शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

साक्षात्कार

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी,  वैसे तो आप किसी परिचय के मोहताज नहीं है। लेकिन फिर भी हमारे पाठक आपका परिचय आपके शब्दों में जानना चाहते हैं?

*तोषण*:-गुरुदेव को सादर प्रणाम!  सबसे पहले आपको विज्ञात छंद के सृजक के रूप कोटि कोटि बधाई व शुभाकामनाएँ।मेरा नाम तोषण कुमार चुरेन्द्र और साहित्यिक उपनाम "दिनकर" पिताश्री जोहर लाल चुरेन्द्र और माता श्रीमती कैलेन्द्री बाई चुरेन्द्र। ग्राम धनगांव में मेरा जन्म 28 जून 1984 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। हम चार भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ा हूं ,और तीन बहने ललिता/टीकम ,सरिता/खेमलाल और सबसे छोटी तुलेश्वरी जिनकी शादी इस वर्ष होनी है।पत्नि श्रीमती चित्ररेखा पुत्र डुमेश कुमार कक्षा 7वीं। मेरी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम धनगांव के प्राथमिक पाठशाला में हुई और पूर्व माध्यमिक शिक्षा व हायर सेकेंडरी शिक्षा शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय डौंडीलोहारा में हुई। 2003 मे माता के देहावसान के कारण पारिवारिक जिम्मेदारी उठाते हुए उच्च शिक्षा पूरी नहीं हो पाई। इग्नू के तहत डी.एड की परीक्षा उत्तीर्ण की ।सत्र 2008 से सत्र 2019-20 तक मैं सरस्वती शिशु मंदिर डौंडीलोहारा में आचार्य (शिक्षक) के पद पर आसीन रहा ।तदुपरांत इस वर्ष त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में विजयी होकर सरपंच के पद पर अपना दायित्व निर्वहन कर रहा हूं।साथ ही मधुर साहित्य परिषद डौंडी लोहारा का उपाध्यक्ष पद पर भी दायित्व निर्वहन कर रहा हूँ।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, फिर साहित्य के प्रति आपकी रुचि कैसे जागृत हुई?

*तोषण* :-जहां तक साहित्य के प्रति रुचि का सवाल है तो मैं कक्षा दसवीं से ही समाचार पत्र बाल भूमि और विभिन्न तरह के पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने में ज्यादा रुचि रखता था और साथ ही साथ जो कविताएं ,कथा मुझे पसंद थी उसका कटिंग अपने पास में रखता था और उसको एक भावचर फाइल में गोंद लेकर चिपका देता था। कक्षा पांचवी से ही मैं कला जगत में नाटक, लीला लोक कला मंच आदि-आदि संस्थाओं में सहर्ष रूप से भाग लेता था।जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती गई वैसे वैसे मैंने रामायण रामधुनी, रामलीला ,कृष्ण लीला आदि में भाग लेना शुरू कर दिया। जहां तक बात आती है साहित्य के क्षेत्र में आने की, तो कक्षा 12वीं में आने के बाद सर्वप्रथम एक बार विद्यालय स्तर पर कविता लेखन की प्रतियोगिता हुई जिसमें मैंने अपनी टूटी फूटी भाषा में एक छोटी सी कविता लिखी जिसका शीर्षक था- *आतंकवाद* 
कुछ इस तरह से

*"उठा रहे हैं सवाल दर सवाल*
 *मचा रहे हैं जनसंवाद*
 *कैसे मसला हल होगा* 
*देश से मेरा आतंकवाद"*

