बुधवार, 29 मार्च 2017

छत्तीसगढ मोर मान रे...

छत्तीसढ़ मोर मान रे..

मैं टुरा छत्तीसगढिहा छत्तीसगढ मोर मान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

कोरा जेखर खेलेंव कुदेव छंइहा जेखर बाढेंव
गाएंव गाना पारेंव हाना कोयली कुहूकी पारेंव
हरियर हरियर दाई के अचरा सोनहा कस धान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

चंदर पुरहिन बिलई माई डोंगड़गढ़ बमलाई
रतनपुरहिन माहामाई संबलपुर समलाई
दंतेवड़हिन दंतेसिरी जग बढावय मान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

बीर नरायेन के जनमभूमि श्रृंगी  के गाँव हे
भगत माता कर्मा जिंहाव शबरी के ठाँव हे
बरसे नवधा भक्ति जिंहा राम करथे बखान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

भेलई कोरबा दल्ली राजहरा  सबके आस पुरोवत हे
देस परदेस ल भाईचारा म तार ले तार जुड़ोंवत हे
अमर होगे मैतरी गार्डन भारत बधिन मितान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

जेकर कोरा उपजत हावय हीरा मोती पन्ना
चना राहेर कोदो तिली भर्री जागेहे गन्ना
दुनिया भर होवत हावय मोर छत्तीसगढ के मान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

बोलव सुनव गावव बजावव छत्तीसगढिही बोली
मया पीरीत के घोरे सरबत करव हँसी ठिठोली
हाँथ जोड़के "तोषण" घलो सुनावत हे तान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

रचना:-
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगाँव डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ
४९१७७१
मो.९६१७५८९६६७
टीप:-कृपया रचनाकार की मेहनत के साथ खिलवाड़ न करते हुए समूल रुप में साझा करें!
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तोषण कुमार चुरेन्द्र

उड़ता चलूँ नील गगन में साथ तेरे ऐ "तोषण"
फिक्र नहीं परवाज की राहें हो कितनों मील...

सोमवार, 27 मार्च 2017

गऊमाता

कांहाँ चलदेस तैहा भगवन,छोड़ कलजुगिहा जमाना में
देखना आज तोर गऊ माता,पहुँचत हवे बुचड़खाना में

धरती दाई ल गऊ रुप म
जुगत्रेता म उद्धार करे
द्वापर म तै आके कन्हैया
गइय्यन के सतकार करे

खात रेहे तै कंस्के मनोहर,दुध दही मही ल खाना में
देखना आज तोर गऊ माता,पहुँचत हवे बुचड़खाना में

गोरस जेकर अमरित असन,
गौमुत हावय दवइ समान
गोबर बने जिंहा खातु कचरा,
हरिहर रखथे खेत खलिहान

आज उर्वरा खोवत हावय,युरिया रसायनिक दाना में
देखना आज तोर गऊ माता,पहुँचत हवे बुचड़खाना में

घर में जेकर गऊमाता हे,
सब देंवता के रहवास हे
होय न पूजा जिंहा गऊमाता के,
ऊँकर समूल बिनास हे

बाँटे सबला दुध दही अउ,पेट भरे डारा पाना में
देखना आज तोर गऊ माता,पहुँचत हवे बुचड़खाना में

कतलखाना ल बंद करव,
तोषण संग गोहरावत हंव
गऊ महतारी के सेवा करव,
सबब तुंहला बतावत हंव

सतजुग द्वापर फेर ले आही,ए कलजुगिहा जमाना में
देखना आज तोर गऊ माता,पहुँचत हवे बुचड़खाना में

सुरहिन कपिलन नांव दाई के,
मान बढाव महतारी के
जनम मरन तक सांथ निभाथे,
हक नंइहे का चिन्हारी के

आज मिलके कसम ये खाबो,जयकारा लगाबो जमाना में
देखबे अब गऊ माता ल,पहुँचन नंइ देन बुचड़खाना में

तोषण कुमार चुरेन्द्र
९६१७५८९६६७
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चोला

हाड़ मास के चोला बने हे होरा कस भुजाही गा
माटी के ओढ़ना सीराना माटी कथरी जठाही गा
हरिहर रूखवा के पाना रही कतिक दिन हरिहर
परही सपेटा जब घाम के लगही वहु पिवराही गा

प्रेम मिलन...

काबर तै सपना देखाथस
काबर तै सपना देखाथस
काबर तै जीव ल जलाथस
छाती म मारे गोली ओ संवरेगी जोही....
जिनगी म करदे अंजोर...हो...


सुरता हर तोर रानी जब जब मोला आथे
मन बइहा किंजरत रहिथे हिरदे चानी हो जाथे
कोयली कस तै कुकुवाथस
काबर मोला तरसाथस
मया म भरदे झोली ओ संवरेगी जोही....
जिनगी म करदे अंजोर...हो...
अभी जारी हे.........

रविवार, 26 मार्च 2017

होली हे

छत्तीसगढ के पागा कलगी २९ बर एक छोटकुन परयास...

होली हे

पुरब पसचिम उत्तर म ,ढंग के मनइस ग होली
छत्तीसगढ के दकछिन म ,जब चले दनादन गोली

घर म खात रेहेन रोटी पीठा ,जवान खावत रिहिन गोली
रंग बिरंग गुलाल लगाएंन त ,मांथ लगाए लाल रोली

कुरबानी ऊँखर बिरथा मत होए ,एखर करव जतन
गोहार थोरकिन सुन लेतेव ,परदेस के मुखिया रमन

काखरो भिंजे कपडा लत्ता ,काखरो भिंजे चोली हे
जम्मो दु:ख ल भुलाके काहत हों ,संगी मन ला होली हे.

