दाई के हांथ के भात...
'मातृ हस्तेन भोजनम्' जेकर सरल अरथ दाई के हांथ ले बनाय भात। नाननान जब रेहेन त दाई के हांथ ले सबझन भात खाए हन। फेर आज एहा धीरे धीरे बदलत हावय।
आज हमन होटल बासा के भात साग ल बने रथे कहिके मंगा मंगा के घर म खाथन अउ अपन सरीर ल बहिरी के खाना ल खा खा के बिगाड डरथन। आजकल फेशन के दुनिया मा देखथन त मिलथे महतारी मन अपन ल इक लइका मन बर खाना बनाए के घलक टेम नी रहय इसकूल के टिफिन म होटल ले मंगा के जोर देथे। संझौती बेरा घर म नासता पानी बनाए ल झन परे कहिके लइका ल पइसा धरा देथे जा बेटा गुपचुप वुपचुप खा लेबे। आज भागम भाग के दुनिया म घर के खान पान अउ सब जीनिस ह नंदात हे। महतारी के हाथ ले बने भात साग नासता पानी म कतका मया दुलार रथे ।एखर बरनन करे नी जा सकय ।महतारी के हाथ ले खाएबर भगवान ह घलक तरसथे। एक ठन कथा कहनी बतात हंव मन लगा के पढिहव।
जमदग्नि अऊ दुर्वासा रीसि मन अपन घुस्सइल सोभाव ले ही जाने जथे। एक घांव दुर्वासा रीसि ह भगवान कृष्ण ल घुंस्सा आथे के नी आय तेकर परीच्छा ले बर द्वारिका पंहुचिस। भगवान ह सब परकार ले रीसि के आवभगत करिस। रीसि महराज ह जेन काम म गे रहय ओला सुरू करिस। हर परकार ले भगवान ल घुंस्सा आय अइसन जुकति बनइस।तभो ले भगवान ल घुंस्सा नी अइस। अतिक सब ल देख रीसि महराज कथे 'भगवन, मेहा तोर परिच्छा के ले के हर संभव परयास करेंव जेमा आप सफल होगेव। तै तो जितेन्द्रिय हावस ।तोर जय होगे। का बरदान देवंव बताव। भगवन ल बरदान के का आवस्यकता तभो ले रीसि के मन ल राखे बर जोरदरहा बरदान मांगिस। भगवन कथे 'हे रीसि महराज! तै मोर ले खुस हस त मोला ये बरदान दे कि मेंहा आजन्म अपन महतारी के हांथ ले भात खांव। अतरी बिनती हे। रीसि महराज ह तथास्तु कहिके उंहा ले चले लगिस। बरदान के फलसरूप भगवान कृष्ण ल जीवन के अंत होत तक दाई के हांथ ले बने भात साग रूपी मया दुलार मिलिस।
आज हम मन सोंच के देखन गुन के देखन कि आज हर घर म भगवान जइसे हर लइका ल दाई के हांथ ले खाना मिलत हे
का ???
टीप:- सुनल कहनी हरे कोई गलती होय होही ते छमा चाहूं
-आचार्य तोषण
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
राम नाम
राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...
-
"पाँच बातें " पाठ - 14 "पाँच बातें " कक्षा - 4 1- हर एक काम इमानदारी से करो ! 2- जो भी तुम्हारा भला करे, उसका कह...
-
एक सिपाही सीमा मे डटे हे ।अइसन देवारी तिहार म । त मन म का बिचारत हे। का काहत हे आवव देखन ।कविता के चार लाइन हमर देस के जवान मन बर सादर समर...
-
चंडिका में लघु प्रयत्न मात्रा भार १३-१३ ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ भारत मेरा देश है, अलग यहाँ का वेश है। ऋषि मुनियों की ये धरा...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें