मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

तै बरत रहिबे बाबा....

पंथी गीत
तै बरत रहिबे बाबा....
तै बरत रहिबे बाबा दीया बरोबर जैतखाम में
दीया बरोबर जैतखाम में हो२
तै बरत रहिबे....

अमरौतिन दाई तोर ददा महंगुदास हे
गिरौदपुर म जनम धरे नांव घासीदास हे
तै चमकत रहिबे बाबा चंदा बरोबर पुन्नी रात में
तै बरत रहिबे....
ज्ञान सत खोजे बर निकले जंगल झाड़ी हो
धरके तपसी बेस तै आसन लगे पहाड़ी हो
तै दमकत रहिबे बाबा सुरूज बरोबर सुब शाम ले
तै बरत रहिबे....
राखव मन शांति कहिके जग ला बताय हे
जग कल्यान बर गुरू बनके आय हे
तै महकत रहिबे बाबा फूलवा सही हिन्दूस्थान में
तै बरत रहिबे...
मनखे मनखे एके हन एके जीव समाय हे
रख मया सब बर गुरू ज्ञान बताय हे
तै चहकत रहिबे बाबा बनके चिरइया बिहान के
तै बरत रहिबे...
तोरे चरन मा बाबा "जोहर" मांथ नवांय हे
आसीस तोरे पाके बाबा "तोषण" गीत बनाय हे
मैं गावत रइहौं बाबा महिमा गा तोर सतनाम के
तै बरत रहिबे....
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़

रविवार, 18 दिसंबर 2016

पितर

पितर

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भादो महिना अंधियारी पाख
लगे हावय देखव पितर शाख
पानी देवत दुनो अजुरी जोड़
पुरखउती परमपरा बात राख
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होवत बिहनिया अंगना लिपे
सुघ्घर चकचंदन चउंक पुराय
तोरई पाना फूल नीक लगे बेला
पिडहा माढे लोटा दतवन चाय
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पाना तोरई के भाग संहरावय
बरबट्टी करिया मेछरावत हो
फर तोरई संग साग बनावय
बड जोरदरहा रंग जमावत हो
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तीन-तीन घांव तिलांजलि देवय
दाई ददा अऊ पुरखा सोरियाके
भोग लगाथे आके करिया कागा
घूमत घामत सबझन सकलाके
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कथे सियानन पंदरा दिन बर
पुरवज मन परिवार तीर आथे
जनम जनम के भटकत जीवरा
लइका बर आशीष छोड़ जाथे
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-आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा
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मया दुलार हो

लाली लाली चुनरिया दाई साजे सोला सिंगार हो
आस पुरो सब भकतन के रख लेबे लाज हमार हो
आके गोहरावंव मन के दुख पीरा दाई दुवार तोर
बरसावत रहिबो मोर बर अछरा भर मया दुलार हो

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मोर जिंनगी होगे हे अंधियार

सत्य घटना पर आधारित कविता
आप तक सादर समर्पित----------
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
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नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार

नौकरी करत हन जी नाम के
पइसा कउड़ी के ठिकाना निंही
मिल जथे जी दू.....तीन हजार
लाज..शरम सेती बताना निंही
दुसर घर सउघा दीया बरत हे
गरीबी म होवत हे बंटा―धार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
नंइ लेवाय हे ददा बर कुरथा
एकझन लइका बर जींस सेट
बाई कथे मोर बर लेदे लुगरा
सन्न रहिगेंव मेहर सुनके रेट
काहत हवय उपराहा एकठन
मोर बर लेदेतेस सोनहा हार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
खेती खार के गोठे झनकर
बनी भूती म चलथे गुजारा
मिल जथे एदे पैंतीस किलो
आधा बोरी चँउर के सहारा
सोंचथों जातेंव परदेश कमाए
ददा के आंखी होगे हे अंधियार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
करजा के मारे चिंता धरेहे
गुनथों एहा कइसे छुटाही
कब किरपा होही लछमी के
दुख दलिदरी कब ए सिराही
सोंचत-सोचत तन ह घुरत हे
जिंनगी म होही कब उजियार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
©®
आचार्य तोषण, धनगांव डौंडीलोहारा, बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१

