घर मे हैं कुछ नही,पढ़ने की सुध नहीं,
भोर से है निकले जो,रोटी की जुगाड़ में।
होटल हो चाहे बासा,रोजी की है इक आशा,
इत उत डिब्बा बीने,बेचें है कबाड़ में।
मारे है गरीबी जिन्हें,बोलो भला कैसे जिये,
पाठशाला जाते नहीं, झाँके है किवाड़ में।
तोषन है गरीब मेरे,फूटे है नसीब तेरे,
बाल होके काज करे,दिल्ली क्या मेवाड़ में।
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगंइहा, डौंडी लोहारा
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