शनिवार, 2 मई 2020

वंदना प्रभु राम को

चंडिका छंद
१३/१३
१३/१३

मिरचा भजिया राँधके,
चटनी तगड़ा भाँजके।
खाले जी अरुणाभ तँय,
भेजत हँव गा पोठ मँय।

नरवा तीर कछार मा,
आबे सोज करार मा।
ठाड़े रहिहँव खेत मा,
देखत रहिहँव नेट मा।।

उल्लाला छंद

८'५/८'५
८'५/८'५

वंदना है प्रभु राम को,
दर्शन की है कामना।
मिल जाए आशीष जो,
चाहूँ कोई धाम ना।।

आए हैं दरबार में,
भर दो झोली आज ये।
तरसे है दीदार को,
मेरे तख्तो ताज ये।।

रखवाला है साथ जो,
गम है किस बात का।
दिल को है विश्वास तो,
डर क्यों काली रात का।।

दिनकर का दिन ढले,
छाई रजनी चाँदनी।
वंदना होती साँझ में,
मचले  है गजगामिनी।

-@तोषण दिनकर

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

कृपा

सुप्रभातम्

छप्पय में एक प्रयास

बरसे मुझपे आज,कृपा जी रघुवर तेरी।
पूरन कर दो काज,धन्य हो जीवन मेरी।
जपूँ नाम दिन रात,आस ये लेकर मन में।
दैहिक भौतिक ताप,समाये मत इस तन में।
विनती है कर जोड़कर,सब कुछ तेरे हाथ में।
छुट जाए सारे जगत,रहना बस तुम साथ में।।

-तोषण दिनकर

रविवार, 26 अप्रैल 2020

पोथी पढ़ो पुरान

पोथी पढ़ो पुरान,बिना गुरु के ज्ञान नहीं।
राम कृष्ण भगवान,भला छुटकर रहे कहीं।
बालक ध्रुव प्रहलाद,भक्ति मति माता शारद।
जन्म हुआ आबाद,मिले गुरु जैसे नारद।
अरुण निगम गुरुदेव जी,मिले सदा आशीष हो।
छंद के छ परिवार ये,चमके लाख बरीष हो।

तोषण दिनकर

जयकारी

जिनगी राहत करले मोर
मरबे ताहाँ कइसे तोर
जाँगर हा टुट जाही तोर
बुढ़वा पन में दाँत निपोर।.....जय गंगान

घर में खुसरे रहव सियान
राखे रहिहव बात ल ध्यान
परही नइते धर बूची कान
किजरव झन गा  दिनमान।.....जय गंगान

कोरोना देवव दुतकार
काहत हावय जी सरकार
आनी बानी के लोकाचार
पड़ही नइते डंडा मार।....जय गंगान

दिनकर के तै बात ल मान
डारव झन जोखिम जान
काहत हावँव जी ईमान
राखव संगी मोरो मान।......जय गंगान


-तोषण दिनकर

गलती

गलती मेरी ज्ञात हो,हम भी है हकदार।
रोक टोक हमपे करो,जरा करो उपकार।
जरा करो उपकार,बात तो सच्ची बोलो।
कमी कहाँ पर भार,राज भी अपनी खोलो।
कह दिनकर कर जोड़,बात ही सच्ची फलती।
हमसे मुँह मत मोड़,सभी मिल पकड़े गलती।

-तोषण दिनकर

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

छंद के छ स्थापना

छंद के छ परिवार के स्थापना दिवस म संस्थापक गुरुदेव अरुण कुमार जी निगम के संग सबो छंदकार मन ला बधाई...

गुरू ज्ञान के कोठरी,बाँटे नित्य सज्ञान।
बिन माँगे आशीष दे,कारज करे महान।।१।।

अपनी चिन्ता छोड़कर,सदा बाँटते ज्ञान।
देकर के आशीष सब,गढ़ते शिष्य  सुजान।।२।।


गुरू चरण मे शीश दो,लेलो भरभर ज्ञान।
मिले ज्ञान को बाँट लो,कारज यही महान।।३।।

बिना गुरू के ज्ञान कब,पोथी पढ़ो पुरान।
लेने शिक्षा स्वयं गये,राम कृष्ण भगवान।।४।।

दर्श किये भगवान का,बालक ध्रुव प्रहलाद।
नारद जैसे गुरु मिले,जनम हुआ आबाद।।५।।

अरुण निगम गुरुदेव जी,मिले सदा आशीष।
छंद के छ परिवार ये,चमके लाख बरीष।।६।।

-तोषण दिनकर

बेटी


॥बेटी॥
****************************
बेटी बनके जनम धरेंव, दाई ओ तोर कोरा मा।
दिन कटै हे दाई तोर, एकठन बेटा के अगोरा मा।

मोर छठ्ठी मा रुखा सुखा,सगा सोदर नइ मानेस ।
का बनगेंव बैरी दुसमन, अपन लइका नइ जानेस।

तहूं बेटी रेहे अपन दाई के,महूं तोरे छंइहा आवंव।
रहूं तोर संग आघू पाछू, छोड़ तोला कहां जावंव।

का बेटा हा सबरदिन,अपन पुरखा कुल तारत हे।
बेटी घलो कम नइहे, मइके ससुरार ल उबारत हे।

तइहा के बात बइहा लेगे,नवा जमाना आवत हे।
आज बेटी बेटा संन,कदम ले कदम मिलावत हे।

बेटी जागिस जीजा बाई, कोरा मा शिवा खेलाय।
गरजिस हाबे लछमी बाई, अंगरेज दूरिहा भागय।

महूं ल थोरकून पढन दे,जिनगी ल अपन गढन दे।
नांव होवय मोर संग तुहर,अइसन करम करन दे।

मरहूं  देश बर जीहूं देश बर ,देश के सेवा बजाहूं।
चहूंओर ए दुनिया मा ,भारत के तिरंगा लहराहूं।
*****************************
                         
 तोषण कुमार चुरेन्द्र "दिनकर"

मनरेगा (तोषण कुमार चुरेन्द्र"दिनकर)

*मनरेगा*

मनरेगा   की  योजना,  गाँव-गाँव  में  शोर।
काम  मिले  मजदूर  को, शासन देता जोर।
शासन  देता  जोर, मिले   है  सबको  पैसा।
नहीं  कहीं  अब झोल, समझ ना ऐसा वैसा।
पत्रक   भरकर   माँग, काम को शासन देगा।
मिलकर करना काम,दिवस सौ का मनरेगा।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र "दिनकर"
युवा सरपंच व साहित्यकार
ग्राम पंचायत धनगाँव डौंं.लो. बालोद छ.ग.