हमर मन के गोठ


हमर बने हे अघवा जतका गोठ करथे बड मीठ-मीठ
पेराय खूसियार बरोबर हम हो जाथन सीठ-सीठ
काम करथन हम्मन घंस घंस मंजा कस कस के उड़ाथे
उरक जथे कंहूँ पइसा थोरको हमी ल दोसी ठहराथे
जाथन तिंहा तो कामे करथन घर के काम तियार देथे
कभू खेत डोली कभू सिलेंडर टंकी धरा के बइठार देथे
दस बज्जी जाथन कमाए बर टेम ले कुटेम कमाथन
आथन घर में थके मांदे गोसईनीन ले अउ गारी खाथन
हमर काम ल सेवा हे कहिथे तभो मिलत नंइहे फल
दु आना कि चार आना बढाही मिल जतीस आज कल
काडी मिठई ह बनगे हावे लइका सही भुरियारथ हे
चार महीना बीतत हावे मदारी कस नांच नंचावत हे
जेझन के मुडी म पागा हे सब अपन-अपन में मस्त हे
अइसन मस्तीजाद के मारे हालत हमर इहाँ खस्त हे
देख इंहा के रांगा चागा मुंह ले बिलई के नंइ निकले मिऊ
असने करम देख कथे सियान लल्लड जांता के लल्लड पऊ
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा

मन का बिचार

एक सिपाही सीमा मे डटे हे ।अइसन देवारी तिहार म । त मन म का बिचारत हे। का काहत हे
आवव देखन ।कविता के चार लाइन हमर देस के जवान मन बर सादर समर्पित.......
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स्वदेश सेवा म लगे मोर तन कइसे गांव आवव
मोर जोही दिल के रानी कइसे देवारी मनावंव
दाई ददा ल समझादेबे आस के दीया जलालेबे
आज नही ते काली बैरी लहुट आहूं अपन मैं ठांव
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आथे सुरता घर-परवार के ओ गली-खोर अंगना
ओ गांव के सुखा मैदान खेलन जिंहा संगी संगना
मोला सताथे मुसकावत चेहरा आघू-आघू झूलय
पैरी के छून-छून रानी हांथ ल भावय तोर कंगना
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भेजदेबे देवारी खीचरी दीया फरा नवा पिसान के
तोर मया के चिनहारी मोर बिरह पीरा ल सान के
मोर गांव शोर संदेश बतादे बबा के गोठ सुनादे
गाय बछरू के हाल सुनादे कइसे हाल गौठान के
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रद्दा मोर देखत रहिबे आंखी ले रातदिन निहारत
आ जहूं मैं झटकू रानी कोयली कस कुकुही पारत
झन करबे तै शोक शोगारत अइसन खुसी के बेरा
कहे जवान 'तोषण' परब देवारी मनाले दीया बारत
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जम्मो मोर देश के जवान मन शत् शत् नमन करत देवारी तिहार के खाला खूझर बधाई
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छत्तीसगढ़

गोवरधन पहार

गोवरधन पूजा के बधाई देवत चार लाईन
समरपित
गोवरधन पहार
कुम्हड़ा कोचई कटकट मही
चुरत हाबे बरा अउ सोहारी
नवा चंऊर के खीचरी राधे
जुरमिल खवाबो आरी पारी
गोरधन खोंचे मेंमरी सिंघोटी
हुम धुप नरिहर धरके मनाबो
अन्नकूट सम पबरित तिहार
गउ महतारी के आशीष पाबो
जेकर कोरा म जड़ी बूटी दवई
भरे हबे जिंहा अकछय भण्डार
सबके आस पुरोथे निसदिन
अइसन हवे गोवरधन पहार
राऊत मनके पुरखौती देंवता
नीत कोरा म गइय्या चरावय
बनके गोप गुवाला संन मा
मुरलीधर मुरली बजावय
सरदी गरमी बरसात सहिके
गउ माता के पोसन करथे
सबके गोवरधन पहार तै
"तोषण" घलक पाव परथे
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छत्तीसगढ़

लिये मुसकान होंठों पे

लिये मुसकान होंठों पे दिलबर हमसे
खुली छत पर युँही मिलने आ जाते हो।
करके चोरी दिल की चुपके―चुपके तुम
उड़ते बादल की तरह छुप जाते हो।
आँखों ही आँखों में अपनी करके इशारा
गहराइयों में दिल की उतर जाते हो।
आते नहीं कभी मुलाकात करने 'तोषण'
रातों की तन्हाई में तुम तड़पाते हो
©®
आचार्य तोषण धनगांव९६१७५८९६६७
१६/११/१६

सुप्रभातम्...


