रविवार, 20 अक्टूबर 2019

मिट्टी का दीपक

मिट्टी का है स्वरूप मेरा, मिट्टी में ही मिल जाऊँगा।
बनकर दीपक बाती संग मैं,तम को भी जीत जाऊँगा।

मुझसे ही आदि जगत की, और अंत भी मुझसे ही।
     जब तक जलता रहूँगा जग में, ज्योति मिलेगी मुझसे ही।
            है जितनें संसार में प्राणी सबमें एक ही ज्योति,
                  होता जीवन सब प्रकाशित और अंधेरा मुझसे ही।
                       साथ मिले जो सबका मुझको,मैं भी साथ निभाऊँगा।
                           बनकर दीपक बाती संग मैं,तम को भी जीत जाऊँगा।


 मिट्टी का दीप जान न मुझको,जीवन अपनी मिट्टी की।
      दीपक लेकर करले पूजा,मातृभूमि सबकी मिट्टी की।
             बन जाए अनमोल ये जीवन,हो जाये जग नाम अमर,
                   दीपदान कर अपने वतन पे,कर्ज चुका दे इस मिट्टी की।
                         बनकर ऊर्जा तेरे भाल पर,मिट्टी से तिलक लगाऊँगा।
                              बनकर दीपक बाती संग मैं,तम को भी जीत जाऊँगा।


हर घर हर चौराहे पे दिखता,हर गली बाजार पे बिकता।
    मेरे बिन हर आँगन सूना,रौशन हर द्वारे मिलता।
         मेरी महत्ता मान लो सब,अपना वजूद जान लो सब,
              मुझसे ही होता अरूणोदय,और मुझसे है पुष्प खिलता।
                    मुझको सब स्वीकार करलो,नित नया सवेरा लाऊँगा।
                          बनकर दीपक बाती संग मैं,तम को भी जीत जाऊँगा।

रचना
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगंइहा
डौंडी लोहारा
९६१७५८९६६७



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