दोहा विधान

गढ़लव दोहा छंद सब,रखलव थोरिक ध्यान।
तेरा ग्यारा के नियम,चार चरण के मान।
चार चरण के मान,अंत में गुरु लघु बाँधव।
पहिली राखव झिन जगण,छंद ला बढ़िहा छाँदव।
दिनकर के हे बात,गाँठ ले कनिहा  कसलव।
जल्दी मिलही भान,छंद दोहा सब गढ़लव।

तोषण कुमार चुरेन्द्र "दिनकर"

शुरु होथे सममार के

छंद:- चंडिका
मात्रा 13/13 दो पद चार चरण

शुरु होथे सममार के,पूरा मंगलवार के।
गणपति हे बुधवार के,गुरु बंदन गुरवार के।

संतोषी शुकरार के,हे शनि शनिवार के।
दिनकर हे अब साथ में,चमके हे नित माथ में।

चंदा चमके रात कुन,मोरो तै बात सुन।
पवन चलत हे सर सरर,गरजे बादर घर घरर।

तेदूँ महुआ जोर हे,चार डुमर के शोर हे।
गरमी दिन के बात हे,भुँइया बड़ चर्रात हे।

आमा के हे डार में,कोयल कुहके खार में।
आजा तरिया पार रे,देखँव तोल निहार रे।

तोषण दिनकर नाँव हे,लोहारा धनगाँव हे।
आहू जी सब खरखरा,गाँव तीर हे झरझरा।

@तोषण कुमार चुरेन्द्र "दिनकर"

रविवार, 12 अप्रैल 2020

प्रकृति की शक्ति

विधा घनाक्षरी
विषय प्रकृति की शक्ति
दिनाँक12/4/20

( सृष्टि=प्रकृति )

सृष्टि शक्ति क्षीण हुई 
धीरज विहीन हुई,
कोरोना का वायरस
घन बन छाएं हैं।

चर चाहे हो अचर
उपवन बेअधर,
डर यह कालिमा की
रोज मंडराएं हैं।

मुश्किलों की है ये घड़ी
चुनौतियां बड़ी-बड़ी,
थक हार नहीं साथी
क्षणी विपदाएं हैं।

अमीर गरीब सारे 
सब के हो एक नारे,
भागेगा अब कोरोना
चेतना जगाएं हैं।

तोषण कुमार"दिनकर"

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

प्रकाश के दोहे

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

माँझी मैं पतवार तू, तू जीवन का सार।
पूरे ही संसार का , है तू पालनहार।।

प्रेम गली अति साँकरी, गुरु निंदा बेकार।
सत-मार्ग पहचान लें, मिथ्या है संसार।।

पर नारी ना प्रेम कर, जो माने विद्वान।
हुआ नाश है लंक का, जाने सकल जहान।।

ये जग ठगनी है बड़ी, जानो चतुर सुजान।
दो दिन की है जिंदगी,बिरथा करे गुमान।।

लगी लगन है श्याम से ,तके नयन दिन रात ।
सब के जीवन में कर दे, खुशियों की बरसात।।

राम नाम ही सार है, मानो मेरी बात।
चार दिनों की चाँदनी, फिर अंधेरी रात ।।

राम वही रहमान वही , वही ईश भगवान।
मत फिर अंतर ढूंढता, वही पुराण कुरान।।

ज्ञान गुरूवर दे मुझे, सीखू छंद विधान।
शरण पड़ा तेरे रहूंँ ,कभी न हो अभिमान।।

- परमानंद "प्रकाश"
गुरूर बालोद छ.ग.
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

परिचय

संक्षिप्त परिचय
नाम तोषन कुमार चुरेन्द्र साहित्यिक नाम "दिनकर"। पिता श्री जोहर लाल चुरेन्द्र माता श्रीमती कैलेन्द्री बाई चुरेन्द्र ।ग्राम धनगांव में मेरा जन्म 28 जून 1984 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। चार भाई बहनों में सबसे बड़ा हूं। पत्नी श्रीमती चित्ररेखा चुरेन्द्र पुत्र डुमेश कुमार चुरेन्द्र ।मेरी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम धनगांव में ही हुई ।हायर सेकेंडरी की शिक्षा डौंडीलोहारा में हुई। माताजी के देहावसान पश्चात परिवारिक जिम्मेदारी के कारण शादी हो गयी तो आगे की पढ़ाई नहीं कर पाया।इग्नू के माध्यम से डी एड की परीक्षा उत्तीर्ण की। सत्र 2008 से लेकर 2019- 20 तक सरस्वती शिशु मंदिर डौंडीलोहारा आचार्य के पद पर दायित्व निर्वहन करता रहा। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में विजयी होकर आज सरपंच पद का दायित्व निर्वहन कर रहा हूं साहित्य के क्षेत्र में मधुर साहित्य परिषद इकाई डौंडीलोहारा जिला बालोद छत्तीसगढ़ के उपाध्यक्ष पद पर कार्य कर रहा हूं।

छत्तीसगढ़ में बिहाव के परंपरा*

*छत्तीसगढ़ में बिहाव के परंपरा* 

                मनखे के जिनगी मा सोला ठन संस्कार होथे जेमां नाम रखई संस्कार से लेके अंत्येष्टि संस्कार तक के माने जाथे। बात अगर देखन बिहाव संस्कार के जेमा दू परिवार, दू कुल, दू गांव ,दू सियार, हर आपस में मिल जाथे। बिहाव संपन्न करे बर बड़कन  बिधि -बिधान करे जाथे जेकर कुछ अंश आप सब के आघू परोसत हँव:-

*लड़की के खोज*
               बिहाव करे के पहिली सियानन मन उदीम करथे कि ऐसो हमन अपन बेटा या बेटी के बिहाव करबोन। बेटा वाले टुरी खोजे बर निकलथे, बेटी वाले मन घलक सगा के अगोरा करत रथे। 

*बहु चिन्हई* :- 
                लड़का पक्ष ला लड़की मिल जाथे । एक दूसर के चिन पहिचान के बाद एक बंधना करे जाथे जेला बहु चिन्हई कहे  जाथे। जेगर ले अब वह लड़की ला कौनौं दूसरा सगा ला नहीं दिखाय जाय। ये परकार ले बिहाव के पहिली नेंग बहु चिन्हई से होथे।

*सगाई* :- 
                बिहाव तिथि के तीर मा  सगाई के कार्यक्रम रखे जाथे। जेमा लड़का पक्ष और लड़की पक्ष के डहर ले नरिहरफल  लायची दाना अउ बड़कन परकार के मेवा मिष्ठान के आदान प्रदान करके लड़का पक्ष द्वारा  लड़की पक्ष मुँदरी भेंट कर जाथे। एक दूसरा ल पहनाए जाते ये कार्यक्रम निपटे के बाद जम्मो सगासोदर ल यथाशक्ति तथा भक्ति भोजन प्रसादी करवाय  जाथे।

*बिहाव के दिन बादर* :- 
                एकर बाद दिन तिथि धरई के काम शुरू हो जाथे। बड़े-बड़े सियान मन मिलकर बिहाव ला कब मढ़ाना है कहिके शुभ मुहूरत निकाल के लड़का पक्ष के डहर ले लड़की पक्ष ला संदेश दिए जाथे।ओकर बाद फेर  लड़का और लड़का पक्ष कारट छपवा के अपन - अपन पूरा परिवार, सगा सोदार ल बिहाव के नेवता दे जाथे।
जइसे-तइसे बिहाव के दिन बादर आथे।तब सब सदस्य मन सकलाके ढेरहीन सुआसीन मिलके  बिहाव के नेंग नता ला शुरू करथे।