छोड़ पंछी अब नीड को ,बढ़े गगन की ओर।
इंद्रधनुषी किरणों संग, जगा रही है भोर॥
जगा रही है भोर , करले कदम तू आगे।
हुआ दिवस देखकर,निशा दूर-दूर भागे।।
सूरज आया देख,किसन छेेेड़े है बंशी।
सरर सरर की तान,नीड को छोड़े पंछी।।

© ®आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

है सुनिश्चित

है सुनिश्चित जनम मरण, मनवा क्यों तू सोंचे।
चिंता से चतुराई घटे, केश बिरथा क्यों नोंचे।।
कर्म तेरा अधिकार है, फल की चिंता छोड़।
भर भर देंगे ईश्वर तुमको, कर्म से रिश्ता जोड़।।

जो नर श्रद्धावान यहाँ, प्राप्ति ज्ञान की होत।
अज्ञानता की यान में,अशांत मन क्यों ढोत।।
सत्संग है कुबुद्धि हरती,वाणी सत्य से सींचती।
ज्ञान पापों से करते दूर,चहूँ दिक् बढती कीरती।।

करले संगत सज्जन के,मिलेगा सच्चा ज्ञान।
गुणी विवेकी बनोगे तुम, कहाओगे श्रद्धावान।।
विद्या देती विनय सबको, मिलता सबका मान।
विद्या सम कोई चक्षु नही,तम हरती दीप समान।।

सबको अपना जानों तुम, करो सभी का आदर।
कहना सबसे मीठी वाणी,कभी न होगा अनादर।।
मान मिले सम्मान मिले, बनके रहो नित प्रिय।
लगे रहो हित करने सबके, करम न हो अप्रिय।।

झुकाना है गर संसार को, सीखें सर्वदा झुकना।
आँधी आए तूफाँ आए,मग में कभी न रूकना।
कोई रोके कोई टोके, मत किसी की सुनना।
करना है कर्म तुमको, सदा हृदय में गुनना।।

कर्म अच्छा करते जाना,करना कभी गुमान नही।
राह मिलेगी फूलों की, मिलेगा न चट्टान कहीं ।।
दोष न देना जगवालो, मुझको कुछ नही आता।
लिख देता मन की बातें,जो मेरे मन को भाता।।

बनके तारा एक दिन मैं, घोर निशा में चमकूँगा।
बनकर फूल बगिया में, बहती पवन संग महकूगा।।
उडता रहूँ उन्मुक्त गगन में,पक्षी बनने की कामना।
मिलती रहे हमें सदा,विप्र आपकी शुभकामना।।
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगांव
डौंडीलोहारा छतीसगढ ४९१७७१

एक पाव

आज काल के दिन म अइसने चलत हे
 तेला चार लैन म तुंहर आगू समरपित


जाथों ददा सन टूरी खोजे गांव ले ओ गांव
होथे सांझ मोर ददा जमा देथे एक पांव
टुरी खोजय म गोड हाथ पिरागे कथे ग
एक पाव पीये बिन घर म नंइ जांव
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

वाह रे आतंकवाद..."

