गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

क्यों नहीं..

क्यों नहीं..
मेरी लिखी हुई वो दर्द की
बात कोई गुनता क्यों नही
निकले दिल से आह बनकर
ये अल्फाज सुनता क्यों नही

बहुत हो चुकी अब चांद को
जर्रो जमीं पर लाने की बात
जमीं को चांद पर ले जाने का
सपना कोई बुनता क्यों नही


हर किसी की चाहत है यहां
तख्ते ताज पर जाके बैठना
शिवाय मेहनत के बागबां पे
युंही गुल खिलता क्यों नहीं
-आचार्य तोषण

हैप्पी राखी

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