गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

काबर रिसाए...

काबर रिसाए...
काबर रिसाए मैना मोर । तडपत हबे चोला मोर
पीरीत के बोली बोल ।
 मया के केवडिया खोल
मुसकइ चेहरा झूले झूल ।
मोर हिरदे फूले फूल
रेंगना देख चंदा लजाए । लाज मरे बेर मर जाए
हिरनी सही आंखी तोर ।
 लुगरा भावे सांखी तोर
बइहा बन किंजरों खोर ।
 सुधबुध घलो नंइहे थोर
झिन दिखाबे मोला आंट । मया के दुख पीरा बांट
सुरता ह आथे दिन रात ।
कतक काहंव मनके बात
बता मोला तैहर आज ।
काबर हस तैहर नराज
झनले अब तोषण के जान । झन रिसा अब बात ल मान
आचार्य तोषण

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