 *बिहाव के पहिली दिन* :-
               बिहाव मा ढेरहीन ढेरहा के विशेष योगदान रथे। जिखर हाथ ले बिहाव के नेंग नता सुरू से अंत तक ईखर भूमिका रथे। बिहाव के दिन ले सबले पहिली गांव की पतिहा भाई मन डारा छाय बर जाथे, जेला मंडप आच्छादन कहे जाथे। ओकर बाद सांझ के समय ढेरहीन हुआ सीन मन ढेरहा सन में बाजा गाजा के संग मडवा पूजन, चुल माटी लानेबर जाथे ।त *इही गीत गाथे:- तोला माटी कोड़ेन नंइ आवय मीत धीरे धीरे...तोला पर्रा बोहे नंइ आवय मीत धीरे धीरे...* चुलमाटी लाके मड़वा  के चारो मुड़ा ला सजाथे। सांझ के पांच सात झन मिलके मड़वा मा चार ठन दीया बार के कुँआरी धागा ले बंधना करत चारो दिशा ला चारों धाम के देवता मनला नेवता देके मंडवा मा बलाथे।गाँव के शीतला माता ल घलक करसा अऊ कच्चा हरदी भेंट करके बिहाव मा नेवता देथे।  खाना पीना खाए के बाद रात कुन घर के भीतरी मा दूल्हा दुल्हिन के मुड़ी मा मँऊरर बांध के चोर तेल चढ़ाय  जाथे। दूल्हा अउ ढेरहा दोनों मिलकर मडवा मां भीतर ले करसा  मड़वा मा लाथे। तहाँन तेल हरदी चढ़ाई शुरू होथे। त *इही गीत गाथे :- एक तेल चढ़गे दाई तोर जनामन मड़वा मा दुलरू तोर बदन कुमलाय...*  *झुलना गीत आमा मँऊरे बोईर झंऊरे बोईर झंऊरे...नदी नरवा ल छ़ोडके कुआँ म तँऊरे...* तेकर बाद *इही दोहा जय जननी ज्वाला मुखी सकल हरन भुइ भार ,लजजा मोरे राखो माता भरे सभा दरबार...* के संग  मैंन नाचा आणी बाणी के दोहा ददरिया करमा पंथी गाना गा गा के मैंन नाचना शुरू हो जाथे।दूल्हा बाबू के हाथ गोड़ मा मनमाड़े हरदी चुपरथे। *हाथ गोड़ म हरदी चुपरे के समय इही गीत कथे :- कोन तोरे लाने दूलरू पथरा के हरदी बने.. कोने तोरे बिरही सजाय चंदन रूख आय सजन घर मड़वा गड़े...* अव हाथ मा कंकण नहडोरी घलक बांधथे।

 *दूसर दिन* :-
                बिहान दिन दूल्हा राजा ला नउहा खोरा के बरतिया जाए बर नवा नवा कपड़ा लत्ता पहिना के तइयार करे जाथे। जेमा  हमर  समाज के एक ठन नियम हे कि दूल्हा ला सफेद कमीज अउ धोति पहना के अउ तेंदू सार के लउठी धराके बरतिया जाए बर तइयार करथे। बरतिया घर ले निकल जाथे ।

*बारात स्वागत* :-
               बारात निकलके दुल्हिन के गाँव पहुंच जाथे। ऊँहां जाए के बाद दूल्हा बाबू दुल्हिन के घर मड़वा छुए बर जाथे। तो बढ़िया धूमधाम के साथ स्वागत करत दुल्हिन के कका बाप जम्मो भाई मन मिल के दूल्हा राजा के स्वागत करथे। दूल्हा राजा दुल्हिन के घर मुहाटी म जाथे ।तब दुल्हिन पक्ष के ढेरहीन सुहासिन मन  मुहाटी में घघरा मा पानी लेके खड़े रथे। जेमा  दुल्हा राजा हा  10 के सिक्का नंइते 5 के सिक्का डालथे अउ पर्रा ला तेंदूसार के लउठी मा 7 घाँव ले धीरे-धीरे ठठाथे। तेकर बाद दूल्हा राजा  दुल्हिन पक्ष से दुल्हिन के काकी महतारी मन अपन तरफ से फुल पैंट कमीज घड़ी उपहार में दे थे। 

*लाल भाजी खवइ* :-
               यह सब चीज होय के बाद दूल्हा राजा ला लाल भाजी खवा के नियम हे । त जेवनास डेरा मा ढेरहीन सुआसीन मन जाथे जिहाँ दूल्हा के सारी मन, ढेरहीन सुआसीन मन मिलके लाल भाजी खवाय बर जाथे त इही ददरिया गाथे  *दर दर दर दर आए बरतिया कोठा मा ओईलाई रे भूख लगीस तहाने पैरा भूसा खाई रे*  अईसन ढंग ले भडौनी गीत आनंद लेथे।अऊ लड़की पक्ष में लड़की के  तेल हरदी कंकण नहडोरी के बाद नहवाथे।

*लगिन भाँवर* :-
               अऊ सांझ की बढ़िया शुभ मुहूरत देखके नवा नवा साज सिंगार के संगे दुल्हा अउ दुल्हिन के लगिन चाँऊर संग लगिन भाँवर परथे।तेखर बाद दाई ददा मन अपन हाथ ले कन्यादान करथे। *त इही गीत आगू मा गाथे...तोरे धरम ले धरम हे वो आओ मोरे दाई तीनों तिलीक जीत डारे ओ...*  सेन्दूरदान होय के बाद ममा नंइते जेठ के डहर ले मुड़ी ढंकइ के नेंग पूरा करे जाथे। ढेरहीन सुवासीन.मन टिकान देव इय्या मन ल *इही गीत सुनाके का कथे :- भैंसी के दूध भैंसाईन ओ आगा मोरे ममा चना खायबर पैसा देबे गा...*  पूरा परिवार मिलके अपन इच्छा मुताबिक उपहार, भेंट करथे अउ दूल्हा- दुल्हिन ला  आशीर्वाद देथे।पूरा टिकावन होय के बाद  एक साथ हिल मिल के प्रीतिभोज कराए जाथे।

*बेटी बिदाई* :- सब जन अंतिम समय में दुल्हिन ला दूल्हा सन में जोरन धरा के बेटी ला विदा करथे *त इही गीत कथे :- जा दूलौरीन बेटी तै मईके के सुध झन लमाबे...* बहिनी के बिदा करत घलक भाई ह कल्हरत नानकुन गुड़ खवाके बहिनी के मुँह ल मीठ करथे। बेटी के विदा हो जाथे। सीधा दूल्हा और दुल्हिन ला लेके अपन गांव आजथे। तब गांव के सियान मन सदस्य मन दूल्हा दुल्हिन के बाजा गाजा के साथ पटाखा फोड़त स्वागत करथे। माई घर में जाके माता रानी के, अपन पुरखा के  देवी देवता के आशीर्वाद लेथे।बिहाव घर म जाय के बाद जम्मो परवार मन दूल्हा दुल्हिन के मँऊर सौंप के आशीष देथे।

