगा जल होगा

 माँ बाप का उपकार बड़ा
हमे सत्मार्ग दिखाते है
प्रतिफल की चिंता नही
सदा ही फर्ज निभाते है

परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

मेरा लेख आप सबको समर्पित

परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

एक गरीब लड़का है सोनू । जो अपने पिता जी के होटल मे दिन रात काम करता है। उसके मन मे पढने की तीव्र इच्छा थी। लेकिनस परिवार की स्थिति को देखकर अपनी इच्छा अपने मन के अंदर ही दबाकर रखा रहता। क्या करता बेचारा पिताजी एक पैर से अपाहिज होटल का गल्ला सम्हालता । माताजी और छोटी बहन सोनिया होटल के काम मे हाथ बटाती। इस तरह उसका जीवन चल रहा था।
एक दिन एक गुरूजी होटल मे चाय पीने आए ।चाय का आर्डर देते हुए पेपर पढने लगा । सोनू चाय लाकर गुरूजी को देकर वहीं खडा हो देखने लगा । जिस पर लिखा था " तेरह वर्ष का बालक पढाई स्तर पर जिला में अव्वल आया है।"इसे देखकर सोनू दुखी हो गया । सोनू को दुखी देखकर गुरूजी कहने लगा -अरे सोनू आज दुखी क्यों है ?इतना उदास क्यों है? तब सोनू कहता है-"काश !वो अव्वल आने वाला बालक मैं होता। इस बात को गुरूजी सुनकर चौंक जाता है और सोनू से पूछता है । भला तू ऐसा क्यों कह रहा है? तब सोनू अपनी सारी व्यथा गुरूजी के सामने रख देता है। सारी सच्चाई जानने के बाद गुरूजी सोनू के माता पिता को समझाईश देते हुए कहते है-"अपने बच्चे सोनू और सोनिया को पढने के लिए स्कूल जाने दो ।पढेंगे लिखेंगे तुम दोनो का नाम रौशन करेंगे। इस तरह होटल मे काम करने से इनका जीवन यहीं सीमित हो जाएगा। मैं इन दोनों की पढाई का जिम्मा लेता हूं। इनके बदले मजदूर लगाकर अपना होटल सम्हलना । गुरूजी का उपकार मानते हुए अगले दिन सोनू और सोनिया को स्कूल भेजने लगे।
सोनू और सोनिया की पढाई रंग लाने लगी ।हमेशा अव्वल आने लगे। माता पिता और गुरूजी भी खुश होने लगे।
गांव की पढाई खत्म होने के बाद सोनू और सोनिया को शहर के अच्छे कालेज मे दाखिला मिल गया ।दोनों भाई बहन मन लगाकर पढने लगे। समय ने ऐसा रंग लाया दोनो एक बार फिर अव्वरल दर्जे से पास हो गये। दोनो भाई बहन बहुत खुश होने लगे ।इस खुशी को मनाने वे दोनो अपने गांव गाव आना चाह रहे थे। फिर क्या था ।एक दोनो भाई बहन अपने गांव आये और सीधा अपने माता पिता के पास होटल में पहुंचकर चरण स्पर्श किए और सीधा एक ही सवाल सोनू ने पूछा-"क्या ?वह गुरूजी आज भी हमारे होटल में चाय पीने आते है । सोनू के इस सवाल को सुनकर बीती बातों को सोंचते हुए माता पिता की आँखों में आँसू आ जाता है ।उसे पोछते हुए बड़े सरल भाव से अपने बच्चों से कहते है -"हां बेटा !
उसी समय वह गुरूजी होटल में आकर चाय का आर्डर देते हुए पेपर पढने लग जाता है तब सोनू अपने हाथ से गुरूजी को चाय सौंपकर प्रणाम करता है । तब गुरुजी पूछने लगता है -"अरे भाई तुम कौन हो ?और मेरा पैर क्यो छू रहे हो? तब सोनू अपनी पूरी कहानी बताता है और धन्यवाद देता है-"आज अगर हम यहाँ पर इतनी पढाई लिखाई किये है तो सिर्फ आपकी ही वजह से किये । गुरूजी उन बच्चों को आशीर्वाद देते हुए अपने घर की ओर चल पडते है

© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा

वंदन है

वंदन है उन गुरू चरणों में कृपा जिनकी हम पर है
नमन है माता-पिता को जीवन जिनके दम पर है
राह दिखायें जीवन पर्यन्त मिलता रहा प्रेम सदा
मरके भी उऋणी न होंगे ऐसा ऋण हम सब पर है
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

मोर छत्तीसगढ़ के माटी

छत्तीसगढ़ महातारी ल समरपित
गीत
शीर्षक :"मोर छत्तीसगढ़ के माटी"
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन २
मांथ लगावंव चंदन तोला २
मोर छत्तीसगढ़ ....