एक नानकून ल इका के मनोभाव ल उकेरत चार लैन आप सबके नवकंज पद म समरपित

वाह रे !आतंकवाद
बनहूँ तोर बर फौलाद

होन दे मोला बड़े
देखत रहिबे खड़े-खड़े
सैनिक देशी बनके
रहूँ सीमा तीर तनके
आ कभू सीमा तोड़
देंहूँ तोर आँखी फोड़
आगु म बम बन जाहूँ
तन ल तोर आगि लगाहूँ
कसम हवे माटी के
पिहुँ लहू तोर छाती के
तिरंगा मोर मान हे
मोर भारत के शान हे
मिट जही नाम निशान
करबे कोंनो अपमान
भारत के लइका अंव
एक में कोरी खइका अंव
लड़त भले मर जाहूँ
फेर पहिली मार गिराहूँ
होही जी नांव अमर
भजही तोषण डगर-डगर
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१

क्यूँ

क्यूँ

इंसानियत को मारकर मर रहा है क्यूँ
होकर इंसान इंसान से डर रहा है क्यूँ
जगा अपनी ईमान खड़े हो अपने पैरों में
बिना पिये शराब यहाँ बहक रहा है क्यूँ

सुप्रभातम् सूरज

सुप्रभातम्
सूरज भास्कर नाम तुम्हारे
सदा करते हित का काम..
हो तुम सबकी प्रेरणा पुंज
तुमको मेरा कोटि प्रणाम...

अलसुबह होता है दीदार तेरा
कली खिल जाती तेरे आने से..
यूं ही हमेशा मुस्कुराते रहना
जगता जहान तेरे मुस्कुराने से...
है दमकता गुलशन गुलशन
आलोकित होता जहान है..
अवनि है तुझसे ही शोभित
तुझसे ही आसमान है...
सबको मेरा सुप्रभातम् है
पूर्ण हो सबकी कामना ..
पथ निरतंर चलते रहना
रूकने का हो नाम ना...
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद

संगवारी के गोठ

संगवारी के गोठ ल का काहंव
मोर बर मंदरस के झोर हे
बंधाय अइसन पीरीत के बंधना
जइसे पटवा के डोर हे

 आज नहीं तो कल होगा
हर मुश्किल का हल होगा
आँख से आँसू बहाना मत
यह इक दिन गंगा जल होगा

 माँ बाप का उपकार बड़ा
हमे सत्मार्ग दिखाते है
प्रतिफल की चिंता नही
सदा ही फर्ज निभाते है

परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

मेरा लेख आप सबको समर्पित

परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

एक गरीब लड़का है सोनू । जो अपने पिता जी के होटल मे दिन रात काम करता है। उसके मन मे पढने की तीव्र इच्छा थी। लेकिनस परिवार की स्थिति को देखकर अपनी इच्छा अपने मन के अंदर ही दबाकर रखा रहता। क्या करता बेचारा पिताजी एक पैर से अपाहिज होटल का गल्ला सम्हालता । माताजी और छोटी बहन सोनिया होटल के काम मे हाथ बटाती। इस तरह उसका जीवन चल रहा था।
एक दिन एक गुरूजी होटल मे चाय पीने आए ।चाय का आर्डर देते हुए पेपर पढने लगा । सोनू चाय लाकर गुरूजी को देकर वहीं खडा हो देखने लगा । जिस पर लिखा था " तेरह वर्ष का बालक पढाई स्तर पर जिला में अव्वल आया है।"इसे देखकर सोनू दुखी हो गया । सोनू को दुखी देखकर गुरूजी कहने लगा -अरे सोनू आज दुखी क्यों है ?इतना उदास क्यों है? तब सोनू कहता है-"काश !वो अव्वल आने वाला बालक मैं होता। इस बात को गुरूजी सुनकर चौंक जाता है और सोनू से पूछता है । भला तू ऐसा क्यों कह रहा है? तब सोनू अपनी सारी व्यथा गुरूजी के सामने रख देता है। सारी सच्चाई जानने के बाद गुरूजी सोनू के माता पिता को समझाईश देते हुए कहते है-"अपने बच्चे सोनू और सोनिया को पढने के लिए स्कूल जाने दो ।पढेंगे लिखेंगे तुम दोनो का नाम रौशन करेंगे। इस तरह होटल मे काम करने से इनका जीवन यहीं सीमित हो जाएगा। मैं इन दोनों की पढाई का जिम्मा लेता हूं। इनके बदले मजदूर लगाकर अपना होटल सम्हलना । गुरूजी का उपकार मानते हुए अगले दिन सोनू और सोनिया को स्कूल भेजने लगे।
सोनू और सोनिया की पढाई रंग लाने लगी ।हमेशा अव्वल आने लगे। माता पिता और गुरूजी भी खुश होने लगे।
गांव की पढाई खत्म होने के बाद सोनू और सोनिया को शहर के अच्छे कालेज मे दाखिला मिल गया ।दोनों भाई बहन मन लगाकर पढने लगे। समय ने ऐसा रंग लाया दोनो एक बार फिर अव्वरल दर्जे से पास हो गये। दोनो भाई बहन बहुत खुश होने लगे ।इस खुशी को मनाने वे दोनो अपने गांव गाव आना चाह रहे थे। फिर क्या था ।एक दोनो भाई बहन अपने गांव आये और सीधा अपने माता पिता के पास होटल में पहुंचकर चरण स्पर्श किए और सीधा एक ही सवाल सोनू ने पूछा-"क्या ?वह गुरूजी आज भी हमारे होटल में चाय पीने आते है । सोनू के इस सवाल को सुनकर बीती बातों को सोंचते हुए माता पिता की आँखों में आँसू आ जाता है ।उसे पोछते हुए बड़े सरल भाव से अपने बच्चों से कहते है -"हां बेटा !
उसी समय वह गुरूजी होटल में आकर चाय का आर्डर देते हुए पेपर पढने लग जाता है तब सोनू अपने हाथ से गुरूजी को चाय सौंपकर प्रणाम करता है । तब गुरुजी पूछने लगता है -"अरे भाई तुम कौन हो ?और मेरा पैर क्यो छू रहे हो? तब सोनू अपनी पूरी कहानी बताता है और धन्यवाद देता है-"आज अगर हम यहाँ पर इतनी पढाई लिखाई किये है तो सिर्फ आपकी ही वजह से किये । गुरूजी उन बच्चों को आशीर्वाद देते हुए अपने घर की ओर चल पडते है

© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा

वंदन है

वंदन है उन गुरू चरणों में कृपा जिनकी हम पर है
नमन है माता-पिता को जीवन जिनके दम पर है
राह दिखायें जीवन पर्यन्त मिलता रहा प्रेम सदा
मरके भी उऋणी न होंगे ऐसा ऋण हम सब पर है
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

मोर छत्तीसगढ़ के माटी

छत्तीसगढ़ महातारी ल समरपित
गीत
शीर्षक :"मोर छत्तीसगढ़ के माटी"
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन २
मांथ लगावंव चंदन तोला २
मोर छत्तीसगढ़ ....

तोर कोरा म जनम अउ
तोरा कोरा म बाढ़ेंव २
सूरुज जोत म करंव आरती
दणडासरन पखारेंव २
फूलपतिया धर पंइया परके २
तोला करथंव बंदन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन........१
महानदी अउ अरपा पइरी
कोरा तोर हरियावय २
नंदिया नरवा डोंगरी पहाड़ी
हरिहर अछरा भावय २
चिरई चिरगुन सुआ पंड़की २
करथे कोयली कुंजन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन......२
रीसि मुनि अउ देव धामी के
सरधा भरे देवालय २
तोर चरन मोर तीरथ बरोबर
मया पीरा के आलय २
कन कन म इंहा राम बसे हे
धूर्रा माटी हे कंचन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन......३
छत्तीसगढ़ही गुरतुर बोली
सबके मन ल भावय २
राऊत नाचा करमा पंथी
सुआ ददरिया गावय २
किसम किसम के फुलवा फुले हे
जइसे लगे बन नंदन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१
चलितभाष ९६१७५८९६६७
दिनांक ९/१२/२०१६

भुला पाओगी कैसे

आना चाहती थी वो जिन्दगी में हमारी
"तोषण"
कम्बख्त वक्त ने कर दिया दूर मुझसे

 सरदार है हम सभी बेवफाओं का
"तोषण"
सीखते है हमीं से बेवफाई करना


भूल गयी तू उन सब कसमों उन वादों को
मै तो वो एहसास हूँ वो सांस हूँ इसे भुला पाओगी कैसे

राम नाम

राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...