रविवार, 20 नवंबर 2016

काया

काया बने माटी के , मिलही बनके धूल ।
बेंत बरोबर रही जबे , खिले न कोई फूल ।।
खिले न कोई फूल , बिरथा रही जिनगानी ,
अही नही कुछु काम , झन बनव जी अभिमानी ।
सुन तोषण के बात , नाँँच नचावय जी माया,
धन दौलत सब रही , सरग नइ जावय काया ।।

©®
आचार्य तोषण

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