निकल धरिणी के गर्भ से बन सरिता वो बहती है ।
कलकल छलछल करती हुई वअग्रसर वो रहती है ।
गहन तिमिर से मुझे निकालो दुनियाँ के गुलजार में ,
अंतर्निहित दबी प्रतिभा मेरी कविता वो कहती है ।।
तोषण कुमार चुरेन्द्र ९६१७५८९६६७
राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...
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