छत्तीसढ़ मोर मान रे..
मैं टुरा छत्तीसगढिहा छत्तीसगढ मोर मान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे
कोरा जेखर खेलेंव कुदेव छंइहा जेखर बाढेंव
गाएंव गाना पारेंव हाना कोयली कुहूकी पारेंव
हरियर हरियर दाई के अचरा सोनहा कस धान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे
चंदर पुरहिन बिलई माई डोंगड़गढ़ बमलाई
रतनपुरहिन माहामाई संबलपुर समलाई
दंतेवड़हिन दंतेसिरी जग बढावय मान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे
बीर नरायेन के जनमभूमि श्रृंगी के गाँव हे
भगत माता कर्मा जिंहाव शबरी के ठाँव हे
बरसे नवधा भक्ति जिंहा राम करथे बखान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे
भेलई कोरबा दल्ली राजहरा सबके आस पुरोवत हे
देस परदेस ल भाईचारा म तार ले तार जुड़ोंवत हे
अमर होगे मैतरी गार्डन भारत बधिन मितान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे
जेकर कोरा उपजत हावय हीरा मोती पन्ना
चना राहेर कोदो तिली भर्री जागेहे गन्ना
दुनिया भर होवत हावय मोर छत्तीसगढ के मान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे
बोलव सुनव गावव बजावव छत्तीसगढिही बोली
मया पीरीत के घोरे सरबत करव हँसी ठिठोली
हाँथ जोड़के "तोषण" घलो सुनावत हे तान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे
रचना:-
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगाँव डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ
४९१७७१
मो.९६१७५८९६६७
टीप:-कृपया रचनाकार की मेहनत के साथ खिलवाड़ न करते हुए समूल रुप में साझा करें!
कापी arhkepagakalagi.blogspot.com पर सुरक्षित है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें