रविवार, 5 अप्रैल 2020

राम राज्य

मंच को सादर नमन

विधा घनाक्षरी
विषय राम राज्य
दिनाँक 05/04/2020
दिन रविवार

जागे पहले मानवता मिटे सब दानवता,
चलें सच्ची राह साथी झूठ हार जाएगा।

दुखियों के सेवा होवे,भूखे कोई नहीं सोवे,
कर भला दुसरों की देव बन जाएगा।

सभी का आदर करे मीठी मीठी बातें करें,
आगे आके बैरी प्यारे गले लग जाएगा।

नवधा सा ज्ञान मिले,खुशियों के पुष्प खिले,
तभी मेरे भारत में राम राज्य आएगा।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

भारत मेरा देश है

चंडिका में लघु प्रयत्न
मात्रा भार १३-१३
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भारत  मेरा देश है,
अलग यहाँ का वेश है।
ऋषि मुनियों की ये धरा,
ध्यान प्राण अब ला जरा ।१।

 जन्म जहाँ है राम का ,
नटवर नागर धाम का ।
रावण को  संघारता,
कंस अधम है हारता ।२।

आया था जब गजनवी,
महापात वो दानवी।
हार मान वो है गया,
मिली यहाँ भरके दया।३।

विलायती की मार से,
जगे हिंद अब ताड़ के।
दुश्मन के छक्के छुटे,
इधर उधर हैं सिर फुटे।४।

दुविधा से है जुझ रहा,
जाने कितना घुँट रहा,
रोती ये नर नारियाँ,
बड़ी अजीब बिमारियाँ।५।

विपदा ये विकराल है,
कालों के भी काल है।
कोरोना जो नाम है,
पता नहीं अंजाम है।६।

कोरोना को अब मात दें,
भारत का सब साथ दें।
घर में ही जनता रहे,
यूँ ही बस कुछ दिन सहे।७।

बादल ये छट जाएगा,
अच्छा दिन अब आएगा।
सबका जो सहयोग हो,
यही महा संयोग हो।८।

मिलकर ये सब जानले, 
जा कोरोना ठान ले।
लौट नही वो आएगा, 
मुकी लात अब खाएगा।९।

मिलकर जो सब साथ हो,
जोश-जोश की बात हो।
कोरोना पछताएगा, 
छोड देश अब जाएगा।१०।

कोयल काली जब कुँजे,
भारत माता जय गुँजे।
तोषण मत यूँ हार ना,
कोरोना को मारना।११।
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तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.
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बेटी//कोरोना

हंसगति छंद अनजान
न जान है न पहचान 
फिर भी एक प्रथम प्रयास
सादर
नमन मंच
मात्रा भार ११/९

बेटी.......

बेटी अपनी जान,जरा सुनले माँ।
कब से हूँ मैं द्वार,करेगी कब हाँ।
निर्मम यह संसार,नमो हे भोली।
नैना तरसे नेह, भरे  कब  झोली।


कोरोना .....

दे दो माँ वरदान,करूँ मैं वंदन।
कोरोना हो दूर,करो अब भंजन।
हरलो माता भार,जरा सुन अर्जी।
खुश हो घर संसार,चले जो मर्जी।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा

गुरुवार, 26 मार्च 2020

विज्ञात जन्मदिन

परम आदरणीय श्री गुरूदेव संजय कौशिक "विज्ञात" जी जन्मदिन की बधाई व शुभाशया के संग एक कुण्डलियाँ समर्पित...

अपनी वाणी से कभी,करे नहीं आघात।
अतुलनीय जो है सदा,हैं कवि रवि विज्ञात।
हैं कवि रवि विज्ञात,रौशनी भरते मग में।
मिले मान सम्मान, सदा ही कलयुग जग में।
कह तोषण कर जोड़,पड़े माला नित जपनी।
मिले गुरू विज्ञात,वाह रे किस्मत अपनी।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.

बुधवार, 25 मार्च 2020

माता की नवरात्रि

सादर नमन
दिनाँक:- 25/03/2020
दिन:- बुधवार
विषय:-चित्राभिव्यक्ति
छंद:- कज्जल छंद में एक प्रयास

आजा  दाती राह फूल।
चरणों  तेरी  न हो धूल।
राजे कर में जो त्रिशूल।
आती  है नव रात मूल।

लाली चुनरी आभ रूप।
है  लगती  मैया  अनूप।
मेरी  माता  है   स्वरूप।
बिखरी  देखो  नई  धूप।

आयी  पावन  चैत रात।
होगी  माता  मुलाकात।
दर्शन  तेरी  बड़ी  बात।
बैरी  की  हो खरी मात।

टेकूँ  नित  मैं  तुझे माथ।
बनकर  दास रहूँ सनाथ।
मिलता है आशीष साथ।
पूजा करते  सिया  नाथ।

कृति
तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.