*चवथिया स्वागत* :-
               दुल्हिन पक्ष के पूरा परिवार मन अपन बेटी के डेहरी ल देखे खातिर अउ बेटी ल संग म लेगे बर चवथिया बनके आथे। बाजा गाजा के साथ बने- बने स्वागत सत्कार घलक होथे। समधी ह समधी ल दूबी चाऊँर खोचके समधी भेंट करथे। समधीन ह समधीन ल दूबी चाऊँर खोचके समधीन भेंट करथे। अऊ एक दूसर के हाथ ल धरके घर कोती आएल लगथे।

*धरम टीकावन* :-
                सांझ के समय दुल्हा पक्ष के जम्मो परिवार मध धर्म टिकावन के अवसर मा अउ सगा सोदर मन अपनी इच्छा अनुसार दूल्हा- दुल्हिन ला उपहार भेंट करके आशीर्वाद देथे । फेर अंत में सबो सगा संबंधी मन ला प्रीतिभोज कराय जाथे। 

              ये परकार ले हमर छत्तीसगढ़ में बिहाव की संस्कृति परंपरा साफ व सुंदर रूप से संचालित करे जाथे।

लेख:- 
तोषण कुमार दिनकर
डौंडी लोहारा बालोद
छत्तीसगढ़ 491771
च.भा. क्र.6267538036

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

साक्षात्कार

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी,  वैसे तो आप किसी परिचय के मोहताज नहीं है। लेकिन फिर भी हमारे पाठक आपका परिचय आपके शब्दों में जानना चाहते हैं?

*तोषण*:-गुरुदेव को सादर प्रणाम!  सबसे पहले आपको विज्ञात छंद के सृजक के रूप कोटि कोटि बधाई व शुभाकामनाएँ।मेरा नाम तोषण कुमार चुरेन्द्र और साहित्यिक उपनाम "दिनकर" पिताश्री जोहर लाल चुरेन्द्र और माता श्रीमती कैलेन्द्री बाई चुरेन्द्र। ग्राम धनगांव में मेरा जन्म 28 जून 1984 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। हम चार भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ा हूं ,और तीन बहने ललिता/टीकम ,सरिता/खेमलाल और सबसे छोटी तुलेश्वरी जिनकी शादी इस वर्ष होनी है।पत्नि श्रीमती चित्ररेखा पुत्र डुमेश कुमार कक्षा 7वीं। मेरी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम धनगांव के प्राथमिक पाठशाला में हुई और पूर्व माध्यमिक शिक्षा व हायर सेकेंडरी शिक्षा शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय डौंडीलोहारा में हुई। 2003 मे माता के देहावसान के कारण पारिवारिक जिम्मेदारी उठाते हुए उच्च शिक्षा पूरी नहीं हो पाई। इग्नू के तहत डी.एड की परीक्षा उत्तीर्ण की ।सत्र 2008 से सत्र 2019-20 तक मैं सरस्वती शिशु मंदिर डौंडीलोहारा में आचार्य (शिक्षक) के पद पर आसीन रहा ।तदुपरांत इस वर्ष त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में विजयी होकर सरपंच के पद पर अपना दायित्व निर्वहन कर रहा हूं।साथ ही मधुर साहित्य परिषद डौंडी लोहारा का उपाध्यक्ष पद पर भी दायित्व निर्वहन कर रहा हूँ।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, फिर साहित्य के प्रति आपकी रुचि कैसे जागृत हुई?

*तोषण* :-जहां तक साहित्य के प्रति रुचि का सवाल है तो मैं कक्षा दसवीं से ही समाचार पत्र बाल भूमि और विभिन्न तरह के पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने में ज्यादा रुचि रखता था और साथ ही साथ जो कविताएं ,कथा मुझे पसंद थी उसका कटिंग अपने पास में रखता था और उसको एक भावचर फाइल में गोंद लेकर चिपका देता था। कक्षा पांचवी से ही मैं कला जगत में नाटक, लीला लोक कला मंच आदि-आदि संस्थाओं में सहर्ष रूप से भाग लेता था।जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती गई वैसे वैसे मैंने रामायण रामधुनी, रामलीला ,कृष्ण लीला आदि में भाग लेना शुरू कर दिया। जहां तक बात आती है साहित्य के क्षेत्र में आने की, तो कक्षा 12वीं में आने के बाद सर्वप्रथम एक बार विद्यालय स्तर पर कविता लेखन की प्रतियोगिता हुई जिसमें मैंने अपनी टूटी फूटी भाषा में एक छोटी सी कविता लिखी जिसका शीर्षक था- *आतंकवाद* 
कुछ इस तरह से

*"उठा रहे हैं सवाल दर सवाल*
 *मचा रहे हैं जनसंवाद*
 *कैसे मसला हल होगा* 
*देश से मेरा आतंकवाद"*

2016 में फेसबुक पटल पर श्री रमेश चौहान द्वारा छत्तीसगढ़ के पागा कलगी मंच पर छत्तीसगढ़ी रचनाओं का सप्ताहिक प्रतियोगिता होने लगा जिसे देखकर मैंने भी अपने शब्दों में लिखना शुरू किया, धीरे-धीरे उसमें रफ्तार पकड़ता गया और प्रतियोगिता क्रमांक सात या आठ है, जिसमें मैंने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। इसे देखकर मधुर साहित्य परिषद जिला बालोद छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डॉ अशोक आकाश द्वारा मुझे परिषद में जुड़ने का अवसर प्रदान किया।जहां पर मेरी मुलाकात परम आदरणीय अरुण कुमार जी निगम के शिष्य रमेश जी चौहान से हुई ।जिन्होंने मुझे कविता लेखन कार्य पर सांत्वना देते हुए *दोहा के रंग* पुस्तक सौंपते हुए आशीर्वाद प्रदान किया।और कहा चुरेंद्र जी आप अपनी कलम की गति को हमेशा बनाए रखें निश्चित ही  एक दिन छत्तीसगढ़ में अपना नाम रोशन करेंगे और इसी बात को लेकर मैंने अपना कलम समाज के नाम पर समर्पित कर दिया।डॉ अशोक आकाश ने मुझे अपने साथ जहां-जहां भी जाते वहां संग ले जाते और मुझे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिलता गया ।एक बात और कहना चाहूंगा जब हमारे गांव में रामधुनी प्रतियोगिता हुई तो उसमें एक उद्घोषक छोटू सिंघोलिया राजनादगांव से आया था। उनको देख कर मेरे मन में भी विचार आया कि मैं भी ऐसे ही लोगों के सामने बोलता चलूं और लोग मुझे सुनते रहें।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, साहित्य से पृथक अभिरुचि के विषय क्या क्या हैं ? 