तोर कोरा म जनम अउ
तोरा कोरा म बाढ़ेंव २
सूरुज जोत म करंव आरती
दणडासरन पखारेंव २
फूलपतिया धर पंइया परके २
तोला करथंव बंदन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन........१
महानदी अउ अरपा पइरी
कोरा तोर हरियावय २
नंदिया नरवा डोंगरी पहाड़ी
हरिहर अछरा भावय २
चिरई चिरगुन सुआ पंड़की २
करथे कोयली कुंजन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन......२
रीसि मुनि अउ देव धामी के
सरधा भरे देवालय २
तोर चरन मोर तीरथ बरोबर
मया पीरा के आलय २
कन कन म इंहा राम बसे हे
धूर्रा माटी हे कंचन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन......३
छत्तीसगढ़ही गुरतुर बोली
सबके मन ल भावय २
राऊत नाचा करमा पंथी
सुआ ददरिया गावय २
किसम किसम के फुलवा फुले हे
जइसे लगे बन नंदन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१
चलितभाष ९६१७५८९६६७
दिनांक ९/१२/२०१६

भुला पाओगी कैसे

आना चाहती थी वो जिन्दगी में हमारी
"तोषण"
कम्बख्त वक्त ने कर दिया दूर मुझसे

 सरदार है हम सभी बेवफाओं का
"तोषण"
सीखते है हमीं से बेवफाई करना


भूल गयी तू उन सब कसमों उन वादों को
मै तो वो एहसास हूँ वो सांस हूँ इसे भुला पाओगी कैसे

खोल

झन कोड दुसर बर खंचुवा जाके खुदे झपाबे
मिलके रहिले सबसन बैरी अइसन मया कहां पाबे

 लबर लबर गोठ करे
केकरा जस हे चाल
कपट भरे तन मन में
सिधवा के पहिरे हे खाल

 याद न करने का उन्होंने लिया वादा "तोषण"
काम एक यही जो न हो सकी हमसे

जिनगी के बात हे

जलता दीया न बुझने देना ,रख मन में विश्वास
त्रासदी है दूर करना तोषण, न होना कभी उदास

 ढूंढ न उनको गुलशन जो दिल मे समाया है
न दिखेगा इन आंखों से मन में जिसे बसाया है

 गुनाहों को मुआफ कर देना मेरी
दोस्ती जो आपसे निभा न सके.

 मौत तो आएगी साथ अपनी ले जाएगी
रह जाएंगी सिर्फ मेरी भुली बिसरी यादें

 कर लेना याद
मुझको भी यारों
चला जाऊंगा
एक दिन
दुनिया को छोड़कर

 चार दिन के चटक चंदैनी
फेर अंधियारी रात हे
परही जाना सबला एक दिन ए जिनगी के बात हे

आंखें

तेरी ये दोनों आंखें
मेरे लिए चांद और तारे है
देखता हूं तेरी बदौलत यहाँ
जो कुदरत के नजारे हैं


आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

तेरी ये दोनों आंखें
मेरे लिए चांद और तारे है
देखता हूं तेरी बदौलत यहाँ
जो कुदरत के नजारे हैं

आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

आगी आंच सुहावत हे

कटकिट कटकिट दांत करे
आगी आंच सुहावत हे
देखना ग डोकरा बबा
नंगतेहे जाड़ जनावत हे
नंगतेहे जाड जनावत हे
बासी चटनी नंइ भावत हे
गरमे गरम दुध फरा
टुरा ह बिहनेल जमावत हे
मिंजई कुटइ कोठार म
लारी म सुतेल परथे
करे बिछौना पेरा के
फुसूर फूसूर नींद परथे
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

वाह रे ! सिस्टम बफे


वाह रे ! सिस्टम बफे
खाय बर सकलाय सफे
मोहाटी म लिखाय बैल-कम
झोंकाय जिंहा कम-कम
देखंव मेहा एती-ओती
चकबिक चकबिक चारो-कोती
साहब सोदर बड़े-बड़े
खवइल देखंव खड़े-खड़े
पहुँचके खाएंव धोसा
वहुल देख परिस मोसा
काजू कतरी गरम मुगोडी
सोंहारी भजिया संग कचोडी
साग रमकलिया गोभी-फूल
अइसक्रीम घलक कूल-कूल
तीर म राहय ठेला गुप-चुप
तहुल झेलेंव महूं चुप-चुप
डीजे गाना बजावत राहय
टुरी टुरा ल नंचावत राहय
गेंव महूं मंच आगू मा
नाचेंव पान वाला बाबू मा
डीजे कथे झन जान खा
जाके ठेला म पान खा
मीठा मसाला पान खाएंव
संइकिल धरके घरे आएंव
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

सम्मान व साहित्यिक संगोष्ठी

मधुर साहित्य परिषद जिला बालोद छत्तीसगढ़ के पावन सानिध्य में "मधुर साहित्य सम्मान व साहित्यिक संगोष्ठी "का आयोजन किया गया। जिसमें "दोहा के रंग" के रचनाकार श्री रमेश जी चौहान का सम्मान व श्री देवनारायण जी नंगरिहा का जन्मदिन के सुअवसर पर बड़े ही आल्हादित मन से "दोहा के रंग" पुस्तक पर वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा समीक्षा कर इस पुस्तक को हम जैसे नवोदित रचनाकारों के लिये मील का पत्थर साबित होना बताया । तदोपरान्त उपस्थित साहित्यकारों द्वारा मार्गदर्शन प्रदान करते हुए काव्य पाठ कर रसास्वादन हुआ।
इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकारों का हस्ताक्षर व आशीष हमें प्राप्त हुआ। जिनमें श्री टी. आर जी महमल्ला ,लतीफ खान "लतीफ" ,शमीम अहमद सिद्दीकी, दरवेश जी आनंद प्रधान संपादक लोक असर ,रमेश जी चौहान अध्यक्ष श्री शमी गणेश साहित्य समिति नवागढ संयोजक फेसबुक संचालित छत्तीसगढ़ी साहित्य मंच, अनिल जी तिवारी निराला साहित्य समिति थानखम्हरिया, मनोज जी श्रीवास्तव शमी गणेश साहित्य समिति नवागढ , राजकमल सिंह राजपूत अध्यक्ष निराला साहित्य समिति थानखम्हरिया, पुष्कर सिंह जी "राज"फीचर संपादक लोक असर,राजकुमार जी चौधरी, पवन यादव "पहुना",डॉ.अशोक जी आकाश अध्यक्ष मधुर साहित्य परिषद ,दानेश्वर जी सिन्हा ,वीरेन्द्र अजनबी, लालेश्वर साहू व तोषण कुमार चुरेन्द्र उपस्थित रहे।