मंगलवार, 10 मार्च 2020

एसो होरी तिहार मा

होरी तिहार मा...

एसो के होरी तिहार मा
नंगतेहे उधम मचाबो
डोकरा बबा डोकरी दाई
सबला गुलाल लगाबो।।

नई छोड़न भइय्या भउजाई
बड़का बबा अउ बड़की दाई
कका काकी दाई ददा संन
सुघर फगुवा गाबो।
एसो होरी तिहार मा
नंगतेहे उधम मचाबो।

माते सरसो के फुलवारी 
सियान मितान संग संगवारी
धरे गुलाल अबीर हाथ मा
पिचका अजब चलाबो।
एसो होरी तिहार मा
नंगतेहे उधम मचाबो।

रंग पानी के होरी तिहार
बिन पानी हे सब बेकार
जल जीवन हे ए अनमोल
पानी हमन बचाबो।
एसो होरी तिहार मा
नंगतेहे उधम मचाबो।

तोषण धनगंइहा

होरी हे

रंगों का महापर्व होली की
हार्दिक बधाई व शुभाशया
होली विशेष
हाइकु पंच समीक्षार्थ

होलिका दाह~
श्रीफल चढ़ातें है
गाँव के लोग।1।

होली परब~
रंगों से है खेलती
नन्हीं बालाएँ।2।

नील बरन~
धरती को रँगती
फागून रंग।3।

होली की धूम~
नगाड़ा थाप पर
नाचते बाल।4।

फागुवा राग~
बसंत में झूमती
आम्र मंजरी।5।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.

प्रेम सद्भाव

*प्रेम सदभाव लिये,*
              *एकता संदेश दिये,*
*होली का त्योहार हमें,*
              *यही सिखलाती है।*
*रंग सराबोर करे,*
              *सुमता के राह गढ़े,*
*सतरंगी रंग सदा,*
              *पाठ ये पढ़ाती है।*
*आओ मिल हम साथी,*
              *मिलके मनाये होली,*
*बसंत बयार लिये,*
              *कोयलिया गाती है।*
*रंगीला परब भावे,*
              *मन मेरा नाचे गावे,*
*फाग की नगाड़ा अब,*
              *राग जो सुनाती है।।*

*तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा*
*डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.*

होरी हे

छत्तीसगढ़ी कुण्डलियाँ

आनी बानी रंग हे,
           घोर-घोर के घोर।
बइरी मन हर देख के,
           नाचे मुड़ चिभोर।
नाचे मुड़ चिभोर,
           थाप सुनके नंगारा।
दुरिहा इरषा होय,
            रहे गा भाईचारा।
रंगव सातो रंग,
            बचाके संगी पानी।
भजिया गुजिया संग,
            चुरे खइ आनी बानी।

तोषण धनगंइहा

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

बड़े दिनों बाद

बड़े दिनों बाद...

बड़े दिनों बाद एक बात दिल में आई है।
अपनों के भीड़ में भी कितनी तन्हाई है।

गुजारा हुआ हर पल आज कहता है मुझसे,
अब तेरी वफा में न जाने ये कैसी रूसवाई है।

बहती ये हवाएँ भी सदाएँ देती है हमको,
पहले की वफा हँस कर फिर क्यूँ बेवफाई है।

लौटकर न आना कभी जा अब दूर कहीं,
मेरे दिल की गली से सब दिन की बिदाई है।

ये फिजायें ये गुलशन भी बातें नहीं करते,
कहते ही रहते हमें ये "धनगंइहा" हरजाई है।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
उपाध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद
ईकाई डौंडी लोहारा

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

आभार

कोटि कोटि आभार

जनता हो धनगाँव के,देहव मया दुलार।
हिरदे ले काहत हवँव,तुम सबला आभार।।
तुम सबला आभार, चुने जी हावव मुखिया।
रखहूँ सबके मान,रहय जे कौनों दुखिया।।
हँव तोषण सरपंच,बनाहूँ सबके बनता।
सेवा रहिही पोठ,संग जब देवय जनता।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र'धनगंइहा'(कवि)
नवनिर्वाचित सरपंच, ग्राम पंचायत धनगाँव
उपाध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

पेट

*कुण्डलियाँ*

_*पेट*_

_*भरता जिसका पेट है,रहे वही है मौन।*_
_*दीन दुखी लाचार को, पुछे भला अब कौन।।*_
_*पुछे भला अब कौन,काम जब बन है जाता।*_
_*स्वार्थ का संसार,कौन है किसको भाता।।*_
_*रहे कहाँ से ध्यान,नहीं मन अब कुछ करता।*_
_*चंगा रहे शरीर,पेट है जब जब भरता।।*_

