होवत भोर भुइंया के, चरन नवावव मांथ।
करव सेवा तन मन ले, रही तुंहर नित सांथ।
रही तुंहर नित सांथ, बाड़ही अन धन भंडारा,
रही सुखी घर द्वार, बहे जिंहा मया धारा।
तै हरस बडभागी , धरे जनम जिहां रोवत,
कर करम तैह बने, छोट ले बुढ़वा होवत।।
करव सेवा तन मन ले, रही तुंहर नित सांथ।
रही तुंहर नित सांथ, बाड़ही अन धन भंडारा,
रही सुखी घर द्वार, बहे जिंहा मया धारा।
तै हरस बडभागी , धरे जनम जिहां रोवत,
कर करम तैह बने, छोट ले बुढ़वा होवत।।
आचार्य तोषण
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