2016 में फेसबुक पटल पर श्री रमेश चौहान द्वारा छत्तीसगढ़ के पागा कलगी मंच पर छत्तीसगढ़ी रचनाओं का सप्ताहिक प्रतियोगिता होने लगा जिसे देखकर मैंने भी अपने शब्दों में लिखना शुरू किया, धीरे-धीरे उसमें रफ्तार पकड़ता गया और प्रतियोगिता क्रमांक सात या आठ है, जिसमें मैंने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। इसे देखकर मधुर साहित्य परिषद जिला बालोद छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डॉ अशोक आकाश द्वारा मुझे परिषद में जुड़ने का अवसर प्रदान किया।जहां पर मेरी मुलाकात परम आदरणीय अरुण कुमार जी निगम के शिष्य रमेश जी चौहान से हुई ।जिन्होंने मुझे कविता लेखन कार्य पर सांत्वना देते हुए *दोहा के रंग* पुस्तक सौंपते हुए आशीर्वाद प्रदान किया।और कहा चुरेंद्र जी आप अपनी कलम की गति को हमेशा बनाए रखें निश्चित ही  एक दिन छत्तीसगढ़ में अपना नाम रोशन करेंगे और इसी बात को लेकर मैंने अपना कलम समाज के नाम पर समर्पित कर दिया।डॉ अशोक आकाश ने मुझे अपने साथ जहां-जहां भी जाते वहां संग ले जाते और मुझे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिलता गया ।एक बात और कहना चाहूंगा जब हमारे गांव में रामधुनी प्रतियोगिता हुई तो उसमें एक उद्घोषक छोटू सिंघोलिया राजनादगांव से आया था। उनको देख कर मेरे मन में भी विचार आया कि मैं भी ऐसे ही लोगों के सामने बोलता चलूं और लोग मुझे सुनते रहें।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, साहित्य से पृथक अभिरुचि के विषय क्या क्या हैं ? 

*तोषण* :- साहित्य से अगर हटके अलग अभिरुचि की बात है तो आप सभी लोग जानते हैं कि सबसे पहले कक्षा दसवीं (2001) से मैं मंडली में जुड़ा तब मुझे  लड़की पात्र का अभिनय करने का अवसर मिला। लेकिन जैसे-जैसे शारीरिक बनावट में वृद्धि हुई। फिर मुझे लड़कों वाला पाठ करने के लिए  संचालक महोदय विजय पटेल द्वारा कहा गया। मैं रामलीला, नाटक,कृष्ण लीला, गायन, तबला वादन, माधस व्याख्यान व उद्घोषक का कार्य भी करने का सौभाग्य मिलता है तो छोड़ता नहीं। दसवीं पढ़ रहा था तो मैं बाजा बजाता था सामाजिक वाला, जिसके चलते वादन के क्षेत्र में मैं भी अपना योगदान प्रदान करता हूं।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आपकी पसंदीदा विधा कौन सी है, जिसमें आप ज्यादा लिखना पसंद करते है? 

*तोषण* :- गुरुदेव जहां तक विधा की बात आती है तो सबसे पहले मैंने दोहा ही सीखा उसके बाद अन्य विधाओं में धीरे धीरे रुचि जागृत होने लगी और जाहिर सी बात है आदमी जो पहले सबसे पहले सीखता है,उसी पर ही उसकी विशेष रूचि होती है ठीक उसी तरह मेरा भी लगाव प्राथमिकता क्रम में दोहा और कुंडली ही है।बाकी विधाएँ स्वेच्छानुसार।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, साहित्य की एक वह विशेष बात क्या रही जिसने आप को सबसे अधिक आकर्षित किया ? 