_*भूखा रहकर कब तलक,कैसे भजन सुनाय।*_
_*मुख से निकले राम जी,दिल से निकले हाय।।*_
_*दिल से निकले हाय,पेट जब भूखो मरता।*_
_*होकर के मजबूर,काम है फिर भी करता।।*_
_*दिन गये है बीत,खाय जो पत्ता सूखा।*_
_*रहकर सब यूँ मौन,सहो जी बनकर भूखा।*_

_*तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा*_

चुनाव माहोल

माहोल चुनाव बड़ छाए हे।
सबो समिति आगू आए हे।
मांग अड़बड़ हवय तिरपटहा,
प्रत्याशी के मति छरियाए हे।


जेन मिलथे सब काहत हे,
तुहीच ल देबोन वोट हम।
तोला रहिबोन सब चिनके,
फेर झिन करबे नोट कम।
जनता मन के चारो कोती,
हाथ दुनों अभी हरियाए हे।
मांग अड़बड़ हवय तिरपटहा,
प्रत्याशी के मति छरियाए हे।

आथे जब गाँव मा प्रत्याशी,
जनता ल गजब रिझाए बर।
देखा के अपन चुनाव चिनहा,
लगथे गा सुग्घर बताए बर।
बिना नोट के वोट नंइ मिले,
भीड़ लोगन नेता ल चेताए हे।
मांग अड़बड़ हवय तिरपटहा,
मति प्रत्याशी के छरियाए हे।

रीत हे देखव याहा कइसे ,
दानी ह लालची होवत हे।
अपन मत के दान करेबर,
ये पइसा खातिर रोवत हे।
गाँव समाज ल छोड़ सब,
अपनेच सुवारथ सधाए हे।
मांग अड़बड़ हे तिरपटहा,
मति प्रत्याशी के छरियाए हे।

गाँव के बढ़िहा विकास करय,
अइसन मुखिया बनावव जी।
मिलजुल के मोर संगी साथी,
गाँव ल सरग सजावव जी।
सच्चा ल चुनव अच्छा चुनव,
अतरी 'धनगंइहा' सोरियाए हे।
मांग अड़बड़ हे तिरपटहा,
मति प्रत्याशी के छरियाए हे।
माहोल चुनाव बड़ छाए हे।
सबो समिति आगू आए हे।
मांग अड़बड़ हवय तिरपटहा,
प्रत्याशी के मति छरियाए हे।


तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
उपाध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.
२०/०१/२०२०
९५७५०७०६८९

बुधवार, 15 जनवरी 2020

तुमने जो अगर(परमानंद प्रकाश)

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तुमने जो अगर दिल से पुकारा नहीं होता 
तुम आज मेरे तो, मै तुम्हारा नहीं होता

मै मर ही गया था, तेरे इस जुल्म-ओ- सितम से
जो रब का अगर मेरे इशारा नहीं होता

जिस रात मेरे ख्वाब मे आती नहीं है तू 
उस रोज मेरे दिन का गुजारा नहीं होता

हाँ साँथ मेरे तू जो चले राह में तो ठीक 
बिन तेरे मुझे चलना गवारा नही होता

"परमा" को तेरा प्यार अगर होता जो हासिल
तो गर्दिशो मे मेरा सितारा नही होता

- परमानंद प्रकाश,गुरुर,छत्तीसगढ

सोमवार, 13 जनवरी 2020

जाबो मतदान करे

घनाक्षरी

जाबो मतदान करे,हक ये हमर हरे,
मिले हावे मोका येला, कभु नी गंवाना हे।

चुनबो अपन नेता,सबके हावै चहेता
सुनो मोर भैय्या भौजी,विहीला जिताना हे।

गाँव के बिकास करे,दीन दुख दूर करे,
फले फूले गाँव सारी,सुग्घर बनाना हे।

सुनो सब नर नारी,मिले हावै अब पारी,
देश अउ समाज ला,सुदृढ़ सजाना हे।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
उपाध्यक्ष
मधुर साहित्य परिषद
डौंडी लोहारा

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

विचार

*किसी के चरित्र पर कीचड़ उछालने से पहले अपने निगेहबान की निगरानी रखें कि स्वयं कहाँ है। पक्षी हो या विपक्षी मनुष्य के अंतर्निहित गुण और अवगुण होना स्वभाविक है। लेकिन गुण की अधिकता के कारण अवगुण का निशान छिप जाता है शायद यह ज्ञान कीचड़ उछालने वाले के समझ से परे लगता है। कर भी क्या सकते है।कहा गया है कि*
_*" फुलै फरै ना बेत,जलधि जो बरसहि सुधा।*_
_*मुरख जान ना चेत,मिले जो गुरु बिरंचि सम।।"*_

