#लेने के #देने की
खा-खाकर ठोकरें बड़ा हुआ हूँ
आदत नही मेरी ठोकर देने की,
फूल बरसा ,काँटें बिछा राहों पर
नसीब समझ आदत है लेने की,
मिलेगा यहीं कहीं जाएगा नहीं
करदे भले देरी रब मुझे देने की,,
बाज़ न आऊँ आदत से अपनी
चाहे पड़ जाए लेने के देने की,,
तोषण कुमार चुरेन्द्र
arhkepagakalagi.blogspot.com
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