घनाक्षरी
हो जाऊँ जो रूखसत , इस दुनियाँ से कभी ,
आँसुओं को पलकों में , अपनी भर लेना।
तन्हाई का मंजर हो , याद जो आऊँ मैं कभी ,
अफ़सानों से हमारा , दीदार कर लेना।
था कभी मैं तात यहाँ , झरनों सा रहा कभी ,
बनके नदी मैं बढूँ , ऐसी डगर देना।
हंसाया कभी रूलाया , लगाया इल्जाम कभी ,
हुई जो भूल हमसे , मुआफ़ कर देना।
© ®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छ. ग.४९१७७१
चलितभाष ९६१७५८९६६७
हो जाऊँ जो रूखसत , इस दुनियाँ से कभी ,
आँसुओं को पलकों में , अपनी भर लेना।
तन्हाई का मंजर हो , याद जो आऊँ मैं कभी ,
अफ़सानों से हमारा , दीदार कर लेना।
था कभी मैं तात यहाँ , झरनों सा रहा कभी ,
बनके नदी मैं बढूँ , ऐसी डगर देना।
हंसाया कभी रूलाया , लगाया इल्जाम कभी ,
हुई जो भूल हमसे , मुआफ़ कर देना।
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आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छ. ग.४९१७७१
चलितभाष ९६१७५८९६६७
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