*-:तोषन के दोहे पंच:-*
माथ पकड़ रोता रहा, बदरा देख किसान।
हुई मिजाई है नहीं, पड़ा धान खलिहान।।१।।
टिपटिप करती ही रही, देखो आधी रात।
बिन दुल्हा जस है लगे, बिन मौसम बरसात।।२।।
ध्यान नहीं दिन रात की , घड़ी घड़ी आँसू धार।
मन आया तो हँस लिये, ये मेघा कचनार।।३।।
पड़े समय की मार जब, मरते जात किसान।
बिन मौसम बरसात ये, कैसा ये दिनमान।।४।।
मिट्टी में है मिल गई, देखे सपने सार।
जीना मरना क्या कहें, है किसान लाचार।।५।।
तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंडी लोहारा बालोद छत्तीसगढ़
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