*कुण्डलियाँ*
_*पेट*_
_*भरता जिसका पेट है,रहे वही है मौन।*_
_*दीन दुखी लाचार को, पुछे भला अब कौन।।*_
_*पुछे भला अब कौन,काम जब बन है जाता।*_
_*स्वार्थ का संसार,कौन है किसको भाता।।*_
_*रहे कहाँ से ध्यान,नहीं मन अब कुछ करता।*_
_*चंगा रहे शरीर,पेट है जब जब भरता।।*_
_*भूखा रहकर कब तलक,कैसे भजन सुनाय।*_
_*मुख से निकले राम जी,दिल से निकले हाय।।*_
_*दिल से निकले हाय,पेट जब भूखो मरता।*_
_*होकर के मजबूर,काम है फिर भी करता।।*_
_*दिन गये है बीत,खाय जो पत्ता सूखा।*_
_*रहकर सब यूँ मौन,सहो जी बनकर भूखा।*_
_*तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा*_
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