*तोषण* :- साहित्य से अगर हटके अलग अभिरुचि की बात है तो आप सभी लोग जानते हैं कि सबसे पहले कक्षा दसवीं (2001) से मैं मंडली में जुड़ा तब मुझे  लड़की पात्र का अभिनय करने का अवसर मिला। लेकिन जैसे-जैसे शारीरिक बनावट में वृद्धि हुई। फिर मुझे लड़कों वाला पाठ करने के लिए  संचालक महोदय विजय पटेल द्वारा कहा गया। मैं रामलीला, नाटक,कृष्ण लीला, गायन, तबला वादन, माधस व्याख्यान व उद्घोषक का कार्य भी करने का सौभाग्य मिलता है तो छोड़ता नहीं। दसवीं पढ़ रहा था तो मैं बाजा बजाता था सामाजिक वाला, जिसके चलते वादन के क्षेत्र में मैं भी अपना योगदान प्रदान करता हूं।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आपकी पसंदीदा विधा कौन सी है, जिसमें आप ज्यादा लिखना पसंद करते है? 

*तोषण* :- गुरुदेव जहां तक विधा की बात आती है तो सबसे पहले मैंने दोहा ही सीखा उसके बाद अन्य विधाओं में धीरे धीरे रुचि जागृत होने लगी और जाहिर सी बात है आदमी जो पहले सबसे पहले सीखता है,उसी पर ही उसकी विशेष रूचि होती है ठीक उसी तरह मेरा भी लगाव प्राथमिकता क्रम में दोहा और कुंडली ही है।बाकी विधाएँ स्वेच्छानुसार।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, साहित्य की एक वह विशेष बात क्या रही जिसने आप को सबसे अधिक आकर्षित किया ? 

*तोषण* :-साहित्य के क्षेत्र में मैं जो है यहां तक पहुंचा हूं उसका। श्रेय सर्वप्रथम अशोक आकाश जी जिन्होंने मुझे अपने परिषद में जोड़ा और आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान की के बाद धीरे-धीरे रमेश जी चौहान ने मुझे लेखनी को सतत क्रियाशील बनाए रखने में संबल प्रदान उसके पश्चात अरुण कुमार जी निगम ने संघ के 6 परिवार में जोड़ कर मुझे एक संबल प्रदान किया और वहां से धीरे-धीरे सीखने सीखते सीखते से मुझे सानिध्य मिला डॉक्टर संजय कौशिक जी विद्या जो कि हमेशा मेरा मार्गदर्शन मेरा उत्साहवर्धन हमेशा एक प्रेरक के रूप में बढ़ाते रहते हैं और निश्चित ही आपके सहयोग से मैं आज इस मुकाम पर हूं कि लोग मुझे धनगांव में कवि के रूप में जाने लगे हैं गांव में कुछ भी कार्यक्रम होता है तो सबसे पहले बोलने के लिए या कुछ कहने के लिए दो ही व्यक्तियों को बुलाया जाता है एक तो श्री गुरु घासीदास मानिकपुरी मानस मंडली गांव के संचालक विजय पटेल और या फिर तोषन कुमार चुरेन्द्र दिनकर जो आपके सामने हूँ। साधुवाद ज्ञापित करता हूं हमारे उन सभी प्रेरणा स्रोत को जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए शतक मार्गदर्शन प्रदान किया बहुत-बहुत धन्यवाद ज्ञापित करता हूं।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आप अपनी सशक्त लेखनी के लिए जिम्मेदार किसको मानते हैं अर्थात प्रेरणा स्रोत किसे मानते हैं? 
*तोषण* :- साहित्य के क्षेत्र में मैं जो है यहां तक पहुंचा हूं उसका श्रेय सर्वप्रथम अशोक आकाश जी जिन्होंने मुझे अपने परिषद में जोड़ा और आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान की के बाद धीरे-धीरे रमेश जी चौहान ने मुझे लेखनी को सतत क्रियाशील बनाए रखने में संबल प्रदान उसके पश्चात अरुण कुमार जी निगम ने संघ के 6 परिवार में जोड़ कर मुझे एक संबल प्रदान किया और वहां से धीरे-धीरे सीखने सीखते सीखते से मुझे सानिध्य मिला डॉक्टर संजय कौशिक जी विद्या जो कि हमेशा मेरा मार्गदर्शन मेरा उत्साहवर्धन हमेशा एक प्रेरक के रूप में बढ़ाते रहते हैं और निश्चित ही आपके सहयोग से मैं आज इस मुकाम पर हूं कि लोग मुझे धनगांव में कवि के रूप में जाने लगे हैं गांव में कुछ भी कार्यक्रम होता है तो सबसे पहले बोलने के लिए या कुछ कहने के लिए दो ही व्यक्तियों को बुलाया जाता है एक तो श्री गुरु घासीदास मानिकपुरी मानस मंडली गांव के संचालक विजय पटेल और या फिर तोषन कुमार चुरेन्द्र दिनकर जो आपके सामने साधुवाद ज्ञापित करता हूं हमारे उन सभी प्रेरणा स्रोत को जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए शतक मार्गदर्शन प्रदान किया बहुत-बहुत धन्यवाद ज्ञापित करता हूं।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आपके जीवन में कोई ऐसी विशेष घटना जो प्रेरणादायक रही है और आप उसे गर्व से साझा करना चाहते हैं? 

*तोषण* :- कोई ऐसी विशेष घटना तो नहीं है फिर भी एक बार अब उनको बताना चाहूंगा एक बार मैं अपने साडू भाई के गांव में रामायण सम्मेलन में उद्घोषक कार्य करने के लिए गया हुआ था पहली बार था वहां पर मैंने देखा कि विभिन्न जिलों से आए हुए मानस पुत्रों के द्वारा अनेकानेक कथा वाचन गीत आदि की प्रस्तुति करण को देखकर मेरे मन में भी ऐसा विचार आया कि मैं भी दूसरों के संकलन को छोड़कर खुद का रचना बनाकर उसका वाचन करो और उसी दिन से मैंने तू बंदी रचना आरंभ कर दी तब से लेकर आज तक यह प्रक्रिया जारी है और हमेशा यह चलता रहेगा।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आपको क्या लगता है एक लेखक की कलम का उद्देश्य आत्मसुखाय चलना सही होता है या साहित्य और समाज कल्याण करते हुए?

*तोषण* :- मुझे लगता है कि एक लेखक की कलम का उद्देश्य आत्म सुख के लिए ही सीमित ना हो बल्कि समाज को एक दिशा देने के उद्देश्य से हो आज हम देखते हैं हमारे भारतवर्ष में अनेक कवि लेखक हुए हैं जिन्होंने आज भी अपनी लेख के माध्यम से पूरे समाज को पूरे देश को जागृत कर रहे हैं एक बात बताना चाहूंगा जब मैं कक्षा चौथी में था वहां पर मैंने एक पाठ पड़ी थी पांच बातें जहां पर हरपाल सिंह के गुरुदेव द्वारा मुख्य पांच बातें बताई जाती है 1.जो भी तुम्हारा भला करें उसकी बात मानो, 2.बिना योग्य हुए किसी की बराबरी मत करो, 3.किसी की दिल दुखाने वाली बात मत करो दो बातें और याद नहीं आ रहा है। इस प्रकार से पढ़ने वाले के मन में एक विचार उत्पन्न करना ही रचना का सार्थक होना समझता हूं। समाज में एक संदेश जाना चाहिए तभी जो है हमारी कलम की मेहनत सार्थक होगी।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आपकी रचनाओं में साहित्य की लुप्तप्राय समृद्ध शब्दावलियों के साथ-साथ आँचलिक भाषा का समन्वय मिलता है, आप इस पर क्या कहेंगे?