तोषण कुमार चुरेन्द्र
९६१७५८९६६७

नीर

महिमा हावय निक तोर, सबले हस तै पोठ ।
कोन करे जी रक्षा अब, कोन करे हे गोठ ।।
कोन करे हे गोठ, फुरसद नंइहे काम ले ।
नीर पिये सब आज, प्यास बुझत अब दाम ले ।।
सुन तोषण के बात, धरले गठरी सही मा ।
निकले महि चीर के, तोर निक हावय महिमा ।।

🖋तोषण कुमार चुरेन्द्र🖋

 तोषण कुमार चुरेन्द्र: होली

 तोषण कुमार चुरेन्द्र: होली

होली

होली तो हमने खेली नहीं यारा
मन का सपना टुट गया सारा
छत्तीसगढ की माताएं रो रही
गमगीन हुआ है माहौल सारा

अदाकार

अ----अपनी कमाई का
दा----दान करने वाला
ही सच में अदाकार है

तोषण कुमार चुरेन्द्र

साधु

साधु बन जही नेता कभू
मोला नंइ ममहात हे

भट्ठी चलाय बर इंहा देख
अपने गोड जमात हे.

फरक का परही नेता ला
ऊंकर दुहानु गाय दुहात हे

घर में जावय पीके मंदहा
सुवारी लइका ल ठठात हे.

तोषण कुमार चुरेन्द्र

सोरठा दोहा

सोरठा
प्रनवंउ ग्यानु कुमार ,सदा रख दीन पर नेह !
भजत तोषण कुमार,बरसहु जी सुभग सनेह !!

दोहा
दाई ददा स गुरूजी,करथे गा उद्धार !
मिलथे किरपा इंकरे,होथे बेडा पार !!
तोषण कुमार चुरेन्द्र

तुमसे

हमने भी सीखा है प्यार करना तुमसे
सीखा है हमने भी इनकार करना तुमसे
श़िकवा करो या करो शिकायत किसी से
छोडेंगे ना कभी इकरार करना तुमसे

तोषण कुमार चुरेन्द्र

डिजिटल जमाना

याहा देखव संगी जमाना कइसन आगे
आवत चोर ल देख के घर के रखवार भागे
तावा कस तिपे भोंभरा म बिन चप्पल के रेंगे
कन कनले ठंडा पानी म जिमी कांदा उसनागे...

बड़ सुघ्घर गोठ हे हमर देस डिजिटल होवत हे
चक्कर म डिजिटल के गड़बड़ फिजिकल होवत हे
छोटे बड़े टुरी टुरा के हांथ म हे मोबाइल "तोषण"
आँखी लगत चसमा दाई ददा बर डिफिकल होवत हे
तोषण कुमार चुरेन्द्र

चोरी

चोरी करके पेट भरना आखिर कितने दिनों तक ऐसा करेगा करने वाला
एक दिन तो पकड में आएगा ही
जो चोर होता है उसका जीवन कभी सुखमय नही हो सकता उसका समूल विनाश हो जाता है रावण की तरह....
जीवन बिताएं विभीषण की तरह जिन पर भगवान राम की कृपा हमेशा बनी रही....
जय श्री राम...
तोषण कुमार चुरेन्द्र

विश्वास

मन को है विश्वास अगर
मंजिल मिल ही जाएगी..
करते रहें पग -पग मेहनत
इक दिन रंग ये लाएगी.
तोषण कुमार चुरेन्द्र९६१७५८९६६७

शनिवार, 25 मार्च 2017

हमर धनगाँव के बजार

हमर धनगाँव के बजार के चित्रण चंद पंक्ति म आप मन के सादर प्रस्तुत...
पडथे हमर गाँव रे संगी बजार दिन बुधवारी
आथे जिंहा बेंचाय बर आनी बानी तरकारी

आके तैहा लेले संगी लेना हे तोला जोभी
कुंदरु करेला मुनगा भांटा हावय फूल गोभी

चना मुर्रा मिरची भजिया अउ बरा समोसा
खाबोन बइठके होटल म संगी मसाला धोसा

टिकली फुंदरी इस्नु पावडर आके तै बिसाले
मयारू के मया बर किसम किसम के नपाले

घुमंव न बजार कभू अकेला कहीं मैं चुपचुप
आबे संगी घुमेबर तोला खवाहू पानी गुपचुप

तोषण कुमार चुरेन्द्र ९६१७५८९६६७

गुनेहगार

गुनेहगार है वो हर शख़्स ,कहर इंसाँ पे बरपाता है
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जात -पात की दलदल में ,हम इंसाँ को भरमाता है
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गुजारिए जिंदगी आजाद ,भगत राज जैसे"तोषण "
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रखकर जिसे हर दिल में ,तहे दिल से पूजा जाता है
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तोषण कुमार चुरेन्द्र ९६१७५८९६६७
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छत्तीसगढ के कोरा

शीर्षक :-छत्तीसगढ़ के कोरा
लहर लहर मोर गांव मा
सरसों फूल लहरावै।
छत्तीसगढ़ के कोरा मा
मया के फूल मुसकावै।
सीरी पंचमी के सुआगत म
पुरवइय्या ह डोलत हे।
होरी म गुलाल खेलबो
कारी कोयली बोलत हे।।
मिठ्ठू बनावै सुआ ददरिया
परेवना ह राग लमावै।
छत्तीसगढ़ के कोरा म
मया के फूल मुसकावै।।
आमा ह मउरे बोईर झरगे
परसा ह ललियात हे।
कुलर पंखा निकलत हाबे
गरमी के सुरता करात हे।
कोनों खाही ठंडा कुलफी
बरफ हा कोनों सुहावै।
छत्तीसगढ़ के कोरा म
मया के फूल मुसकावै।।
सुमता ले रहिबो हमन
मया के गीत ल गाबोन।
आऔ सबोझन मिलके
होरी ल सुघर मनाबोन।।
बिधुन होके बाजै नंगारा
सबला नाच नचावै।
छत्तीसगढ़ के कोरा म
मया के फूल मुसकावै।।
-आचार्य तोषण

काबर तै सपना देखाथस

काबर तै सपना देखाथस काबर तै जीवरा जराथस

छतिया मा मारे गोली मोर सवरेंगी गोरी

जिनगी म करदे तै अंजोर......


सुरता ह तोर बैरी जब जब मोला आथे

मनभंवरा बइहा होके रोई रोई गाना गाथे

काबर तरसाए मोला मया नंइ लागे का तोला

पुरवइय्या करत हावे शोर सवरेंगी जोही

जिनगी म करदे तै अंजोर....



आजा रे उड़त चिरइय्या बन कोयली गीत सुनाथे

आँखी ले आँसू निकले मया के दुख हरियाथे

मन मा समाए काबर आसा देखाए काबर

मया के बाँधे तैह डोर सवरेंगी बैरी

जिनगी म करदे तै अंजोर.....


