मुखिया अपने गाँव में,
आन बसे है तीन।
अपनी ही बस हाँकते,
लाख बजा लो बीन।
कारज कितना भी भला,
सही मिले ना दाम।
रखते ऐसी चाहतें,
अच्छा हो परिणाम।।
खाना ही दोगे नही,
कैसे लोगे काम।
समझो ना अब तुम यहाँ,
अपने को गुलफ़ाम।।
राजा अपने दास को,
समझे कोल्हू बैल।
तन मन धन शोषण करे,
पेर निकाले तैल।।
आने का है भान सब,
जाने का ना लेख।
अपना भी परिवार है,
घर पर जाकर देख।।
मीठा मीठा बोलके,
मन को लेते फाँस।
रखलें अपनी बात तो,
टाल देत है हाँस।
अपनी टोली में सभी,
रखते मुँह को बंद।
सुनके ही रह जात हैं,
करके नाड़ी मंद।।
खून पसीने सींचते,
देते विद्या दान।
समझें इनकी भावना,
दें नव वेतन मान।।
पेट अगर होगा भरा,
मुख से निकले वाह।
लात पड़े जो पेट में,
निकले दिल से आह।।
धन तो है मिलता नहीं,
मिलता केवल मान।
भूखा रहके हम मरें,
नहीं किसी को भान।।
लक्ष्य गर मिलता नहीं,
बदलें अपनी राह।
पा जाओगे साथियों,
जो है मन में चाह।
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