दोहा के रंग



कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.चित्र में ये शामिल हो सकता है: पाठ

औकात में

किसी ने कहा हमसे औकात में तो रहिये...
हमने भी कहा उनसे जनाब अपनी तो कहिये....
छांव मे रहकर कहते तगड़ी बड़ी धूप है ...
हमारी तरह भरी दुपहरी तो सहिये

तोषण कुमार चुरेन्द्र

हो जाऊँ जो रूखसत

घनाक्षरी
हो जाऊँ जो रूखसत , इस दुनियाँ से कभी ,
आँसुओं को पलकों में , अपनी भर लेना।
तन्हाई का मंजर हो , याद जो आऊँ मैं कभी ,
अफ़सानों से हमारा , दीदार कर लेना।
था कभी मैं तात यहाँ , झरनों सा रहा कभी ,
बनके नदी मैं बढूँ , ऐसी डगर देना।
हंसाया कभी रूलाया , लगाया इल्जाम कभी ,
हुई जो भूल हमसे , मुआफ़ कर देना।

© ®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छ. ग.४९१७७१
चलितभाष ९६१७५८९६६७

छत्तीसगढ़ही भाखा

छत्तीसगढ़ही भाखा के मान रखव ग
लाज एखर बचाय बर परान रखव ग
बढ़ही महतारी के सोर दुनियां म
गुनत सुनत एकक पयदान रखव ग


 कहते ही आ गये हम भी अपनी औकात पे
रखा करो वजन तुम भी कही अपनी बात पे
करना आंखे चार हमसे जब दिल मे धमक हो
बित जाएगी जिंदगी तेरी हल करते सवालात पे

 ना समझ है वो सहचरी, जो समझे न सहचर की बात
अपनी ही चलाती चले ,ये नहीं उसकी औकात

दिलबर की बात न समझे ,नहीं कोई वह दिलदार यहाँ
प्रेम तो बसता वहाँ "तोषण" है दोनों में विश्वास जहाँ

"दोहा के रंग"

ए पांच ठन दोहा लिखे के नानकून परयास
भइया रमेस चौहान के चरन कमल म सादर समरपित
गलती मिलही त सुधरातमक सुझाव सुझाहु

"दोहा के रंग"

ए दोहा के रंग ला ,रसा बना के लील।
भइया रमेस हे लिखे, बनही पथरा मील।।१॥
पढले दोहा के नियम ,मन धर ले गा ध्यान।
ए भइया के मान हे ,करहु सदा सनमान।।२॥
रसदा हमला देत हे, बांटत हे जी ज्ञान ।
छत्तीसगढ़ी मंच मा, पावत हन गा मान।।३॥
गला लगाइस आज गा, समगे जी में जान।
बड़भागी हे जीवरा ,सबले ससता मान।।४॥
ललना जोहर लाल के, तोषण परथे पांव।
पढ़े पढ़ाय सकूल मा ,हरे गांव धनगांव।।५॥
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र

चाहता हूँ...

चाहता हूँ...
बनकर फूल गुलाब का महकना चाहता हूँ।
बनकर तारा व्योम में चमकना चाहता हूँ।।
बनकर रग रग में लहू दौड़ता दिनरात मैं,
आंधी हो तूफान हो दहकना चाहता हूँ।।
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र

सुप्रभातम्

सुप्रभातम्
गुनाहों के दलदल में छोड़ देती है जिंदगी
गर साथ जीना चाहो रुख मोड़ लेती है जिंदगी
अब तो खुद की परछाई से लगता है डर
शीशा हसीन सपनों का तोड़ देती है जिंदगी

तोषण कुमार चुरेन्द्र

सुप्रभातम्

सुप्रभातम्
जहान में आजकल चलता कहां कायदा
झूठी होती है कसमें होता झूठा है वायदा
आदमी दिन रात काम करता वहीं "तोषण"
जहां नुकसान हो कम ज्यादा हो फायदा

तोषण कुमार चुरेन्द्र

सुभ बिहान हो

सुभ बिहान हो
भजत रहब दिन रात हम
प्यारे मोहन का नाम ।
ऊँखरे से होत बिंहना
होत ऊँखरे शाम।
का रखल भला इहाँ
जिनगानी में ऊँखरे शिवा,
जपत रहब रात अउ दिन
हरे कृष्णा हरे राम।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र

ना तड़पना हमें यूँ

ना तड़पना
हमें यूँ
तड़पाने वाले
झूमकर
कहर हमपे
बरपाने वाले

बनकर घटा
ढहाती
सितमग़र तू है
हक तेरा
नहीं हमपे
छड़जाने वाले
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र