*तोषण* :-साहित्य के क्षेत्र में मैं जो है यहां तक पहुंचा हूं उसका। श्रेय सर्वप्रथम अशोक आकाश जी जिन्होंने मुझे अपने परिषद में जोड़ा और आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान की के बाद धीरे-धीरे रमेश जी चौहान ने मुझे लेखनी को सतत क्रियाशील बनाए रखने में संबल प्रदान उसके पश्चात अरुण कुमार जी निगम ने संघ के 6 परिवार में जोड़ कर मुझे एक संबल प्रदान किया और वहां से धीरे-धीरे सीखने सीखते सीखते से मुझे सानिध्य मिला डॉक्टर संजय कौशिक जी विद्या जो कि हमेशा मेरा मार्गदर्शन मेरा उत्साहवर्धन हमेशा एक प्रेरक के रूप में बढ़ाते रहते हैं और निश्चित ही आपके सहयोग से मैं आज इस मुकाम पर हूं कि लोग मुझे धनगांव में कवि के रूप में जाने लगे हैं गांव में कुछ भी कार्यक्रम होता है तो सबसे पहले बोलने के लिए या कुछ कहने के लिए दो ही व्यक्तियों को बुलाया जाता है एक तो श्री गुरु घासीदास मानिकपुरी मानस मंडली गांव के संचालक विजय पटेल और या फिर तोषन कुमार चुरेन्द्र दिनकर जो आपके सामने हूँ। साधुवाद ज्ञापित करता हूं हमारे उन सभी प्रेरणा स्रोत को जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए शतक मार्गदर्शन प्रदान किया बहुत-बहुत धन्यवाद ज्ञापित करता हूं।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आप अपनी सशक्त लेखनी के लिए जिम्मेदार किसको मानते हैं अर्थात प्रेरणा स्रोत किसे मानते हैं? 
*तोषण* :- साहित्य के क्षेत्र में मैं जो है यहां तक पहुंचा हूं उसका श्रेय सर्वप्रथम अशोक आकाश जी जिन्होंने मुझे अपने परिषद में जोड़ा और आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान की के बाद धीरे-धीरे रमेश जी चौहान ने मुझे लेखनी को सतत क्रियाशील बनाए रखने में संबल प्रदान उसके पश्चात अरुण कुमार जी निगम ने संघ के 6 परिवार में जोड़ कर मुझे एक संबल प्रदान किया और वहां से धीरे-धीरे सीखने सीखते सीखते से मुझे सानिध्य मिला डॉक्टर संजय कौशिक जी विद्या जो कि हमेशा मेरा मार्गदर्शन मेरा उत्साहवर्धन हमेशा एक प्रेरक के रूप में बढ़ाते रहते हैं और निश्चित ही आपके सहयोग से मैं आज इस मुकाम पर हूं कि लोग मुझे धनगांव में कवि के रूप में जाने लगे हैं गांव में कुछ भी कार्यक्रम होता है तो सबसे पहले बोलने के लिए या कुछ कहने के लिए दो ही व्यक्तियों को बुलाया जाता है एक तो श्री गुरु घासीदास मानिकपुरी मानस मंडली गांव के संचालक विजय पटेल और या फिर तोषन कुमार चुरेन्द्र दिनकर जो आपके सामने साधुवाद ज्ञापित करता हूं हमारे उन सभी प्रेरणा स्रोत को जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए शतक मार्गदर्शन प्रदान किया बहुत-बहुत धन्यवाद ज्ञापित करता हूं।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आपके जीवन में कोई ऐसी विशेष घटना जो प्रेरणादायक रही है और आप उसे गर्व से साझा करना चाहते हैं? 

*तोषण* :- कोई ऐसी विशेष घटना तो नहीं है फिर भी एक बार अब उनको बताना चाहूंगा एक बार मैं अपने साडू भाई के गांव में रामायण सम्मेलन में उद्घोषक कार्य करने के लिए गया हुआ था पहली बार था वहां पर मैंने देखा कि विभिन्न जिलों से आए हुए मानस पुत्रों के द्वारा अनेकानेक कथा वाचन गीत आदि की प्रस्तुति करण को देखकर मेरे मन में भी ऐसा विचार आया कि मैं भी दूसरों के संकलन को छोड़कर खुद का रचना बनाकर उसका वाचन करो और उसी दिन से मैंने तू बंदी रचना आरंभ कर दी तब से लेकर आज तक यह प्रक्रिया जारी है और हमेशा यह चलता रहेगा।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आपको क्या लगता है एक लेखक की कलम का उद्देश्य आत्मसुखाय चलना सही होता है या साहित्य और समाज कल्याण करते हुए?

