_*मधुर साहित्य*_
मधुर _मधुर साहित्य_ अपनी,
मधुर साहित्य अपनी मधुर।
बढ़ने और बढ़ाने के खातिर,
भरलें अब रग-रग में सरूर।
_आकाश_ की छाया के नीचे,
लोहारा बना जो सुंदर ठाँव।
साहित्यकार हैं जुड़े अनेक,
कितनें शहर व कितनें गाँव।
रखते सबको जो एक समान,
मुखिया _कन्हैया_ की अगुवाई।
_अरूणाभ_ करते हैं आवभगत,
_धनगंइहा_ जी की जोर लगाई।
कोष मधुर को देखे _पीताम्बर_,
अंकुर फूटा हुआ जो नव _उदय_।
खिला _गुलाब_ है अब अपने मग,
नित प्रतिदिन होता रहा सूर्योदय।
_एक्य होकर सब साथ चलें हम,_
_मधुर मधुर परिवार बनें अपना।_
_नीलगगन पर चमके सूर्य बनकर,_
_हम सबका हो अब एक सपना।_
★ _रचना_ ★
_तोषण कुमार चुरेन्द्र_
_धनगंइहा, डौंडी लोहारा_
_9617589667_
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