सुख-दुख दुनो रहिथे जिंहा
हमर जिनगी हरे ओ गांव
कभू धूप परे कभू परे छांव
कभू धूप परे कभू परे छांव
मोर करम के लेखा गजब
कभू हंसात कभू रोवात हे
रोए बर नइ रोए सकत हंव
मन ऊपर सांवा मुसकात हे
कोन जनम का करम करेंव
जेकर फल अब पावत हंव
भरे दरद के अइसन घड़ी
ऊपर वाले ल गोहरावत हंव
सुख के अब तो आसा छुटगे
संग लग गेहे मोला दुख के
अनपानी के सुध नइ लामे
परगे हे आदत जब भुख के
ननपन ले आज बुढ़ापा तक
सुख-दुख सन मोर यारी हे
मोरेच लेखा नंइहे जग म
आज मोर कल तोर पारी हे
दुख के रोना झन रोवव'तोषण'
अवइय्या जवइय्या मेहमान हे
सुख-दुख बिन जिनगी नइ कटे
सबझन बर मितवा मितान हे
-आचार्य तोषण
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