सुघरई म होगेंव दीवाना बैरी होगेहे जमाना

संगी मन हांसे मोला का करिहंव तिही बताना

दिल ल तड़पाए काबर जादू बरसाए काबर

सुध बुध ल लेई डारे मोर सवरेंगी गोरी

जिनगी म करदे तै अंजोर......

तोषण कुमार चुरेन्द्र

वचन

रघुवीर के बचन कभु जावय नही जी खाली
किरपा एक दिन होथे जरुर आज नही त काली...
तोषण कुमार चुरेन्द्र

कदम...

यूं ही कदम हम अपना उठाते नहीं "तोषण "
चलते हैं हम जमाना साथ चल पड़ता है.....
तोषण कुमार चुरेन्द्र

अक्षय कुमार

रियल लाइफ हीरो अक्षय कुमार के सुकमा के शहीदों को 1 करोड़ 8 लाख देने पर उनकी देशभक्ति को नमन करती मेरी ताजा 
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           "अक्षय कुमार"

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खिलाडी कुमार जिनका नाम है
कर. दिखालाया  नेक  काम  है
सबकी  दुआ  ले रहा "बॉस को
छत्तीसगढ   कर रहा सलाम है.
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कभी न इनकी भणडार क्षय हो
नही किसी का  कदापि भय हो
नील गगन में   बन  चमके तारे
हे !  अक्षय  सदा  तेरी जय हो..
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दीन  दुखियों  की  सेवा करके
स्नेह भावना  जो मन में भरके
किया  बडा  उपकार आज ये
नही भुला पायेंगे हम भी मरके
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हुई ताजा फिर आज कहानी
सुनी कभी  दादा की जुबानी
हुए महान शिवि, रंन्तिदेव भी
परहित  जीवन  दिये कुर्बानी
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मान बांटते चल सम्मान मिलेगा
खुशियों  भरा  ब़ागान  मिलेगा
करले "तोषण" कुछ  नेक काम
तेरी मुट्ठी में सारा जहान मिलेगा
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रचना:-©®
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगाँव डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ
९६१७५८९६६७
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                टीप
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होली

कइसे मनावंव जी होली

मोर छत्तीसगढ के बस्तर म,
दिन रात चलत हे गोली..

तिही बताना संगवारी मोर ,
कइसे मनावंव जी होली..

डर डर जिंहा जिनगी जियतहे,
हमर सगा सोदर मन.

काबर हमर सरकार नंइ देखे,
दुख पीरा भरे ओखर मन.

लगत हे जेकर माथा म,
छिन छिन लहु के रोली..

तिही बताना संगवारी मोर,
कइसे मनावंव जी होली...
 
ढर ढर आँखी ले आँसू निकले,
मोर छत्तीसगढ महतारी के,

जेकर लइका प्रान ल त्यागे,
अब मोह का रंग पिचकारी के

कहां ले पाही अपन अंगना म,
फेरले हंसी ठिठोली

तिही बताना संगवारी मोर,
कइसे मनावंव जी होली...

फूलबगिया ल उजडत देख,
करेजा चानी होवत हे

बेटा के आस ल देख के ,
घर घर महतारी रोवत हे

नक्सलवाद ल खतम करव,
सुनव "तोषण" के बोली

तिही बताना संगवारी मोर,
कइसे मनावंव जी होली.....

रचनाकार
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडी लोहारा
बालोद छ.ग.
९६१७५८९६६७
रचना दिनाँक १२/०३/१७

रविवार, 22 जनवरी 2017

गुरू घासीदास के संदेश

छत्तीसगढ़ी दोहा विधा म नानकून उदिम
शीर्षक:-"गुरू घासीदास के संदेश"
गरीब घर मा पग धरे, नांव ग घासीदास।
मिल सब सोहर गात हे,दिन हे सबके खास।१॥
जिला बलौदा बाजार म ,हे गिरौदपुर धांम।
अमरौतिन माता हवय ,पिता ग महंगु नांम।।२॥
बन -बन के रस्ता चले, सत के करे तलास।
धरे तापसी बेस ला ,मन नंइ रहय हतास।।३॥
जात भेद ला मेंट के ,माने सबल समान।
दिस संदेसा शांति के ,मुख सतनाम जबान।।४॥
धरम सदन गा मानथे, पुर भंडार ल आज।
एक जगा जुरियात हे, जम्मो संत समाज।।५॥
बाजे मांदर थाप गा ,गजब लगे संगीत।
छत्तीसगढ़ी मा विधा, सुग्घर पंथी गीत।।६॥
भुल-चूक ला छमा करव,तोषण हवे नदान।
हांथ जोंड बिनती करे,किरपा करव सुजान।।७॥
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

तै बरत रहिबे बाबा....

पंथी गीत
तै बरत रहिबे बाबा....
तै बरत रहिबे बाबा दीया बरोबर जैतखाम में
दीया बरोबर जैतखाम में हो२
तै बरत रहिबे....

अमरौतिन दाई तोर ददा महंगुदास हे
गिरौदपुर म जनम धरे नांव घासीदास हे
तै चमकत रहिबे बाबा चंदा बरोबर पुन्नी रात में
तै बरत रहिबे....
ज्ञान सत खोजे बर निकले जंगल झाड़ी हो
धरके तपसी बेस तै आसन लगे पहाड़ी हो
तै दमकत रहिबे बाबा सुरूज बरोबर सुब शाम ले
तै बरत रहिबे....
राखव मन शांति कहिके जग ला बताय हे
जग कल्यान बर गुरू बनके आय हे
तै महकत रहिबे बाबा फूलवा सही हिन्दूस्थान में
तै बरत रहिबे...
मनखे मनखे एके हन एके जीव समाय हे
रख मया सब बर गुरू ज्ञान बताय हे
तै चहकत रहिबे बाबा बनके चिरइया बिहान के
तै बरत रहिबे...
तोरे चरन मा बाबा "जोहर" मांथ नवांय हे
आसीस तोरे पाके बाबा "तोषण" गीत बनाय हे
मैं गावत रइहौं बाबा महिमा गा तोर सतनाम के
तै बरत रहिबे....
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़