गिनती म घासीदास के महिमा

गिनती म घासीदास के महिमा हाबे भारी
आवव सतनाम के जय करन बारी-बारी
१,२,३,४
घासीदास की जय जयकार
५,६,७,८
जगला बताय शांति पाठ
९,१०,११,१२
महंगु अमरौतिन के लाल दुलारा
१३,१४,१५,१६
छत्तीसगढ़ म मनावय तोला
१७,१८,१९,२०
घासीदास तीर मांगव आसीस
२१,२२,२३,२४
बाबा तीर झुके सगरो सीस
२५,२६,२७,२८
बाबा सतनाम के दीया जलइस
२९,३०,३१,३२
गिरौदपुरी धाम कस गढ़ दीस
३३,३४,३५,३६
जैतखाम सादा झंडा करदीस
३७,३८,३९,४०
हिरदे भीतरी सबबर मया पाली
४१,४२,४३,४४
पंथ सतनाम जग मा उबारिस
४५,४६,४७,४८
चुपर सतनाम तेल मन के करले मालीस
४९,५०,५१,५२
सुमर घासीदास ल होजही तन ह पावन
५३,५४,५५,५६
छोड़ दुनिया के भोग छप्पन
५७,५८,५९,६०
सतनाम के पारले गांठ
६१,६२,६३,६४
बन जा बाबा कस औघट
६५,६६,६७,६८
तन जल जाही पहुंचके मरघट
६९,७०,७१,७२
झन बना जी मन ल पत्थर
७३,७४,७५,७६
जप सतनाम ल झन जी जिनगी बत्तर
७७,७८,७९,८०
आ भाई सतनाम के पीले ते लस्सी
८१,८२,८३,८४
तन भटकेहे ग लख चौरासी
८५,८६,८७,८८
झन कर मन म तैह उदासी
८९,९०,९१,९२
बाबा तीर आबे तभे सत ल जानबे
९२,९४,९५,९६
छोटे बन रहिले बड़े सबला मानबे
९७,९८,९९,१००
जय बोलो घासीदास की कोरी-कोरी सौ-सौ
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा

रविवार, 20 नवंबर 2016

मनके अंधियारा मेटव"

"मनके अंधियारा मेटव"

आतंकवाद के चक्का म मोर भारत ल झन रेतव
सुमता के दीया जलाइके मन के अंधियारा मेटव

जइसे मिलके चंदा सूरज उइथे दिन अउ रात
संग दूनो झन मिलके देखव करथे मया बरसात
बनके गगन अपन कोरा म जम्मो चंदैनी समेटव
सुमता के दीया जलाइके मन के अंधियारा मेटव

करिस हिरनाक्ष अत्याचार प्रान ल अपन गंवाए
बैरी बनके हिरण्यकशिपु ह हरि ले बच नंइ पाए
प्रहलाद ल होलिका जइसन आगी म झन लपेटव
सुमता के दीया जलाइके मन के अंधियारा मेटव

झन बन कखरो बैरी दुसमन बने रहव मीत मितान
आदर देथे आदर पाथे जग में मनखे विही महान
देवारी के दीया बरोबर जुगजुगले अंजोर बिखेरव
सुमता के दीया जलाइके मन के अंधियारा मेटव

अंधियारा आतंकवाद के कोन जनी कब दूर भगाही
मोर सोनचिरइय्या भारत म नवा अंजोर हर कब आही
जूरमिल आतंकवाद ल कोस दूरिहा लेज ढकेलव
सुमता के दीया जलाइके मन के अंधियारा मेटव
©®
आचार्य तोषण धनगांव डौंडीलोहारा बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१

दीपावली हम सबका खास


****************
बांटता दीया नित्य प्रकाश
जीवन में भर देता उल्लास
बना रहे इस दीप पर्व पर
दीपावली हम सबका खास
*****************
अस्तित्व मिटाने अंधकार का
नीत नव किरण फैलाती है
बाधाओं को हरते हरते नीत
लक्ष्य की राह दिखलाती है
मन यूँ सबका खिला रहे
हो दिवाली पर्व उजास
बना रहे इस दीप पर्व पर
दीपावली हम सबका खास
****************
हो रहे हैं आज अग्रसर हम
हिंसा द्वेष के अंधकार में
रही निहारती भारत माता
मानवीय उजाले की दरकार में
सार्थक दिशा में जीवन को
हो लाने का नवीन प्रयास
बना रहे इस दीप पर्व पर
दीपावली हम सबका खास
*****************
जीवन संवारने औरों का हम
तेल बाती सम एक रहेंगे
दीये की लौ याद दिलाती
बन प्रकाश चंहु दिश फैलेंगे
सतत् प्रयास करें जीवन में
यही हो मन में दृढविश्वास
बना रहे इस दीप पर्व पर
दीपावली हम सबका खास
*****************
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़
टीप :-बिना कांट छांट के ही पोस्ट करें। सर्वाधिकार सुरक्षित है।