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

उम्मीदवार के ब्यथा

*उम्मीदवार के ब्यथा*

सऊँख मोरो जी चर्राय राहय
जाके फारम फटले भरदेंव।
लड़हूँ महूँ चुनाव अब कहिके 
गाँव भर मा ढिंढोरा करदेंव।।

बनेबर बर तो मैं बनगे हावँव
सरपंच पद उम्मीदवार मँय।
आगू पाछू मोर कोनों नंइ घूमय
कइसे के करिहँव परचार मँय।।

बीजा छीतेहँव धनहा डोली मा
पानी ला घलोक देवइय्या नंइहे।
लेना जी लेना सबोझन कहिथे
संग में रेंगइय्या कोनो नंइहे।।

देख के कहिथँव ये दूनियादारी
एक बात तो अब समझ आथे।
चलथे जी ओकर आगू पीछू मा
जेन हर पाँवपूट चेपटी पियाथे।।

मँय हर रहिगेंव सिधवा सादा
दाँव पेंच मोला आवय नहीं।
सुनेंव वो मनखे कभू नंइ जीते
जेन कभू पियाय खवावय नहीं।।


मुड़ी ह फिजगेहे पानी मा तब
सुरा ला का अब  डरराना हे।
होही जइसन राम जी राखय
पाँव नंइ चिटको हटाना हे।।

कहिथे तोषन सुनगा भैय्या
डर के आघू मा ही जीत हे।
नहीं काहत हे बहिरी ले जेन
भीतरे भीतर ले तोर मीत हे।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.
9575070689

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

बतिया

अलंकार की जानकारी

एक प्रयोग और देखें (सफल निष्फल के निर्णायक आप) 

*श्लेष अलंकार:-*
*एक शब्द में एक से अधिक अर्थ जुड़े हों (जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो किंतु प्रसंग भेद में उसके अर्थ अलग-अलग निकलते हों वहाँ पर श्लेष अलंकार होता है।*
*1 काँसा* 
*2 भाव*

*मानवीयकरण अलंकार:-* 
*अमानव ( प्रकृति, पशु-पक्षी व निर्जीव पदार्थ में मानवीय गुणों का आरोपण करना मानवीयकरण अलंकार कहलाता है* जैसे:- 
*काँसा मूरत रो रही*

*विप्सा अलंकार;-* 
*मनोभावों को प्रकट करने के लिए शब्द को दुहराना (विप्सा-दुहराना)* जैसे 
*छि: छि: -- तिरस्कृत , घृणा योग्य*

'कौशिक' काँसा हिय व्यथा, रोया काँसा जातु।
काँसा मूरत रो रही, भिक्षु-पात्र, लघु, धातु ।
भिक्षु-पात्र, लघु, धातु, भाव बिन पीछे रहते।
कौन समझता दर्द, सुनाकर किसको कहते॥
छि: छि: उठता प्रश्न, बने फिर कैसे लौकिक। 
भिक्षु-दान, लघु, धातु, विवाहों में क्यों 'कौशिक' ॥ 
*संजय कौशिक 'विज्ञात'*

शब्द- अर्थ 

*'जातु' अवयव* (कदाचित्) कभी 
काँसा - कनिष्ठ, भिक्षुक पात्र, धातु 
भाव- भावना/ मूल्य/ भाव (गूढ़ विचार) 
भिक्षु - भिखारी 
कनिष्ठ- लघु

चरण 11, लघु के बाद यति 
लघु का अर्थ कनिष्ठ: 
बहन के फेरों के बाद जब बहन पहली बार दुल्हन बन ससुराल जाती है तब कनिष्ठ महत्वपूर्ण हो जाता है उसे साथ भेजा जाता है।

*धातु-काँसा* लड़की के विवाह के समय दान दिया जाने वाला काँसा का बर्तन खाण्ड कटोरा कहलाता है। (इसके पीछे की परंपरा का अर्थ भिन्न भिन्न स्थान पर भिन्न हो सकता है और कुछ स्थान पर यह परंपरा हो ही ना ऐसा भी हो सकता है) उत्तर भारत में ऐसा बहुतायात देखने में आता है। जिसका अर्थ यह माना जाता है कि आज से हम दोनों परिवार इस कटोरे की तरह एक हुए और हमारे संबंध इतने ही मधुर रहेंगे जितनी इसमें देसी घी और खण्ड हैं 
प्रश्न यही कि काँसा प्रयोग मृत प्रायः हो चुका है ऐसे में इसकी शुद्धता और आवश्यकता परम्पराओं में जीवित है जहाँ काँसा का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है।

*2 भाव* 
धातु ... भाव मूल्य (सोने सी महंगी न हो)
लघु .... भाव विचार (समानता का भाव न हो)
भिक्षु .... भाव दान का (दानवीर के दान करने के  भाव न हों) 

इनके बिना पीछे रहते हैं

देखा बिकता वोट

राम नाम

राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...