रविवार, 18 दिसंबर 2016

पितर

पितर

~~~~~~~~~~~~~~~~~
भादो महिना अंधियारी पाख
लगे हावय देखव पितर शाख
पानी देवत दुनो अजुरी जोड़
पुरखउती परमपरा बात राख
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
होवत बिहनिया अंगना लिपे
सुघ्घर चकचंदन चउंक पुराय
तोरई पाना फूल नीक लगे बेला
पिडहा माढे लोटा दतवन चाय
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पाना तोरई के भाग संहरावय
बरबट्टी करिया मेछरावत हो
फर तोरई संग साग बनावय
बड जोरदरहा रंग जमावत हो
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
तीन-तीन घांव तिलांजलि देवय
दाई ददा अऊ पुरखा सोरियाके
भोग लगाथे आके करिया कागा
घूमत घामत सबझन सकलाके
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कथे सियानन पंदरा दिन बर
पुरवज मन परिवार तीर आथे
जनम जनम के भटकत जीवरा
लइका बर आशीष छोड़ जाथे
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
-आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

मया दुलार हो

लाली लाली चुनरिया दाई साजे सोला सिंगार हो
आस पुरो सब भकतन के रख लेबे लाज हमार हो
आके गोहरावंव मन के दुख पीरा दाई दुवार तोर
बरसावत रहिबो मोर बर अछरा भर मया दुलार हो

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मोर जिंनगी होगे हे अंधियार

सत्य घटना पर आधारित कविता
आप तक सादर समर्पित----------
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
~~~~~~~~~$$$~~~~~~
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार

नौकरी करत हन जी नाम के
पइसा कउड़ी के ठिकाना निंही
मिल जथे जी दू.....तीन हजार
लाज..शरम सेती बताना निंही
दुसर घर सउघा दीया बरत हे
गरीबी म होवत हे बंटा―धार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
नंइ लेवाय हे ददा बर कुरथा
एकझन लइका बर जींस सेट
बाई कथे मोर बर लेदे लुगरा
सन्न रहिगेंव मेहर सुनके रेट
काहत हवय उपराहा एकठन
मोर बर लेदेतेस सोनहा हार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
खेती खार के गोठे झनकर
बनी भूती म चलथे गुजारा
मिल जथे एदे पैंतीस किलो
आधा बोरी चँउर के सहारा
सोंचथों जातेंव परदेश कमाए
ददा के आंखी होगे हे अंधियार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
करजा के मारे चिंता धरेहे
गुनथों एहा कइसे छुटाही
कब किरपा होही लछमी के
दुख दलिदरी कब ए सिराही
सोंचत-सोचत तन ह घुरत हे
जिंनगी म होही कब उजियार
नंइहे मोर कर रूपिया पइसा
कइसे मनावंव देवारी तिहार
धान पान घलो मिंजाय नंइहे
मोर जिंनगी होगे हे अंधियार
©®
आचार्य तोषण, धनगांव डौंडीलोहारा, बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१

हमर मन के गोठ


हमर बने हे अघवा जतका गोठ करथे बड मीठ-मीठ
पेराय खूसियार बरोबर हम हो जाथन सीठ-सीठ
काम करथन हम्मन घंस घंस मंजा कस कस के उड़ाथे
उरक जथे कंहूँ पइसा थोरको हमी ल दोसी ठहराथे
जाथन तिंहा तो कामे करथन घर के काम तियार देथे
कभू खेत डोली कभू सिलेंडर टंकी धरा के बइठार देथे
दस बज्जी जाथन कमाए बर टेम ले कुटेम कमाथन
आथन घर में थके मांदे गोसईनीन ले अउ गारी खाथन
हमर काम ल सेवा हे कहिथे तभो मिलत नंइहे फल
दु आना कि चार आना बढाही मिल जतीस आज कल
काडी मिठई ह बनगे हावे लइका सही भुरियारथ हे
चार महीना बीतत हावे मदारी कस नांच नंचावत हे
जेझन के मुडी म पागा हे सब अपन-अपन में मस्त हे
अइसन मस्तीजाद के मारे हालत हमर इहाँ खस्त हे
देख इंहा के रांगा चागा मुंह ले बिलई के नंइ निकले मिऊ
असने करम देख कथे सियान लल्लड जांता के लल्लड पऊ
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा

मन का बिचार

एक सिपाही सीमा मे डटे हे ।अइसन देवारी तिहार म । त मन म का बिचारत हे। का काहत हे
आवव देखन ।कविता के चार लाइन हमर देस के जवान मन बर सादर समर्पित.......
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स्वदेश सेवा म लगे मोर तन कइसे गांव आवव
मोर जोही दिल के रानी कइसे देवारी मनावंव
दाई ददा ल समझादेबे आस के दीया जलालेबे
आज नही ते काली बैरी लहुट आहूं अपन मैं ठांव
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आथे सुरता घर-परवार के ओ गली-खोर अंगना
ओ गांव के सुखा मैदान खेलन जिंहा संगी संगना
मोला सताथे मुसकावत चेहरा आघू-आघू झूलय
पैरी के छून-छून रानी हांथ ल भावय तोर कंगना
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भेजदेबे देवारी खीचरी दीया फरा नवा पिसान के
तोर मया के चिनहारी मोर बिरह पीरा ल सान के
मोर गांव शोर संदेश बतादे बबा के गोठ सुनादे
गाय बछरू के हाल सुनादे कइसे हाल गौठान के
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रद्दा मोर देखत रहिबे आंखी ले रातदिन निहारत
आ जहूं मैं झटकू रानी कोयली कस कुकुही पारत
झन करबे तै शोक शोगारत अइसन खुसी के बेरा
कहे जवान 'तोषण' परब देवारी मनाले दीया बारत
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जम्मो मोर देश के जवान मन शत् शत् नमन करत देवारी तिहार के खाला खूझर बधाई
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छत्तीसगढ़