मोर जिंनगी होगे हे अंधियार

सत्य घटना पर आधारित कविता
आप तक सादर समर्पित----------
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
~~~~~~~~~$$$~~~~~~
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार

नौकरी करत हन जी नाम के
पइसा कउड़ी के ठिकाना निंही
मिल जथे जी दू.....तीन हजार
लाज..शरम सेती बताना निंही
दुसर घर सउघा दीया बरत हे
गरीबी म होवत हे बंटा―धार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
नंइ लेवाय हे ददा बर कुरथा
एकझन लइका बर जींस सेट
बाई कथे मोर बर लेदे लुगरा
सन्न रहिगेंव मेहर सुनके रेट
काहत हवय उपराहा एकठन
मोर बर लेदेतेस सोनहा हार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
खेती खार के गोठे झनकर
बनी भूती म चलथे गुजारा
मिल जथे एदे पैंतीस किलो
आधा बोरी चँउर के सहारा
सोंचथों जातेंव परदेश कमाए
ददा के आंखी होगे हे अंधियार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
करजा के मारे चिंता धरेहे
गुनथों एहा कइसे छुटाही
कब किरपा होही लछमी के
दुख दलिदरी कब ए सिराही
सोंचत-सोचत तन ह घुरत हे
जिंनगी म होही कब उजियार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
©®
आचार्य तोषण, धनगांव डौंडीलोहारा, बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१

सूरोती के दीया


कातिक अमावस के रात दाई लछमी के पूजा करे के साथ साथ हम छत्तीसगढ़िहा मन देवारी ल सूरोती के परब के रूप म मनाथन।गोंड भाई मन स मिल के गौरा गौरी ल घलक मनाथन । नवा चंऊर के पिसान के फरा रोटी अऊ दीया जलाथन फेर आज हमन चकाचौंध के दुनिया म भुलाके अपन संस्कृति धरोहर अऊ पुरखा मन के गोठ बात ल बिसरत जात हन येहा हमर मन बर बड़ा दुख के बात आय । मैं तो ठेठ जंगलिहा धनगांव के रहवासी हंव ।हमर कोती नंवा पिसान के दीया बनाके अपन आरा पारा के देव धामी के जगा कोठार खलिहान आदि म दीपदान करके अंजोर करे के प्रयास करथन।। आप सबो संगी संगवारी मन ले बिनती हे माटी के दीया के संग संग नवा पिसान के दीया के दीपदान करव।
आप ल पुनः धनतेरस नरकचौदस लछमी पूजा गोवरधनपूजा अऊ भाईदूज के खालाखूझर बधई अउ शुभकामना

आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़

हमर मन के गोठ


हमर बने हे अघवा जतका गोठ करथे बड मीठ-मीठ
पेराय खूसियार बरोबर हम हो जाथन सीठ-सीठ
काम करथन हम्मन घंस घंस मंजा कस कस के उड़ाथे
उरक जथे कंहूँ पइसा थोरको हमी ल दोसी ठहराथे
जाथन तिंहा तो कामे करथन घर के काम तियार देथे
कभू खेत डोली कभू सिलेंडर टंकी धरा के बइठार देथे
दस बज्जी जाथन कमाए बर टेम ले कुटेम कमाथन
आथन घर में थके मांदे गोसईनीन ले अउ गारी खाथन
हमर काम ल सेवा हे कहिथे तभो मिलत नंइहे फल
दु आना कि चार आना बढाही मिल जतीस आज कल
काडी मिठई ह बनगे हावे लइका सही भुरियारथ हे
चार महीना बीतत हावे मदारी कस नांच नंचावत हे
जेझन के मुडी म पागा हे सब अपन-अपन में मस्त हे
अइसन मस्तीजाद के मारे हालत हमर इहाँ खस्त हे
देख इंहा के रांगा चागा मुंह ले बिलई के नंइ निकले मिऊ
असने करम देख कथे सियान लल्लड जांता के लल्लड पऊ
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा

देस के जवान मन बर


*****************************
स्वदेश सेवा म लगे मोर तन कइसे गांव आवव
मोर जोही दिल के रानी कइसे देवारी मनावंव
दाई ददा ल समझादेबे आस के दीया जलालेबे
आज नही ते काली बैरी लहुट आहूं अपन मैं ठांव
__________________________________________

आथे सुरता घर-परवार के ओ गली-खोर अंगना
ओ गांव के सुखा मैदान खेलन जिंहा संगी संगना
मोला सताथे मुसकावत चेहरा आघू-आघू झूलय
पैरी के छून-छून रानी हांथ ल भावय तोर कंगना
__________________________________________
भेजदेबे देवारी खीचरी दीया फरा नवा पिसान के
तोर मया के चिनहारी मोर बिरह पीरा ल सान के
मोर गांव शोर संदेश बतादे बबा के गोठ सुनादे
गाय बछरू के हाल सुनादे कइसे हाल गौठान के
__________________________________________
रद्दा मोर देखत रहिबे आंखी ले रातदिन निहारत
आ जहूं मैं झटकू रानी कोयली कस कुकुही पारत
झन करबे तै शोक शोगारत अइसन खुसी के बेरा
कहे जवान 'तोषण' परब देवारी मनाले दीया बारत
*****************************
जम्मो मोर देश के जवान मन शत् शत् नमन करत देवारी तिहार के खाला खूझर बधाई
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छत्तीसगढ़

गोवरधन पहार


कुम्हड़ा कोचई कटकट मही
चुरत हाबे बरा अउ सोहारी
नवा चंऊर के खीचरी राधे
जुरमिल खवाबो आरी पारी