*तोषण* :-  साहित्य में जहां तक भाषाओं की बात है तो आपको बताना चाहूंगा सबसे पहले मैंने हिंदी में ही लिखना शुरू किया था फिर रमेश जी चौहान के संपर्क में आने के बाद छत्तीसगढ़ी में भी लिखना आरंभ किया। हिंदी तो सबको समझ में आती ही है साथ ही साथ मेरे मन में एक बात आई छत्तीसगढ़िया भाइयों को भी लेकर अपनी भाषा में उनके लिए भी लिखूं जिससे कि हमारी छत्तीसगढ़ी परंपरा हमारी संस्कृति रचनाओं में साफ-साफ छलके और लोग उसे पढ़कर एक अपनापन महसूस कर सके।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, एक साहित्यकार के रुप में आपके मित्र और परिवार के लोग आपको कितना पंसद करते है?

*तोषण* :- जहां तक मेरा साहित्यकार होने का सवाल है तो गांव के लोग मुझे एक साहित्यकार के रूप में नहीं जानते थे बल्कि एक उद्घोषक एक गायक एक तबला वादक के रूप में जानते थे। जब मैंने 2016 से लिखना शुरु किया था तो उस समय मुझे कोई नहीं जानते थे कि तोषण भी लिखता है रचना करता है क्योंकि उस समय मुझे ऐसा कोई माहौल नहीं मिला था कि लोग मुझे साहित्यकार के रूप में समझे, जाने। साहित्यकार के रूप में मैं तब उभरकर आया जब  मधुर साहित्य परिषद में जुड़ा।उसके बाद  डॉ अशोक आकाश जी के साथ अनेक मंचों में प्रस्तुति देना शुरू हुआ और फिर इस तरह मेरा कारवां बढ़ता गया, मुझे इस बात की खुशी है कि इतने सालों बाद मेरे गांव में इस वर्ष (2019-20) मुझे *साहित्य के दीपक के सम्मान* से सम्मानित किया गया। तब मुझे लगा कि अब गांव के लोग भी मुझे एक साहित्यकार के रूप में समझने लगे। मेरे मित्र और परिवार के लोग मेरे इस  क्षेत्र में जुड़ जाने से बहुत ही खुश हैं और मेरे छोटे छोटे जो बच्चे  जिन्हें मैं स्कूल पढ़ाता हूं वे भी मुझ से प्रभावित हैं।जब कभी स्कूल में फंक्शन या कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम हो तो मेरे सारे बच्चे मेरे पास आकर के कहते हैं  आचार्य जी हमारे लिए कुछ नया लिखकर के दो ना, मुझे बड़ी खुशी होती है कि मैं अपने बच्चों को अपने रंग में ढलने के लिए प्रेरित करता हूं। जब मैं शिशु मंदिर पढ़ा रहा था तब बच्चों को आगे आने के लिए भी प्रेरित करता था और 5-6 बच्चे मैंने तैयार कर दिए हैं मंच संचालन के लिए।आने वाले समय में वे लोग मेरा नाम जरूर रोशन करेंगे।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रति आप क्या दृष्टिकोण रखते हैं? आपके विचार से साहित्य को और समृद्ध बनाने के लिए क्या क़दम उठाया जाना चाहिए?

*तोषण* :- आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रति मेरा यही दृष्टिकोण है कि पहले के जो रचनाकार कवि  तुलसी, कबीर रहीम आदि  थे। उनकी रचनाओं में विधाएं थी जैसे दोहा कुंडलियां रोला छंद आदि। लेकिन आज देखने को मिलता है कि साहित्यकार मुक्त छंद में ज्यादा रचना करते हैं प्रभावशाली भी होता है लेकिन मैं यही कहना चाहूंगा कि हमारी संस्कृति हमारी परंपरा हमारा उद्देश्य हमारे वैदिक ग्रंथों में ही निहित है उन्हे अध्ययन करके, आने वाले भविष्य के लिए साहित्य में स्थान देते हुए रचनात्मक कार्य करते रहें। जिससे कि आने वाले भविष्य में साहित्य को एक नया मुकाम हंसी हो सके. इसके लिए हमें भूत को लेते हुए वर्तमान में रचनात्मक कार्य करते हुए भविष्य के लिए सदैव चिंतनशील रहकर साहित्य को उच्चतम शिखर तक पहुंचाया जाए।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, क्या अब तक आपकी कोई साहित्यिक पुस्तक प्रकाशित हुई है?यदि छपी है तो उसके विषय में भी कुछ बताएं।

*तोषण* :- आपको बताना चाहूंगा वैसे तो मेरी कोई साहित्यिक पुस्तक प्रकाशन नहीं हुई है लेकिन परम आदरणीय संजय विज्ञान संजय कौशिक जी विज्ञान के संपादन में हुआ प्रदीप कुमार दास जी के निर्देशन में *हाइकु की सुगंध* में मेरी 8 हाइकु प्रकाशित हुई है जिसमें मेरे उत्साहवर्धन हेतु प्रमाण पत्र भी प्राप्त हुआ है। जगदलपुर में एक साहित्यिक संस्था है जहां पर मैंने रचनाएं *मिट्टी  के दीये* संप्रेषित किये, वहां से भी मुझे सम्मान पत्र प्राप्त हुआ है और अभी हाल में  *प्रधान संपादक संजय कौशिक "विज्ञात" के द्वारा संपादित- कुंडलियां बोलते हैं, ये दोहे बोलते हैं,* इन पुस्तकों में मेरी रचनाएं सम्मिलित हुई है जो कि बहुत जल्द हम सबके सामने आने वाली है।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, जो नए लेखक या कवि आ रहे हैं उनके लिए आपका दृष्टिकोण? उनके लिए क्या सन्देश देना चाहेंगे?

*तोषण* :- जहां तक नए लेखकों या कवियों की सवाल है तो मैं भी अभी नया ही हूं जिस प्रकार में साहित्य के प्रति सोच रखता हूं कुछ नया करने का अनुभव लेता रहता हूं ठीक वैसे ही मैं हमारे नवोदित कवियों से यही चाहूंगा कि वे श्रृंगार के साथ साथ देश के आर्थिक, सामाजिक राजनैतिक ,सास्कृतिक कला के क्षेत्र में समाज को जगाने वाली रचनाएं गढ़ते रहें जिससे कि उनकी रचनाओं से समाज को एक प्रेरणा ,नई दिशा व नयी ऊर्जा मिल सके।

