बुधवार, 17 अगस्त 2016

राखी ल


राखी ल...
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे लहरावत जाबे दुनों पाखी ल
दाई ददा के दुलारा बेटा भइय्या मोर तै हीरा असन
 पेट गुजारा करेके सुध म बसगे जाके अब दूसर वतन
 बइठके दाई के कोरा म कोन खही अब बासी ल
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
 जारे परेवना तोर आसा हे लहरावत जाबे दुनों पाखी ल
आजा लहुट सुन मोर भाई ए भुइंया हर तोला बलावय
कइसे भुलागे दाई के सुरता तोला रोज जे खेल खेलावय
तोर बिना इंहा कोन करही खेती डोली के बियासी ल
 चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे लहरावत जाबे दुनों पाखी ल
 दाई ददा के सेवा जतन म मिलथे जनम जनम के पून
मोर कहिनी ल मान ले तैह बने हकन के बात ल गुन
आके घर छोड़ादे "तोषण" दाई ददा के धरे बैसाखी ल
चिट्ठी पतरी के नंइहे जमाना कइसे भेजंव भइय्या राखी ल
जारे परेवना तोर आसा हे लहरावत जाबे दुनों पाखी ल -
आचार्य तोषण

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