आरजू कब से थी मेरी,
.आज वो हो गयी पूरी.
मिले जो मित्र बालक,
तोषण दर्शन मानिकपुरी.
हुई कुछ साहित्यिक चर्चाएँ,
अपनी क्या मैं बताऊँ.
होकर प्रफुल्लित मैं तो,
मनभँवरा बन हर्षाऊँ.
साहित्य की सीढ़ी हमको,
प्रतिपल चढ़ते जाना है.
राह में हो कोई भी मुश्किल,
बढ़कर शिखर को पाना है.
मिलकर अपने मित्रों से,
अपने भाग्य जगा लिए.
जीवन का अभिन्न अवसर,
हमने रब से पा लिए.
बालक दर्शन तोषण की,
सलामत रहे मितानी.
बसे रहें सबकी जुबाँ पे,
तीनों मित्र की कहानी.
तोषण कुमार चुरेन्द्र
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