*विज्ञात* : तोषण कुमार दिनकर जी, हमारे लिए कोई दिशा निर्देश देना चाहें तो स्वागत है।
*तोषण* :- गुरुदेव विज्ञात जी! आपके दिशा निर्देशन में आज आपके सामने साक्षात्कार करने लायक बना हुआ हूं  मैं तो कण मात्र भी नही हूँ ,मेरी कोई अभी ऐसी काबिलियत नहीं है कि आप सबको मैं दिशानिर्देश दे सकूं बशर्ते एक सुझाव देना चाहूंगा कि हमारी कलम की सुगंध छंद शाला के माध्यम से विभिन्न प्रकार के सृजनात्मक कार्य चलता रहे जिससे हम जैसे नवोदित साहित्य के पुजारियों का मार्गदर्शन होता रहे और साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं का ज्ञान हम सभी को प्राप्त होता रहे।बहुत-बहुत धन्यवाद।

*जय हिंद* 
*जय भारत* 
*जय छत्तीसगढ़*
*।।जय कलम की सुगंध साला।।*

जन चेतना

छंद :-उल्लाला/चंद्रमणि 
विषय :-कोरोना
दिनाँक:-१०/४/२०
मात्रा १३/१३ 
प्रत्येक चरण अंत लगु 
*******************************
कोरोना के डर नहीं, मन के अपने चाल हे।
आय चीन ले घूम के,बनके सँउहत काल हे।

सरदी खँस्सी भेद हे,बात यहू तै जान ले।
दुरिहा दुरिहा बइठके,मुखिया भाखा मान ले।

गरगस्सा सब चानके,ठुकठुक लूके लेगही।
खुसरे राहव भीतरी,लउठी वाला देखही।

नीति नियम ला ध्यान दव,पालन करिहव संघरा।
अभी थोरकन माढ़ लव,पाछू नाचू भंगरा।

बात मान दिनकर कथे,सूझ बूझ ले काम लव।
कोरोना तै भाग जा,मिलके सबझन इहि कहव।

*******************************
-तोषण दिनकर

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

जय हनुमान

विधा:- चौपाई
दिनाँक:-९/४/२०
विषय :-जय हनुमान

मैं  तोषण   दिनकर  हनुमाना।
बन  सेवक  रघुवर  गुण गाना।
मात  पिता   का   हूँ अनुयायी।
राम भजन नित मुझको भायी।

जनम धरूँ  मैं  भारत धरती।
मात  अंजनी  राह  निहरती।
अरूँ  राम   सुग्रीव  मिलाऊँ।
मातु  सिया के पता लगाऊँ।

सौ  योजन  मैं पार लगाऊँ।
सब देवों  को माथ नँवाऊँ।
जाके  लंका  डंक बजाऊँ।
सोना  लंका  आग लगाऊँ।

मैं  वाटिका  अशोक  उजारूँ।
जय जय जय श्री राम उचारूँ।
मात  सिया  को   मुँदरी देता।
समाचार  सुख दुख की लेता।

प्रभु  राघव  को  हाल सुनाता।
सेतु    बंध    निर्माण  कराता।
राम लखन  लंका ले  जाकर।
कुल दशकंधर  संग  मिटाकर।

अवध  जानकी  माता लाऊँ।
राम  राज का  ढोल बजाऊँ।
रघुपति  राघव  राजा  गाऊँ।
मैं दिनकर नित माथ नवाऊँ।

-तोषण दिनकर

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

होली विशेष

रंगों का महापर्व होली की
हार्दिक बधाई व शुभाशया

होली विशेष
हाइकु पंच समीक्षार्थ

होलिका दाह~
श्रीफल चढ़ातें है
गाँव के लोग।1।

होली परब~
रंगों से है खेलती
नन्हीं बालाएँ।2।

नील बरन~
धरती को रँगती
फागून रंग।3।

होली की धूम~
नगाड़ा थाप पर
नाचते बाल।4।

फागुवा राग~
बसंत में झूमती
आम्र मंजरी।5।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.

आनी बानी रंग

छत्तीसगढ़ी कुण्डलियाँ

आनी बानी रंग हे,
           घोर-घोर के घोर।
बइरी मन हर देख के,
           नाचे मुड़ चिभोर।
नाचे मुड़ चिभोर,
           थाप सुनके नंगारा।
दुरिहा इरषा होय,
            रहे गा भाईचारा।
रंगव सातो रंग,
            बचाके संगी पानी।
भजिया गुजिया संग,
            चुरे खइ आनी बानी।

तोषण दिनकर

किरपा

किरपा सबके साथ हो,होवय झिन अभिमान।।
भूल चूक ला दे क्षमा,नइहे थोरिक ग्यान।
नइहे थोरिक ग्यान,करँव तबले मुँहजोरी।
सनके सबके बात,फेर करथँव कमचोरी।
कह तोषण कर जोर,दिखँव जी मँयहर शिलपा।
रखहूँ सब बर मान,बने जी तुँहरो किरपा।।

तोषण धनगंइहा

अनुसुइया वचन

विषय पावन
विधा चौपाई
दिनाँक 12/03/20

पावन मेरी जननी धरती।
मातु सती देवी अवतरती।
लक्ष्मी दुर्गा काली बनकर।
अरियों को भेदी है तनकर।1।

मनु मर्दानी सदा कहाई।
वनदेवी सीता सुखदाई।
शबरी झूठा बेर खिलाई।
प्रेम मगन राघव है खाई।2।

अनुसुइया की सती कहानी।
याद सदा है लोक जुबानी।
मात सिया को शिक्षा देती।
करते बखान सब नेती नेती।3।

दक्षिण कौशल पावन मेरा।
महानदी की उद्गम डेरा।
अरपा पैरी सोढुर राजे।
राजिम नगरी सुंदर साजे।4।

धन्य धन्य है दन्तेवाड़ा।
लगती है नित जहाँ अखाड़ा।
बमलाई है रक्षा करती।
भक्तों के नित संकट हरती।5।

है पावन यह पटल हमारा।
करते  रहे  सदा  विस्तारा।
साधक साधन साध्य सारे।
लग जायें करने विस्तारे।6।

तोषण है नित माथ नँवाता।
शाम सुबह बस गीता गाता।
जय श्री राम बसे घट अंदर।
सुमिरत बिदा हुये दशकंधर।7।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.

परिषद

छत्तीसगढ़िहा कुण्डलियाँ

परिषद तबहे जी हमर,बनही हीरा खान।
एक दुसर ल देख के,सीखन अउ सीखान।
सीखन अउ सीखान,समय जी थोरिक देवव।
अड़हा नाविक जान,नाव ला बढ़िहा खेवव।
कह तोषण कर जोर,भाव ले मन मा गदगद।
खिलही डोहरु फूल,चढ़ै गा सीढ़ी  परिषद।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा

बासी चटनी खाले ठनके

त्वरित कविता

बाई जी कथे मोला जी 
का बतावँव तोला जी
आठ बजत ले सुते रहिथस
बारा बजत ले जागत रहिथस

रात दिन मोबाइल के ध्यान रथे
रहिथे कहीं सुरता जेन कोनों कथे
मोर बार ल मानस निही
आगू पाछु ल जानस निही

कथे मोरो तीर ध्यान लगाय कर 
मछरी कोतरी  भूंजी लाय कर 
तभे तो तोला खवाहू जी
संग संग महूँ खाहूँ जी

महूँ ह कहेंव डुमेश के दाई
जादा झन कर ना करलाई
करोना वायरस फइले हवय
सब झन देखले घइले हवय

बासी चटनी खाले जमके
रही तन हा सबके ठनके
दारभात ल खावव संगी
जय श्री राम गावव संगी।।

तोषण धनगंइहा

कोरोना का डर

कुण्डलियाँ में एक प्रयास...

