*किसी के चरित्र पर कीचड़ उछालने से पहले अपने निगेहबान की निगरानी रखें कि स्वयं कहाँ है। पक्षी हो या विपक्षी मनुष्य के अंतर्निहित गुण और अवगुण होना स्वभाविक है। लेकिन गुण की अधिकता के कारण अवगुण का निशान छिप जाता है शायद यह ज्ञान कीचड़ उछालने वाले के समझ से परे लगता है। कर भी क्या सकते है।कहा गया है कि*
_*" फुलै फरै ना बेत,जलधि जो बरसहि सुधा।*_
_*मुरख जान ना चेत,मिले जो गुरु बिरंचि सम।।"*_
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