बुधवार, 26 अप्रैल 2017

कविता

निकल  धरिणी के गर्भ से  बन सरिता वो बहती है ।
कलकल छलछल करती हुई वअग्रसर वो रहती है ।
गहन तिमिर से मुझे निकालो दुनियाँ के गुलजार में ,
अंतर्निहित दबी  प्रतिभा मेरी  कविता वो कहती है ।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र  ९६१७५८९६६७

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