गोवरधन पहार

गोवरधन पूजा के बधाई देवत चार लाईन
समरपित
गोवरधन पहार
कुम्हड़ा कोचई कटकट मही
चुरत हाबे बरा अउ सोहारी
नवा चंऊर के खीचरी राधे
जुरमिल खवाबो आरी पारी
गोरधन खोंचे मेंमरी सिंघोटी
हुम धुप नरिहर धरके मनाबो
अन्नकूट सम पबरित तिहार
गउ महतारी के आशीष पाबो
जेकर कोरा म जड़ी बूटी दवई
भरे हबे जिंहा अकछय भण्डार
सबके आस पुरोथे निसदिन
अइसन हवे गोवरधन पहार
राऊत मनके पुरखौती देंवता
नीत कोरा म गइय्या चरावय
बनके गोप गुवाला संन मा
मुरलीधर मुरली बजावय
सरदी गरमी बरसात सहिके
गउ माता के पोसन करथे
सबके गोवरधन पहार तै
"तोषण" घलक पाव परथे
©®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छत्तीसगढ़

लिये मुसकान होंठों पे

लिये मुसकान होंठों पे दिलबर हमसे
खुली छत पर युँही मिलने आ जाते हो।
करके चोरी दिल की चुपके―चुपके तुम
उड़ते बादल की तरह छुप जाते हो।
आँखों ही आँखों में अपनी करके इशारा
गहराइयों में दिल की उतर जाते हो।
आते नहीं कभी मुलाकात करने 'तोषण'
रातों की तन्हाई में तुम तड़पाते हो
©®
आचार्य तोषण धनगांव९६१७५८९६६७
१६/११/१६

सुप्रभातम्...


छोड़ पंछी अब नीड को ,बढ़े गगन की ओर।
इंद्रधनुषी किरणों संग, जगा रही है भोर॥
जगा रही है भोर , करले कदम तू आगे।
हुआ दिवस देखकर,निशा दूर-दूर भागे।।
सूरज आया देख,किसन छेेेड़े है बंशी।
सरर सरर की तान,नीड को छोड़े पंछी।।

© ®आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

है सुनिश्चित

है सुनिश्चित जनम मरण, मनवा क्यों तू सोंचे।
चिंता से चतुराई घटे, केश बिरथा क्यों नोंचे।।
कर्म तेरा अधिकार है, फल की चिंता छोड़।
भर भर देंगे ईश्वर तुमको, कर्म से रिश्ता जोड़।।

जो नर श्रद्धावान यहाँ, प्राप्ति ज्ञान की होत।
अज्ञानता की यान में,अशांत मन क्यों ढोत।।
सत्संग है कुबुद्धि हरती,वाणी सत्य से सींचती।
ज्ञान पापों से करते दूर,चहूँ दिक् बढती कीरती।।

करले संगत सज्जन के,मिलेगा सच्चा ज्ञान।
गुणी विवेकी बनोगे तुम, कहाओगे श्रद्धावान।।
विद्या देती विनय सबको, मिलता सबका मान।
विद्या सम कोई चक्षु नही,तम हरती दीप समान।।

सबको अपना जानों तुम, करो सभी का आदर।
कहना सबसे मीठी वाणी,कभी न होगा अनादर।।
मान मिले सम्मान मिले, बनके रहो नित प्रिय।
लगे रहो हित करने सबके, करम न हो अप्रिय।।

झुकाना है गर संसार को, सीखें सर्वदा झुकना।
आँधी आए तूफाँ आए,मग में कभी न रूकना।
कोई रोके कोई टोके, मत किसी की सुनना।
करना है कर्म तुमको, सदा हृदय में गुनना।।

कर्म अच्छा करते जाना,करना कभी गुमान नही।
राह मिलेगी फूलों की, मिलेगा न चट्टान कहीं ।।
दोष न देना जगवालो, मुझको कुछ नही आता।
लिख देता मन की बातें,जो मेरे मन को भाता।।

बनके तारा एक दिन मैं, घोर निशा में चमकूँगा।
बनकर फूल बगिया में, बहती पवन संग महकूगा।।
उडता रहूँ उन्मुक्त गगन में,पक्षी बनने की कामना।
मिलती रहे हमें सदा,विप्र आपकी शुभकामना।।
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगांव
डौंडीलोहारा छतीसगढ ४९१७७१

एक पाव

आज काल के दिन म अइसने चलत हे
 तेला चार लैन म तुंहर आगू समरपित


जाथों ददा सन टूरी खोजे गांव ले ओ गांव
होथे सांझ मोर ददा जमा देथे एक पांव
टुरी खोजय म गोड हाथ पिरागे कथे ग
एक पाव पीये बिन घर म नंइ जांव
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

वाह रे आतंकवाद..."

एक नानकून ल इका के मनोभाव ल उकेरत चार लैन आप सबके नवकंज पद म समरपित

वाह रे !आतंकवाद
बनहूँ तोर बर फौलाद

होन दे मोला बड़े
देखत रहिबे खड़े-खड़े
सैनिक देशी बनके
रहूँ सीमा तीर तनके
आ कभू सीमा तोड़
देंहूँ तोर आँखी फोड़
आगु म बम बन जाहूँ
तन ल तोर आगि लगाहूँ
कसम हवे माटी के
पिहुँ लहू तोर छाती के
तिरंगा मोर मान हे
मोर भारत के शान हे
मिट जही नाम निशान
करबे कोंनो अपमान
भारत के लइका अंव
एक में कोरी खइका अंव
लड़त भले मर जाहूँ
फेर पहिली मार गिराहूँ
होही जी नांव अमर
भजही तोषण डगर-डगर
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१

क्यूँ

क्यूँ

इंसानियत को मारकर मर रहा है क्यूँ
होकर इंसान इंसान से डर रहा है क्यूँ
जगा अपनी ईमान खड़े हो अपने पैरों में
बिना पिये शराब यहाँ बहक रहा है क्यूँ

सुप्रभातम् सूरज

सुप्रभातम्
सूरज भास्कर नाम तुम्हारे
सदा करते हित का काम..
हो तुम सबकी प्रेरणा पुंज
तुमको मेरा कोटि प्रणाम...

