मुक्त गजल
जिद तो अपनी भी थी इस जमाने मे।
गुजर जाए जिंन्दगी तुझे भुलाने में ।
ढूँढती रही नजर मंजर-ए-तन्हाई पे,
गुम हो गई कहां,कौन से कैदखाने में ।
रूखसत हो गई गुलिस्ताँ-ए-इश्क से,
चुभाना पड़ा हाथ बागबाँ सजाने में।
अर्ज है न गुजरो राह कभी इश़्क के,
आएगा "दिनकर" जहाँ के निशाने में।
तोषण कुमार चुरेन्द्र दिनकर
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.
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