गोरधन खोंचे मेंमरी सिंघोटी
हुम धुप नरिहर धरके मनाबो
अन्नकूट सम पबरित तिहार
गउ महतारी के आशीष पाबो

जेकर कोरा म जड़ी बूटी दवई
भरे हबे जिंहा अकछय भण्डार
सबके आस पुरोथे निसदिन
अइसन हवे गोवरधन पहार

राऊत मनके पुरखौती देंवता
नीत कोरा म गइय्या चरावय
बनके गोप गुवाला संन मा
मुरलीधर मुरली बजावय

सरदी गरमी बरसात सहिके
गउ माता के पोसन करथे
सबके गोवरधन पहार तै
"तोषण" घलक पाव परथे
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छत्तीसगढ़

मोर छत्तीसगढ़ महतारी

मोर छत्तीसगढ़ महतारी

जग के मइनखे तोला सुम्हरे हावस सबके दुलारी
मांथ नवावंव तोर चरन मोर छत्तीसगढ़ महतारी

कभू कहाए दक्षिण कौशल कभू धान के कटोरा
अरपा पइरी महानदी शिवनाथ बोहिथे तोर कोरा
गोड़ तोर धोथे हसदो इंदरा हांथ जोंड आरी पारी
मांथ नवावंव तोर चरन मोर छत्तीसगढ़ महतारी

हरिहर रंग के लुगरा पोलखा हरिहर साजे सिंगार
मान बढ़ावय तोर अछरा के हरिहर डोंगरी पहार
सोनहा सोहे नांक नंथनी कान सोहे सोनहा बारी
मांथ नवावंव तोर चरन मोर छत्तीसगढ़ महतारी

कोठी डोली तोर छलछल छलके भरे हवे भंडार
नंदिया पहाड़ी जंगलझाडी लहरावय खेती खार
सेवा बजावंव गुन ला गावंव हो जावंव बलिहारी
मांथ नवावंव तोर चरन मोर छत्तीसगढ़ महतारी

तोर चरन मोर तिरथ बरत सरधा भरे देवालय
अरन बरन के देंवता धामी दया मया के आलय
सबके तही आस पुरइय्या सबके हावस हितकारी
मांथ नवावंव तोर चरन मोर छत्तीसगढ़ महतारी

छत्तीसगढ़ही गुरतुर बोली जेहा सबके मन भाथे
राऊत नांचा करमा पंथी सुआ ददरिया गाथे
रंग बिरंग जिंहा फूल खिले हरे अइसन फूलवारी
मांथ नवावंव तोर चरन मोर छत्तीसगढ़ महतारी

नांगर बइला कमरा खुम्हरी धर तोरे सेवा बजावय
बड सिधवा हम तोरेच लइका सेवा म जिनगी पहावय
हावन सब्बर समरस धरमी सतसेवा संसकारी
मांथ नवावंव तोर चरन मोर छत्तीसगढ़ महतारी
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा छत्तीसगढ़ ४९१७७१

ये सिला दिया

बदलते जमाने में लोगों को बदलते देखा है
हँसते को रोते और रोते को हँसते देखा है।।

 हमने तो थोड़ा टेस्ट बदला जमाने को परखने के लिए
जमाना है कि हमें ही गलत साबित करने पर तुला हुआ है।


क्या सपने थे मेरे
लेकिन तूमने सबकी वाट लगा दी
जितना मैंने तुमको पूजा था
उसकी तूमनी खाट लगा दी
क्या कमी रह गयी थी मेरे प्यार में
जो तूमने मूझे ऐसी सजा दी
कि मै न घर का रहा
न घाट का
लोग आज मुझ पर थू थू कर रहे है
पगली तेरे लिए
मैने क्या कुछ नहीं
किया कभी छडिया चुराए
कभी ईनटीना उडाए
और तुमने मुझ ये सिला दिया

अपनी लंका ढहाता है


मत बन खुद का बैरी दुश्मन
दुसरे को क्यों तडपाता है

बनकर तू खुद का घर भेदी
अपनी लंका ढहाता है


मिलकर रहना जग में सबसे
है दुनिया की रीत यहीं
मिलेगा न ऐसा जहाँ कोई दूजा
मरकर जीना हमको यहीं

इस मिट्टी का तिलक करो तुम
क्यों दूर दूर यूँ जाता है

मत बन खुद का बैरी दुश्मन
दुसरे को क्यों तडपाता है

बनकर तू खुद का घर भेदी
अपनी लंका ढहाता है

जीतकर लंका छोड़ दी हमने
रखकर अपने मित्र का मान
दिया सम्मान जो हमने उनको
मिलता रहा सदा सम्मान

कहा राम ने सुन भाई लक्ष्मण
प्यारी भारत माता है

मत बन खुद का बैरी दुश्मन
दुसरे को क्यों तडपाता है

बनकर तू खुद का घर भेदी
अपनी लंका ढहाता है

द्वार द्वार पर अब भी खड़े है
छुपकर जयचंद की खाल में
ना आना इनकी बातों में
देखकर नोंट टकसाल में

कभी जीवन में सुख नहीं मिलता
जो भाई भाई को लडाता है

मत बन खुद का बैरी दुश्मन
दुसरे को क्यों तडपाता है

बनकर तू खुद का घर भेदी
अपनी लंका ढहाता है
©®
आचार्य तोषण

होईस जब शंखनाद

होईस जब शंखनाद, थर खागे चोरहा।
राखे रिहिस कालाधन, खपाय के भोरहा।।
खपाय के भोरहा, भर गाड़ा पइसा जोर।
रोत धरके तरवा, मिलत नंइहे जी शोर।।
गजब ढुलाए पइसा,नरवा डहर बोहावय।
का करन का न करन, मुड़ी धरिके पछतावय।।
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा

एक कदम उजाले की ओर.



"एक कदम उजाले की ओर..."
उडते चले उन्मुक्त गगन में ,चीर बादल काले की छोर
संग बढाएँ दृढ़संकल्पों से ,एक कदम उजाले की ओर


मंजिल देखती राह हमारी ,कब तुम कदम बढाओगे
रहना है खरहा बनकर या, कच्छप की दौड़ लगाओगे
त्याग निद्रा आलस की ,जगा रही दिनकर की भोर
उडते चले उन्मुक्त गगन में ,चीर बादल काले की छोर

संग बढाएँ दृढ़संकल्पों से ,एक कदम उजाले की ओर
हार न माने चींटी कभी जब, अपनी कदम बढाती है
कदम बढाए कर्मपथ पर ,नीत मंजिल को पा जाती है
उत्साह जगाकर राह बनाए, बांधे मन साहस की डोर