अलसुबह होता है दीदार तेरा
कली खिल जाती तेरे आने से..
यूं ही हमेशा मुस्कुराते रहना
जगता जहान तेरे मुस्कुराने से...
है दमकता गुलशन गुलशन
आलोकित होता जहान है..
अवनि है तुझसे ही शोभित
तुझसे ही आसमान है...
सबको मेरा सुप्रभातम् है
पूर्ण हो सबकी कामना ..
पथ निरतंर चलते रहना
रूकने का हो नाम ना...
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद

संगवारी के गोठ

संगवारी के गोठ ल का काहंव
मोर बर मंदरस के झोर हे
बंधाय अइसन पीरीत के बंधना
जइसे पटवा के डोर हे

 आज नहीं तो कल होगा
हर मुश्किल का हल होगा
आँख से आँसू बहाना मत
यह इक दिन गंगा जल होगा

 माँ बाप का उपकार बड़ा
हमे सत्मार्ग दिखाते है
प्रतिफल की चिंता नही
सदा ही फर्ज निभाते है

परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

मेरा लेख आप सबको समर्पित

परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

एक गरीब लड़का है सोनू । जो अपने पिता जी के होटल मे दिन रात काम करता है। उसके मन मे पढने की तीव्र इच्छा थी। लेकिनस परिवार की स्थिति को देखकर अपनी इच्छा अपने मन के अंदर ही दबाकर रखा रहता। क्या करता बेचारा पिताजी एक पैर से अपाहिज होटल का गल्ला सम्हालता । माताजी और छोटी बहन सोनिया होटल के काम मे हाथ बटाती। इस तरह उसका जीवन चल रहा था।
एक दिन एक गुरूजी होटल मे चाय पीने आए ।चाय का आर्डर देते हुए पेपर पढने लगा । सोनू चाय लाकर गुरूजी को देकर वहीं खडा हो देखने लगा । जिस पर लिखा था " तेरह वर्ष का बालक पढाई स्तर पर जिला में अव्वल आया है।"इसे देखकर सोनू दुखी हो गया । सोनू को दुखी देखकर गुरूजी कहने लगा -अरे सोनू आज दुखी क्यों है ?इतना उदास क्यों है? तब सोनू कहता है-"काश !वो अव्वल आने वाला बालक मैं होता। इस बात को गुरूजी सुनकर चौंक जाता है और सोनू से पूछता है । भला तू ऐसा क्यों कह रहा है? तब सोनू अपनी सारी व्यथा गुरूजी के सामने रख देता है। सारी सच्चाई जानने के बाद गुरूजी सोनू के माता पिता को समझाईश देते हुए कहते है-"अपने बच्चे सोनू और सोनिया को पढने के लिए स्कूल जाने दो ।पढेंगे लिखेंगे तुम दोनो का नाम रौशन करेंगे। इस तरह होटल मे काम करने से इनका जीवन यहीं सीमित हो जाएगा। मैं इन दोनों की पढाई का जिम्मा लेता हूं। इनके बदले मजदूर लगाकर अपना होटल सम्हलना । गुरूजी का उपकार मानते हुए अगले दिन सोनू और सोनिया को स्कूल भेजने लगे।
सोनू और सोनिया की पढाई रंग लाने लगी ।हमेशा अव्वल आने लगे। माता पिता और गुरूजी भी खुश होने लगे।
गांव की पढाई खत्म होने के बाद सोनू और सोनिया को शहर के अच्छे कालेज मे दाखिला मिल गया ।दोनों भाई बहन मन लगाकर पढने लगे। समय ने ऐसा रंग लाया दोनो एक बार फिर अव्वरल दर्जे से पास हो गये। दोनो भाई बहन बहुत खुश होने लगे ।इस खुशी को मनाने वे दोनो अपने गांव गाव आना चाह रहे थे। फिर क्या था ।एक दोनो भाई बहन अपने गांव आये और सीधा अपने माता पिता के पास होटल में पहुंचकर चरण स्पर्श किए और सीधा एक ही सवाल सोनू ने पूछा-"क्या ?वह गुरूजी आज भी हमारे होटल में चाय पीने आते है । सोनू के इस सवाल को सुनकर बीती बातों को सोंचते हुए माता पिता की आँखों में आँसू आ जाता है ।उसे पोछते हुए बड़े सरल भाव से अपने बच्चों से कहते है -"हां बेटा !
उसी समय वह गुरूजी होटल में आकर चाय का आर्डर देते हुए पेपर पढने लग जाता है तब सोनू अपने हाथ से गुरूजी को चाय सौंपकर प्रणाम करता है । तब गुरुजी पूछने लगता है -"अरे भाई तुम कौन हो ?और मेरा पैर क्यो छू रहे हो? तब सोनू अपनी पूरी कहानी बताता है और धन्यवाद देता है-"आज अगर हम यहाँ पर इतनी पढाई लिखाई किये है तो सिर्फ आपकी ही वजह से किये । गुरूजी उन बच्चों को आशीर्वाद देते हुए अपने घर की ओर चल पडते है

© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा

वंदन है

वंदन है उन गुरू चरणों में कृपा जिनकी हम पर है
नमन है माता-पिता को जीवन जिनके दम पर है
राह दिखायें जीवन पर्यन्त मिलता रहा प्रेम सदा
मरके भी उऋणी न होंगे ऐसा ऋण हम सब पर है
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

मोर छत्तीसगढ़ के माटी

छत्तीसगढ़ महातारी ल समरपित
गीत
शीर्षक :"मोर छत्तीसगढ़ के माटी"
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन २
मांथ लगावंव चंदन तोला २
मोर छत्तीसगढ़ ....

तोर कोरा म जनम अउ
तोरा कोरा म बाढ़ेंव २
सूरुज जोत म करंव आरती
दणडासरन पखारेंव २
फूलपतिया धर पंइया परके २
तोला करथंव बंदन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन........१
महानदी अउ अरपा पइरी
कोरा तोर हरियावय २
नंदिया नरवा डोंगरी पहाड़ी
हरिहर अछरा भावय २
चिरई चिरगुन सुआ पंड़की २
करथे कोयली कुंजन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन......२
रीसि मुनि अउ देव धामी के
सरधा भरे देवालय २
तोर चरन मोर तीरथ बरोबर
मया पीरा के आलय २
कन कन म इंहा राम बसे हे
धूर्रा माटी हे कंचन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन......३
छत्तीसगढ़ही गुरतुर बोली
सबके मन ल भावय २
राऊत नाचा करमा पंथी
सुआ ददरिया गावय २
किसम किसम के फुलवा फुले हे
जइसे लगे बन नंदन
मोर छत्तीसगढ़ के माटी
तोला मांथ लगावंव चंदन
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद
छत्तीसगढ़ ४९१७७१
चलितभाष ९६१७५८९६६७
दिनांक ९/१२/२०१६

