सोमवार, 22 जून 2020

जिद तो अपनी भी थी...

मुक्त गजल 

जिद तो अपनी भी थी इस जमाने मे।
गुजर  जाए  जिंन्दगी तुझे भुलाने में ।

ढूँढती रही नजर मंजर-ए-तन्हाई पे,
गुम हो गई कहां,कौन से कैदखाने में ।

रूखसत हो गई गुलिस्ताँ-ए-इश्क  से,
चुभाना पड़ा हाथ बागबाँ सजाने में।

अर्ज है न गुजरो राह कभी इश़्क के,
आएगा "दिनकर" जहाँ के निशाने में।

तोषण कुमार चुरेन्द्र दिनकर
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.

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