रविवार, 18 दिसंबर 2016

लिये मुसकान होंठों पे

लिये मुसकान होंठों पे दिलबर हमसे
खुली छत पर युँही मिलने आ जाते हो।
करके चोरी दिल की चुपके―चुपके तुम
उड़ते बादल की तरह छुप जाते हो।
आँखों ही आँखों में अपनी करके इशारा
गहराइयों में दिल की उतर जाते हो।
आते नहीं कभी मुलाकात करने 'तोषण'
रातों की तन्हाई में तुम तड़पाते हो
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आचार्य तोषण धनगांव९६१७५८९६६७
१६/११/१६

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