भुला पाओगी कैसे

आना चाहती थी वो जिन्दगी में हमारी
"तोषण"
कम्बख्त वक्त ने कर दिया दूर मुझसे

 सरदार है हम सभी बेवफाओं का
"तोषण"
सीखते है हमीं से बेवफाई करना


भूल गयी तू उन सब कसमों उन वादों को
मै तो वो एहसास हूँ वो सांस हूँ इसे भुला पाओगी कैसे

खोल

झन कोड दुसर बर खंचुवा जाके खुदे झपाबे
मिलके रहिले सबसन बैरी अइसन मया कहां पाबे

 लबर लबर गोठ करे
केकरा जस हे चाल
कपट भरे तन मन में
सिधवा के पहिरे हे खाल

 याद न करने का उन्होंने लिया वादा "तोषण"
काम एक यही जो न हो सकी हमसे

जिनगी के बात हे

जलता दीया न बुझने देना ,रख मन में विश्वास
त्रासदी है दूर करना तोषण, न होना कभी उदास

 ढूंढ न उनको गुलशन जो दिल मे समाया है
न दिखेगा इन आंखों से मन में जिसे बसाया है

 गुनाहों को मुआफ कर देना मेरी
दोस्ती जो आपसे निभा न सके.

 मौत तो आएगी साथ अपनी ले जाएगी
रह जाएंगी सिर्फ मेरी भुली बिसरी यादें

 कर लेना याद
मुझको भी यारों
चला जाऊंगा
एक दिन
दुनिया को छोड़कर

 चार दिन के चटक चंदैनी
फेर अंधियारी रात हे
परही जाना सबला एक दिन ए जिनगी के बात हे

आंखें

तेरी ये दोनों आंखें
मेरे लिए चांद और तारे है
देखता हूं तेरी बदौलत यहाँ
जो कुदरत के नजारे हैं


आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

तेरी ये दोनों आंखें
मेरे लिए चांद और तारे है
देखता हूं तेरी बदौलत यहाँ
जो कुदरत के नजारे हैं

आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

आगी आंच सुहावत हे

कटकिट कटकिट दांत करे
आगी आंच सुहावत हे
देखना ग डोकरा बबा
नंगतेहे जाड़ जनावत हे
नंगतेहे जाड जनावत हे
बासी चटनी नंइ भावत हे
गरमे गरम दुध फरा
टुरा ह बिहनेल जमावत हे
मिंजई कुटइ कोठार म
लारी म सुतेल परथे
करे बिछौना पेरा के
फुसूर फूसूर नींद परथे
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

वाह रे ! सिस्टम बफे


वाह रे ! सिस्टम बफे
खाय बर सकलाय सफे
मोहाटी म लिखाय बैल-कम
झोंकाय जिंहा कम-कम
देखंव मेहा एती-ओती
चकबिक चकबिक चारो-कोती
साहब सोदर बड़े-बड़े
खवइल देखंव खड़े-खड़े
पहुँचके खाएंव धोसा
वहुल देख परिस मोसा
काजू कतरी गरम मुगोडी
सोंहारी भजिया संग कचोडी
साग रमकलिया गोभी-फूल
अइसक्रीम घलक कूल-कूल
तीर म राहय ठेला गुप-चुप
तहुल झेलेंव महूं चुप-चुप
डीजे गाना बजावत राहय
टुरी टुरा ल नंचावत राहय
गेंव महूं मंच आगू मा
नाचेंव पान वाला बाबू मा
डीजे कथे झन जान खा
जाके ठेला म पान खा
मीठा मसाला पान खाएंव
संइकिल धरके घरे आएंव
© ®
आचार्य तोषण कुमार चुरेन्द्र

सम्मान व साहित्यिक संगोष्ठी

मधुर साहित्य परिषद जिला बालोद छत्तीसगढ़ के पावन सानिध्य में "मधुर साहित्य सम्मान व साहित्यिक संगोष्ठी "का आयोजन किया गया। जिसमें "दोहा के रंग" के रचनाकार श्री रमेश जी चौहान का सम्मान व श्री देवनारायण जी नंगरिहा का जन्मदिन के सुअवसर पर बड़े ही आल्हादित मन से "दोहा के रंग" पुस्तक पर वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा समीक्षा कर इस पुस्तक को हम जैसे नवोदित रचनाकारों के लिये मील का पत्थर साबित होना बताया । तदोपरान्त उपस्थित साहित्यकारों द्वारा मार्गदर्शन प्रदान करते हुए काव्य पाठ कर रसास्वादन हुआ।
इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकारों का हस्ताक्षर व आशीष हमें प्राप्त हुआ। जिनमें श्री टी. आर जी महमल्ला ,लतीफ खान "लतीफ" ,शमीम अहमद सिद्दीकी, दरवेश जी आनंद प्रधान संपादक लोक असर ,रमेश जी चौहान अध्यक्ष श्री शमी गणेश साहित्य समिति नवागढ संयोजक फेसबुक संचालित छत्तीसगढ़ी साहित्य मंच, अनिल जी तिवारी निराला साहित्य समिति थानखम्हरिया, मनोज जी श्रीवास्तव शमी गणेश साहित्य समिति नवागढ , राजकमल सिंह राजपूत अध्यक्ष निराला साहित्य समिति थानखम्हरिया, पुष्कर सिंह जी "राज"फीचर संपादक लोक असर,राजकुमार जी चौधरी, पवन यादव "पहुना",डॉ.अशोक जी आकाश अध्यक्ष मधुर साहित्य परिषद ,दानेश्वर जी सिन्हा ,वीरेन्द्र अजनबी, लालेश्वर साहू व तोषण कुमार चुरेन्द्र उपस्थित रहे।

दोहा के रंग



कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.चित्र में ये शामिल हो सकता है: पाठ

औकात में

किसी ने कहा हमसे औकात में तो रहिये...
हमने भी कहा उनसे जनाब अपनी तो कहिये....
छांव मे रहकर कहते तगड़ी बड़ी धूप है ...
हमारी तरह भरी दुपहरी तो सहिये

