मंगलवार, 16 अगस्त 2016

बात है बहुत पुरानी

मित्र...
बात है बहुत पुरानी
सुन लो मेरी जुबानी
है युग द्वापर की बात
गुरूकुल मे रहते साथ
शिष्य अनेकों थे जिनके
सभी मानते बात थे उनके
ऋषि एक संदीपनी नामा
आए निकट कृष्ण सुदामा
शिष्य गुरू सबके प्रिय हुए
गुरू सेवा नीत लीन हुए
हंसी खुशी से लगे रहने
दोनों मित्र के क्या कहने
आश्रम की बात है ऐसी
थी गुरू माता माँ के जैसी
कृष्ण सुदामा को वन था जाना
नही बचा था आश्रम में खाना
गुरूमाता ने चने पकडाए
देख दोनों के मन हरषाए
कांटे लकड़ी वन को जाके
हुई जो बरसा दे कड़काके
मित्र दोनों तरू पर चड़के
बरसा में जब कपकपी भडके
लगे सुदामा तब चने दबाने
कहा कृष्ण ने चने खिलाने
लगे सुदामा कृष्ण को बहकाने
चने गिरने के किए बहाने
कान्हा सोंचे मन ही मन
कर गया सुदामा चना गबन
कहने लगा अवसर आएगा
जब तू मांग मांग कर खाएगा
राजा बनूंगा जब एक दिन
आएगा मिलने बनकर दीन
अपनी मित्रता निभाऊंगा
गले से तुझको लगाऊंगा
पहुंचे आश्रम दोनों मीत
माननी गुरूकुल की रीत
समय बीते सब दीक्षा पाई
गुरूपुत्र लौटाकर दक्षिणा चुकाई
लौटने लगे अपने घर को
बिदा मांग ऋषि गुरूवर को
राजा बन कृष्ण राज कर रहा
सुदामा देखो गरीबी मे मर रहा
मान पत्नी की बात सुदामा
चलने लगे मित्र के ग्रामा
पहुंचे सुदामा जब मित्र द्वार
आए कृष्ण तब छोड़ दरबार
अपने आसन सखा बिठाए
अश्रु जल से पग कृष्ण धुलाए
आव भगत कर किया सम्मान
अमीरी गरीबी का नही था भान
मधुर मधुर पकवान खिलाए
देख सुदामा हरष उर लाए
धन दौलत का दिया उपहार
सुखी कर गया घर संसार
दिया मित्रता की परिभाषा
पूर्ण हो गयी मन की आशा
मित्र वही जो सुख दुख मे सदा आए काम।
सदा रहेंगे जग मे मित्र सुदामा कृष्ण के नाम।।
कृति:-आचार्य तोषण

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