*तोषण* :- मुझे लगता है कि एक लेखक की कलम का उद्देश्य आत्म सुख के लिए ही सीमित ना हो बल्कि समाज को एक दिशा देने के उद्देश्य से हो आज हम देखते हैं हमारे भारतवर्ष में अनेक कवि लेखक हुए हैं जिन्होंने आज भी अपनी लेख के माध्यम से पूरे समाज को पूरे देश को जागृत कर रहे हैं एक बात बताना चाहूंगा जब मैं कक्षा चौथी में था वहां पर मैंने एक पाठ पड़ी थी पांच बातें जहां पर हरपाल सिंह के गुरुदेव द्वारा मुख्य पांच बातें बताई जाती है 1.जो भी तुम्हारा भला करें उसकी बात मानो, 2.बिना योग्य हुए किसी की बराबरी मत करो, 3.किसी की दिल दुखाने वाली बात मत करो दो बातें और याद नहीं आ रहा है। इस प्रकार से पढ़ने वाले के मन में एक विचार उत्पन्न करना ही रचना का सार्थक होना समझता हूं। समाज में एक संदेश जाना चाहिए तभी जो है हमारी कलम की मेहनत सार्थक होगी।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आपकी रचनाओं में साहित्य की लुप्तप्राय समृद्ध शब्दावलियों के साथ-साथ आँचलिक भाषा का समन्वय मिलता है, आप इस पर क्या कहेंगे?

*तोषण* :-  साहित्य में जहां तक भाषाओं की बात है तो आपको बताना चाहूंगा सबसे पहले मैंने हिंदी में ही लिखना शुरू किया था फिर रमेश जी चौहान के संपर्क में आने के बाद छत्तीसगढ़ी में भी लिखना आरंभ किया। हिंदी तो सबको समझ में आती ही है साथ ही साथ मेरे मन में एक बात आई छत्तीसगढ़िया भाइयों को भी लेकर अपनी भाषा में उनके लिए भी लिखूं जिससे कि हमारी छत्तीसगढ़ी परंपरा हमारी संस्कृति रचनाओं में साफ-साफ छलके और लोग उसे पढ़कर एक अपनापन महसूस कर सके।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, एक साहित्यकार के रुप में आपके मित्र और परिवार के लोग आपको कितना पंसद करते है?

*तोषण* :- जहां तक मेरा साहित्यकार होने का सवाल है तो गांव के लोग मुझे एक साहित्यकार के रूप में नहीं जानते थे बल्कि एक उद्घोषक एक गायक एक तबला वादक के रूप में जानते थे। जब मैंने 2016 से लिखना शुरु किया था तो उस समय मुझे कोई नहीं जानते थे कि तोषण भी लिखता है रचना करता है क्योंकि उस समय मुझे ऐसा कोई माहौल नहीं मिला था कि लोग मुझे साहित्यकार के रूप में समझे, जाने। साहित्यकार के रूप में मैं तब उभरकर आया जब  मधुर साहित्य परिषद में जुड़ा।उसके बाद  डॉ अशोक आकाश जी के साथ अनेक मंचों में प्रस्तुति देना शुरू हुआ और फिर इस तरह मेरा कारवां बढ़ता गया, मुझे इस बात की खुशी है कि इतने सालों बाद मेरे गांव में इस वर्ष (2019-20) मुझे *साहित्य के दीपक के सम्मान* से सम्मानित किया गया। तब मुझे लगा कि अब गांव के लोग भी मुझे एक साहित्यकार के रूप में समझने लगे। मेरे मित्र और परिवार के लोग मेरे इस  क्षेत्र में जुड़ जाने से बहुत ही खुश हैं और मेरे छोटे छोटे जो बच्चे  जिन्हें मैं स्कूल पढ़ाता हूं वे भी मुझ से प्रभावित हैं।जब कभी स्कूल में फंक्शन या कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम हो तो मेरे सारे बच्चे मेरे पास आकर के कहते हैं  आचार्य जी हमारे लिए कुछ नया लिखकर के दो ना, मुझे बड़ी खुशी होती है कि मैं अपने बच्चों को अपने रंग में ढलने के लिए प्रेरित करता हूं। जब मैं शिशु मंदिर पढ़ा रहा था तब बच्चों को आगे आने के लिए भी प्रेरित करता था और 5-6 बच्चे मैंने तैयार कर दिए हैं मंच संचालन के लिए।आने वाले समय में वे लोग मेरा नाम जरूर रोशन करेंगे।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रति आप क्या दृष्टिकोण रखते हैं? आपके विचार से साहित्य को और समृद्ध बनाने के लिए क्या क़दम उठाया जाना चाहिए?