तोषण कुमार चुरेन्द्र

हो जाऊँ जो रूखसत

घनाक्षरी
हो जाऊँ जो रूखसत , इस दुनियाँ से कभी ,
आँसुओं को पलकों में , अपनी भर लेना।
तन्हाई का मंजर हो , याद जो आऊँ मैं कभी ,
अफ़सानों से हमारा , दीदार कर लेना।
था कभी मैं तात यहाँ , झरनों सा रहा कभी ,
बनके नदी मैं बढूँ , ऐसी डगर देना।
हंसाया कभी रूलाया , लगाया इल्जाम कभी ,
हुई जो भूल हमसे , मुआफ़ कर देना।

© ®
आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा बालोद छ. ग.४९१७७१
चलितभाष ९६१७५८९६६७

छत्तीसगढ़ही भाखा

छत्तीसगढ़ही भाखा के मान रखव ग
लाज एखर बचाय बर परान रखव ग
बढ़ही महतारी के सोर दुनियां म
गुनत सुनत एकक पयदान रखव ग


 कहते ही आ गये हम भी अपनी औकात पे
रखा करो वजन तुम भी कही अपनी बात पे
करना आंखे चार हमसे जब दिल मे धमक हो
बित जाएगी जिंदगी तेरी हल करते सवालात पे

 ना समझ है वो सहचरी, जो समझे न सहचर की बात
अपनी ही चलाती चले ,ये नहीं उसकी औकात

दिलबर की बात न समझे ,नहीं कोई वह दिलदार यहाँ
प्रेम तो बसता वहाँ "तोषण" है दोनों में विश्वास जहाँ

"दोहा के रंग"

ए पांच ठन दोहा लिखे के नानकून परयास
भइया रमेस चौहान के चरन कमल म सादर समरपित
गलती मिलही त सुधरातमक सुझाव सुझाहु

"दोहा के रंग"

ए दोहा के रंग ला ,रसा बना के लील।
भइया रमेस हे लिखे, बनही पथरा मील।।१॥
पढले दोहा के नियम ,मन धर ले गा ध्यान।
ए भइया के मान हे ,करहु सदा सनमान।।२॥
रसदा हमला देत हे, बांटत हे जी ज्ञान ।
छत्तीसगढ़ी मंच मा, पावत हन गा मान।।३॥
गला लगाइस आज गा, समगे जी में जान।
बड़भागी हे जीवरा ,सबले ससता मान।।४॥
ललना जोहर लाल के, तोषण परथे पांव।
पढ़े पढ़ाय सकूल मा ,हरे गांव धनगांव।।५॥
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र

चाहता हूँ...

चाहता हूँ...
बनकर फूल गुलाब का महकना चाहता हूँ।
बनकर तारा व्योम में चमकना चाहता हूँ।।
बनकर रग रग में लहू दौड़ता दिनरात मैं,
आंधी हो तूफान हो दहकना चाहता हूँ।।
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र

सुप्रभातम्

सुप्रभातम्
गुनाहों के दलदल में छोड़ देती है जिंदगी
गर साथ जीना चाहो रुख मोड़ लेती है जिंदगी
अब तो खुद की परछाई से लगता है डर
शीशा हसीन सपनों का तोड़ देती है जिंदगी

तोषण कुमार चुरेन्द्र

सुप्रभातम्

सुप्रभातम्
जहान में आजकल चलता कहां कायदा
झूठी होती है कसमें होता झूठा है वायदा
आदमी दिन रात काम करता वहीं "तोषण"
जहां नुकसान हो कम ज्यादा हो फायदा

तोषण कुमार चुरेन्द्र

सुभ बिहान हो

सुभ बिहान हो
भजत रहब दिन रात हम
प्यारे मोहन का नाम ।
ऊँखरे से होत बिंहना
होत ऊँखरे शाम।
का रखल भला इहाँ
जिनगानी में ऊँखरे शिवा,
जपत रहब रात अउ दिन
हरे कृष्णा हरे राम।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र

ना तड़पना हमें यूँ

ना तड़पना
हमें यूँ
तड़पाने वाले
झूमकर
कहर हमपे
बरपाने वाले

बनकर घटा
ढहाती
सितमग़र तू है
हक तेरा
नहीं हमपे
छड़जाने वाले
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र

गिनती म घासीदास के महिमा

गिनती म घासीदास के महिमा हाबे भारी
आवव सतनाम के जय करन बारी-बारी
१,२,३,४
घासीदास की जय जयकार
५,६,७,८
जगला बताय शांति पाठ
९,१०,११,१२
महंगु अमरौतिन के लाल दुलारा
१३,१४,१५,१६
छत्तीसगढ़ म मनावय तोला
१७,१८,१९,२०
घासीदास तीर मांगव आसीस
२१,२२,२३,२४
बाबा तीर झुके सगरो सीस
२५,२६,२७,२८
बाबा सतनाम के दीया जलइस
२९,३०,३१,३२
गिरौदपुरी धाम कस गढ़ दीस
३३,३४,३५,३६
जैतखाम सादा झंडा करदीस
३७,३८,३९,४०
हिरदे भीतरी सबबर मया पाली
४१,४२,४३,४४
पंथ सतनाम जग मा उबारिस
४५,४६,४७,४८
चुपर सतनाम तेल मन के करले मालीस
४९,५०,५१,५२
सुमर घासीदास ल होजही तन ह पावन
५३,५४,५५,५६
छोड़ दुनिया के भोग छप्पन
५७,५८,५९,६०
सतनाम के पारले गांठ
६१,६२,६३,६४
बन जा बाबा कस औघट
६५,६६,६७,६८
तन जल जाही पहुंचके मरघट
६९,७०,७१,७२
झन बना जी मन ल पत्थर
७३,७४,७५,७६
जप सतनाम ल झन जी जिनगी बत्तर
७७,७८,७९,८०
आ भाई सतनाम के पीले ते लस्सी
८१,८२,८३,८४
तन भटकेहे ग लख चौरासी
८५,८६,८७,८८
झन कर मन म तैह उदासी
८९,९०,९१,९२
बाबा तीर आबे तभे सत ल जानबे
९२,९४,९५,९६
छोटे बन रहिले बड़े सबला मानबे
९७,९८,९९,१००
जय बोलो घासीदास की कोरी-कोरी सौ-सौ
© ®
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडीलोहारा

राम नाम

राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...