उडते चले उन्मुक्त गगन में ,चीर बादल काले की छोर

संग बढाएँ दृढ़संकल्पों से ,एक कदम उजाले की ओर
दीपों की है अवली सजी ,द्वार द्वार हो रहे मंगलाचार
नवप्रकाश है नवप्रभात है ,यह दीपावली का त्यौहार
समता ममता भाव एक हो, आओ मनाएं सब पुर जोर
उडते चले उन्मुक्त गगन में ,चीर बादल काले की छोर


©®
आचार्य तोषण ,धनगांव डौंडीलोहारा,बालोद
छ. ग.४९१७७१

आज दुख त काली सुख

बिहने के लगे हंव लाइन म
कब मोर पारी आही
नोंट भंजाय के चक्कर म तरवा घलो तीप जाही

कतको कतार बैंक भीतरी म
कतको बैंक के बहिरी
लगथे मोला अब तो भैय्या प्रान पखेरू ऊड जाही


समस्या दू दिन बर है संगी हो
तहले नंइ होय
आज दुख त काली सुख

चाचा नेहरू के जन्मदिवस

चाचा नेहरू के जन्मदिवस पर
चंद लैन सादर समरपित

लइका संन लइका बन के
खेले दिन अउ रात जी
आज ओखर जनम दिवस हे
हमर बर गरब के बात जी


बनीस परधान देश चलाइस
अजाद भारत तिरंगा लहराइस
सुख समरीद्धि के रस्ता बनाके
हमर मन के भाग जगाइस

आओ मनाबो मिल जम्मो
जनम दिन के गीत ल गात जी
आज ओखर जनम दिवस हे
हमर बर गरब के बात जी...

हजार पांच सो के नोट

हजार पांच सो के नोट धरे
खडे रहेव जी बीच बजार
आके कहिथे एक झन टुरा
देबे का चिल्हर हजार

में केहेंव रे बाबू सून
रहितिस मोर कर कोई चिल्हर
माछी बिदारत नंइ बइठे रहितेंव
ठेला म ओध के पिल्हर

टुरा सियाना मोला कहिथे
चिल्हर दे देंहूँ तोला
एक हजार म दू सो बटटा
काट के दे बे तै मोला

कांट के बट्टा आठ सो मिल जाही
लैन लगे नंइ परही
कोन सो मार मोर पइसा हे
पाए रेहेंव जी कल ही

धरीस हजार के नोट ल टुरा
पल्ला छाड़ भगाईस
चुरमुरा रहिगेंव मेहा संगी
आठ सो घलक नंइ आईस

मोर संन होईस जइसन तइसन
तुम झन करहू जी दाऊ
अपन पइसा भंजाए बर सोझे
अपन बैंक के रद्दा जाहू
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा

हावस

हावस काबर गुस्साए ,कुछु कहीं तो बोल
लगथे डर मोला गजब, भेद जिया के खोल
भेद जिया के खोल,नयना हवे कजरारी
जियरा बजथे ढोल,कुके कोयलिया कारी
झन र गोरी उदास,करे फिकर चोला मोर
रहिबे दिल के पास, मया मिलै मोला तोर
©®
आचार्य तोषण
९६१७५८९६६७
१४/११/१६

क्षमता

मुझमें नहीं कोई क्षमता
न ही हूँ मैं खासम खास
आता नहीं काम किसी का
हर पल रहता मन उदास

देखता अक्स आईने में
खूद से नजर चुराता हूँ
तन्हाई डसती है मुझको
रो-रोकर चिल्लाता हूँ

हूँ बेरोजगार काम नहीं
बोझ हो गया खुद के लिए
रोटी नहीं मिलती अब तो
जी मिचलाती भूख के लिए

कोसता हूँ अपने आप को
क्यों मैंने है जनम लिया
माँ बाप के लिए कुछ कर न सका
भारत माँ को भी कुछ न दिया

मन में अब ये ठान लिया
कुछ तो कर दिखलाऊँगा
भारत माँ की सेवा करते
जीवन से मुक्ति पाऊँगा

मरने पर मुझे कुछ न देना
देना भारत की माटी को
तब पडेगी ठंडक मेरी
ज्वाला भरी इस छाती को
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़

मेरा देश बदल रहा है

÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
●मेरा देश बदल रहा है●
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देखो आज इक शेर के आगे शमशेर चल रहा है।
सुनो मेरे आवाम के लोगों मेरा देश बदल रहा है
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नीति बनाकर राज करे कहलाये राजनेता वही
मिलेगा न जहान मे ढूंढो ऐसा "मोदी" और कहीं
जिसके आने से तूफाँ बनके दरिया मचल रहा है
देखो आज इक शेर के आगे शमशेर चल रहा है।
सुनो मेरे आवाम के लोगों मेरा देश बदल रहा है
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झाड़ू लेकर कूदे मैदान दिया स्वच्छता का नारा
गाँव-गाँव खुशहाल बने हो भारत स्वच्छ हमारा
कथनी और करनी तो देखो दोनो अटल रहा है
देखो आज इक शेर के आगे शमशेर चल रहा है।
सुनो मेरे आवाम के लोगों मेरा देश बदल रहा है
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दोस्तों के संग साझेदारी दुश्मनों संग करता वार
जिद पे जो आ जाएँगे छोड़ना पडेगा घर संसार
जल थल वायु सेना अपनी सदा सबल रहा है
देखो आज इक शेर के आगे शमशेर चल रहा है।
सुनो मेरे आवाम के लोगों मेरा देश बदल रहा है
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भ्रष्टाचारी नींद से जागे घोड़े बेचकर जो सोए रहे
कालेधन को कहाँ करे अब सिर पकड़ रोए रहे
भारत माँ का आँचल देखो सदा ही धवल रहा है
देखो आज इक शेर के आगे शमशेर चल रहा है।
सुनो मेरे आवाम के लोगों मेरा देश बदल रहा है
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आचार्य तोषण धनगांव डौंडीलोहारा छ. ग.
९६१७५८९६६७,,पिन ४९१७७१
दिनांक १४/११/१६
