गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

राखी ल...

राखी ल...
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना
कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे
लहरावत जाबे दुनों पाखी ल

दाई ददा के दुलारा बेटा
भइय्या मोर तै हीरा असन
पेट गुजारा करेके सुध म
बसगे जाके अब दूसर वतन
बइठके दाई के कोरा म
कोन खही अब बासी ल
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना
कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे
लहरावत जाबे दुनों पाखी ल
आजा लहुट सुन मोर भाई
ए भुइंया हर तोला बलावय
कइसे भुलागे दाई के सुरता
तोला रोज जे खेल खेलावय
तोर बिना इंहा कोन करही
खेती डोली के बियासी ल
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना
कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे
लहरावत जाबे दुनों पाखी ल
दाई ददा के सेवा जतन म
मिलथे जनम जनम के पून
मोर कहिनी ल मान ले तैह
बने हकन के बात ल गुन
आके घर छोड़ादे "तोषण"
दाई ददा के धरे बैसाखी ल
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना
कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे
लहरावत जाबे दुनों पाखी ल
-आचार्य तोषण
सुर लय ताल म गलती होय
होही तेकर बर छमा याचना

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