*तोषण* :- आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रति मेरा यही दृष्टिकोण है कि पहले के जो रचनाकार कवि  तुलसी, कबीर रहीम आदि  थे। उनकी रचनाओं में विधाएं थी जैसे दोहा कुंडलियां रोला छंद आदि। लेकिन आज देखने को मिलता है कि साहित्यकार मुक्त छंद में ज्यादा रचना करते हैं प्रभावशाली भी होता है लेकिन मैं यही कहना चाहूंगा कि हमारी संस्कृति हमारी परंपरा हमारा उद्देश्य हमारे वैदिक ग्रंथों में ही निहित है उन्हे अध्ययन करके, आने वाले भविष्य के लिए साहित्य में स्थान देते हुए रचनात्मक कार्य करते रहें। जिससे कि आने वाले भविष्य में साहित्य को एक नया मुकाम हंसी हो सके. इसके लिए हमें भूत को लेते हुए वर्तमान में रचनात्मक कार्य करते हुए भविष्य के लिए सदैव चिंतनशील रहकर साहित्य को उच्चतम शिखर तक पहुंचाया जाए।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, क्या अब तक आपकी कोई साहित्यिक पुस्तक प्रकाशित हुई है?यदि छपी है तो उसके विषय में भी कुछ बताएं।

*तोषण* :- आपको बताना चाहूंगा वैसे तो मेरी कोई साहित्यिक पुस्तक प्रकाशन नहीं हुई है लेकिन परम आदरणीय संजय विज्ञान संजय कौशिक जी विज्ञान के संपादन में हुआ प्रदीप कुमार दास जी के निर्देशन में *हाइकु की सुगंध* में मेरी 8 हाइकु प्रकाशित हुई है जिसमें मेरे उत्साहवर्धन हेतु प्रमाण पत्र भी प्राप्त हुआ है। जगदलपुर में एक साहित्यिक संस्था है जहां पर मैंने रचनाएं *मिट्टी  के दीये* संप्रेषित किये, वहां से भी मुझे सम्मान पत्र प्राप्त हुआ है और अभी हाल में  *प्रधान संपादक संजय कौशिक "विज्ञात" के द्वारा संपादित- कुंडलियां बोलते हैं, ये दोहे बोलते हैं,* इन पुस्तकों में मेरी रचनाएं सम्मिलित हुई है जो कि बहुत जल्द हम सबके सामने आने वाली है।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, जो नए लेखक या कवि आ रहे हैं उनके लिए आपका दृष्टिकोण? उनके लिए क्या सन्देश देना चाहेंगे?

*तोषण* :- जहां तक नए लेखकों या कवियों की सवाल है तो मैं भी अभी नया ही हूं जिस प्रकार में साहित्य के प्रति सोच रखता हूं कुछ नया करने का अनुभव लेता रहता हूं ठीक वैसे ही मैं हमारे नवोदित कवियों से यही चाहूंगा कि वे श्रृंगार के साथ साथ देश के आर्थिक, सामाजिक राजनैतिक ,सास्कृतिक कला के क्षेत्र में समाज को जगाने वाली रचनाएं गढ़ते रहें जिससे कि उनकी रचनाओं से समाज को एक प्रेरणा ,नई दिशा व नयी ऊर्जा मिल सके।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, हमारे लिए कोई दिशा निर्देश देना चाहें तो स्वागत है।
*तोषण* :- गुरुदेव विज्ञात जी! आपके दिशा निर्देशन में आज आपके सामने साक्षात्कार करने लायक बना हुआ हूं  मैं तो कण मात्र भी नही हूँ ,मेरी कोई अभी ऐसी काबिलियत नहीं है कि आप सबको मैं दिशानिर्देश दे सकूं बशर्ते एक सुझाव देना चाहूंगा कि हमारी कलम की सुगंध छंद शाला के माध्यम से विभिन्न प्रकार के सृजनात्मक कार्य चलता रहे जिससे हम जैसे नवोदित साहित्य के पुजारियों का मार्गदर्शन होता रहे और साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं का ज्ञान हम सभी को प्राप्त होता रहे।बहुत-बहुत धन्यवाद।

*जय हिंद* 
*जय भारत* 
*जय छत्तीसगढ़*
*।।जय कलम की सुगंध साला।।*

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