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फितरत मेरी

फितरत मेरी उस गुलाब जैसी "तोषण"
दोस्ती करोगे काँटों की चुभन मिलेगी
आचार्य तोषण
१५/११/१६

तुलसी के...


तुलसी के कहिनी बड़े , तुलसी बन के घास ।
राम-राम तुलसी जपय ,बन गे तुलसी दास ।।
बन गे तुलसी दास , सुने रत्ना के बानी ,
तरे भव डगर पार , रमायन लिखे कहानी ।
सुन 'तोषण'के बात ,तनय दुलरू हुलसी के ,
अमर करे जग नाम ,गजब महिमा तुलसी के ॥

©®
आचार्य तोषण ९६१७५८९६६७

होवत

होवत भोर भुइंया के, चरन नवावव मांथ।
करव सेवा तन मन ले, रही तुंहर नित सांथ।
रही तुंहर नित सांथ, बाड़ही अन धन भंडारा,
रही सुखी घर द्वार, बहे जिंहा मया धारा।
तै हरस बडभागी , धरे जनम जिहां रोवत,
कर करम तैह बने, छोट ले बुढ़वा होवत।।

आचार्य तोषण

काया

काया बने माटी के , मिलही बनके धूल ।
बेंत बरोबर रही जबे , खिले न कोई फूल ।।
खिले न कोई फूल , बिरथा रही जिनगानी ,
अही नही कुछु काम , झन बनव जी अभिमानी ।
सुन तोषण के बात , नाँँच नचावय जी माया,
धन दौलत सब रही , सरग नइ जावय काया ।।

©®
आचार्य तोषण

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

करमा


#लडका
करमा नचाहूं तोला ओ आना मादर के थाप मा
#लड़की
करमा नचादे मोला गा आना मादर के थाप मा

#लड़का
धान लुए हंसिया बही गजब उड़ावय कंशी ओ
सुध मा तोर होके दीवाना मन बजावय बंशी ओ
करमा नचाहूं तोला ओ आना मादर के थाप मा
#लड़की
करमा नचादे मोला गा आना मादर के थाप मा
#लड़की
आए सावन गरजे बादर रिमझिम परे फोहार गा
किजरौं मैहा जंगल झारी पारत हांक गोहार गा
करमा नचादे मोला गा आना मादर के थाप मा
#लड़का
करमा नचाहूं तोला ओ आना मादर के थाप मा
#लडका
सुघ्घर लागे मोला रानी हांसी तोर ठिठोली ओ
नांक के नथनी कान बाली मया के मारे गोली ओ
करमा नचाहूं तोला ओ आना मादर के थाप मा
#लड़की
करमा नचादे मोला गा आना मादर के थाप मा
#लड़की
धिक धिनिंधा मादर बाजे करमा के ताल गा
तोर मया म होगेंव बही हाल हे बेहाल गा
करमा नचाहूं मोला गा आना मादर के थाप मा
#लड़का
करमा नचाहूं तोला ओ आना मादर के थाप मा
#लड़का_लड़की
करमा नचाहूं तोला ओ आना मादर के थाप मा
करमा नचादे मोला गा आना मादर के थाप मा
गीत #आचार्य_तोषण धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़ ९६१७५८९६६७

मन मलीनता धोए नहीं,पावडर रहे पोताय।

मन मलीनता धोए नहीं,पावडर रहे पोताय।
दुनिया के चकाचौंध मा, सबझन लगे मोहाय।
आज देखव जमाना ला,कोन डहर मा हे जात।
आतंकवाद नक्सलवाद मा, होवत हे रक्तपात।
दारू पियय दरूहा संगी,तिरिया लइका ह रोय।
हरताल सब दिन करय,फेर भट्ठी बंद कब होय।
नान्हे बड़े के मुंह ले ,निकलत गुंगवा के फूंक।
पाऊच खाए कचर कचर, जतर कतर दे थूक।
#आचार्य_तोषण

राखी ल...

राखी ल...
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना
कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे
लहरावत जाबे दुनों पाखी ल

दाई ददा के दुलारा बेटा
भइय्या मोर तै हीरा असन
पेट गुजारा करेके सुध म
बसगे जाके अब दूसर वतन
बइठके दाई के कोरा म
कोन खही अब बासी ल
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना
कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे
लहरावत जाबे दुनों पाखी ल
आजा लहुट सुन मोर भाई
ए भुइंया हर तोला बलावय
कइसे भुलागे दाई के सुरता
तोला रोज जे खेल खेलावय
तोर बिना इंहा कोन करही
खेती डोली के बियासी ल
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना
कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे
लहरावत जाबे दुनों पाखी ल
दाई ददा के सेवा जतन म
मिलथे जनम जनम के पून
मोर कहिनी ल मान ले तैह
बने हकन के बात ल गुन
आके घर छोड़ादे "तोषण"
दाई ददा के धरे बैसाखी ल
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना
कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे
लहरावत जाबे दुनों पाखी ल
-आचार्य तोषण
सुर लय ताल म गलती होय
होही तेकर बर छमा याचना

क्यों नहीं..

क्यों नहीं..
मेरी लिखी हुई वो दर्द की
बात कोई गुनता क्यों नही
निकले दिल से आह बनकर
ये अल्फाज सुनता क्यों नही

बहुत हो चुकी अब चांद को
जर्रो जमीं पर लाने की बात
जमीं को चांद पर ले जाने का
सपना कोई बुनता क्यों नही


हर किसी की चाहत है यहां
तख्ते ताज पर जाके बैठना
शिवाय मेहनत के बागबां पे
युंही गुल खिलता क्यों नहीं
-आचार्य तोषण

हैप्पी राखी

_झंउहा_झंउहा

राम नाम

राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...