बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

मंदू मन बर

मंदू मन बर
आवत हे नव रातरी चंदा रसीद बनावत हे
पइसा सकलाये जाने भट्ठी डहर जमावत हे
खाए नी मिले नवरात म कुकरा ल घटकावत हे
कुकरा खाए बिहान के दुरगा दाई ल मढावत हे
देखेहव नवरात म सब मंदहा पिये बर छोड देथे
नवरात उरकथे जइसने मुड़ी सुध जाके बोर देथे
गुनत रहिथो मेहा तोषण असनो का नवरात मनइ
ऊप्पर मा हे राम राम तन भीतरी हे बन कसइ
छोडना हे सबर दिन बर छोडव नवदिन बर काबर
तहूं सुधरबे घरो सुधरही सकलाही सुख के गागर

-आचार्य तोषण

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