कोरोना का डर...

कोरोना का डर यहाँ,
            फैला चारों ओर।
कैसा है यह वायरस,
            नहीं दवा का शोर।।
नहीं दवा का शोर,
            करें नव उपचार सभी।
चिन्ता का यह फेर,
            कटे जल्दी रोग अभी।
कह तोषण कर जोड़,
            हाथ को प्रतिदिन धोना।
करना सभी विरोध,
            डरे भागे कोरोना।


चौपाल गली चौक को,
            बंद करे सरकार।
पता दवा की है नहीं, 
            जनता है लाचार।।
जनता है लाचार,
            सोचते बैठे सारे।
कोई तो उपचार,
            ढूँढ लो मोदी प्यारे।
कह तोषण कर जोड़,
            भीड़ जाओ महाबली।
दें कोरोना फेंक ,
             झुमें हर चौपाल गली।

कवि तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
सरपंच, ग्राम पंचायत धनगांव डौं.लोहारा

आजा दाती

कज्जल छंद विधान
मात्रा भार 14-14
सूत्र
2-2-2-2-3-3
4-4-3-3

सादर नमन
छंद:- कज्जल छंद 

आजा  दाती राह फूल।
चरणों  तेरी  न हो धूल।
राजे कर में जो त्रिशूल।
आती  है नव रात मूल।

लाली चुनरी आभ रूप।
है  लगती  मैया  अनूप।
मेरी  माता  है   स्वरूप।
बिखरी  देखो  नई  धूप।

आयी  पावन  चैत रात।
होगी  माता  मुलाकात।
दर्शन  तेरी  बड़ी  बात।
बैरी  की  हो खरी मात।

टेकूँ  नित  मैं  तुझे माथ।
बनकर  दास रहूँ सनाथ।
मिलता है आशीष साथ।
पूजा करते  सिया  नाथ।

कृति
तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.

प्रार्थना

*प्रार्थना*

जनता से है प्रार्थना,मर्जी अपनी चले ना,
नियम सरकार का, भी तो अपनाइये।

सबकी ये सोच बने,सीना ताने आगे खड़ें
गाँव के मुखिया का ,साथ तो निभाइये।

लड़ना कोरोना से है,कहना सभी से है ये,
मिलकर आज सब,कदम बढ़ाइये।

कोरोना ये भाग जाए, सावधानी अपनायें।
जन जन मिलकर,चेतना जगाइये।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौं.लोहारा बालोद छ.ग.

राम नाम जाप

*दोहा गजल*

राग द्वेष सब छोड़कर, जाप करो श्री राम।
आशा पूरन नित करे,बनते बिगड़े काम।

पूरा करते काज को,सदा करे कल्याण,
भगत हुये हनुमान जी, करे भजन निष्काम।1।

राम राम तुलसी जपे,रचा नया इतिहास,
अंतिम अवसर में मिला, प्रभु चरण सुखधाम।2।

हे मानव अब जाग जा,गहरी निद्रा त्याग,
ध्यान करो श्री राम को,अद्भुत मिले विश्राम।3।

धनुष बाण करतल सजे,मुख पर है मुस्कान,
हाथ जोड़ 'दिनकर' खड़ा,शत शत करे प्रणाम।4।

-तोषण दिनकर

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

दिनकर

🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आदरणीय संजय कौशिक "विज्ञात" जी और आदरणीया अनिता मंदिलवार "सपना"दीदी जी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। आपने मुझे उपनाम देने के योग्य समझा, इसके लिए बहुत बहुत आभार...💐💐💐

सारे जग के तम हरूँ,मिला बड़ा उपनाम।
धन्य धन्य विज्ञात जी,करूँ सदा हित काम।
करूँ सदा हित काम,साधना साधक जोगी।
रहूँ साहित्य दास,नित्य नव रचना होगी।
कह दिनकर कर जोड़,बनूँ नित सेवक प्यारे।
दो खुशियों के पुष्प,जगत को सौपूँ सारे।।

-तोषण कुमार चुरेन्द्र"दिनकर"

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

जीवन है अनमोल

कलम की सुगंध छंदशाला मंच को सादर नमन

विधा:- दोहा
विषय:-जीवन है अनमोल
दिनाँक:-6/4/20202
दिन:-सोमवार

परमारथ को साथ रख,मीठी वाणी बोल।
रख मन में सदभावना, तब जीवन अनमोल।।1।।

जीवन ये अनमोल है,गाते संत सुजान।
बिन विवेक इंसान ज्यों,लगता ढोर समान।।2।।

जीवन दीपक नित जले,देता चले प्रकाश।
दिनकर दे नव चेतना,चमके नित आकाश।।3।।

धर्म कर्म बिन साधना,बिरथा बाजा ढोल।
परहित मन में है नहीं, क्या जीवन का मोल।।4।।

तोषण हिय में धारणा,बोली तौले बोल।
सुख दुख में सब साथ हो,जीवन है अनमोल।।5।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.

रविवार, 5 अप्रैल 2020

राम राज्य

मंच को सादर नमन

विधा घनाक्षरी
विषय राम राज्य
दिनाँक 05/04/2020
दिन रविवार

जागे पहले मानवता मिटे सब दानवता,
चलें सच्ची राह साथी झूठ हार जाएगा।

दुखियों के सेवा होवे,भूखे कोई नहीं सोवे,
कर भला दुसरों की देव बन जाएगा।

सभी का आदर करे मीठी मीठी बातें करें,
आगे आके बैरी प्यारे गले लग जाएगा।

नवधा सा ज्ञान मिले,खुशियों के पुष्प खिले,
तभी मेरे भारत में राम राज्य आएगा।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

भारत मेरा देश है

चंडिका में लघु प्रयत्न
मात्रा भार १३-१३
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
भारत  मेरा देश है,
अलग यहाँ का वेश है।
ऋषि मुनियों की ये धरा,
ध्यान प्राण अब ला जरा ।१।

 जन्म जहाँ है राम का ,
नटवर नागर धाम का ।
रावण को  संघारता,
कंस अधम है हारता ।२।

आया था जब गजनवी,
महापात वो दानवी।
हार मान वो है गया,
मिली यहाँ भरके दया।३।

विलायती की मार से,
जगे हिंद अब ताड़ के।
दुश्मन के छक्के छुटे,
इधर उधर हैं सिर फुटे।४।

दुविधा से है जुझ रहा,
जाने कितना घुँट रहा,
रोती ये नर नारियाँ,
बड़ी अजीब बिमारियाँ।५।

विपदा ये विकराल है,
कालों के भी काल है।
कोरोना जो नाम है,
पता नहीं अंजाम है।६।

कोरोना को अब मात दें,
भारत का सब साथ दें।
घर में ही जनता रहे,
यूँ ही बस कुछ दिन सहे।७।

बादल ये छट जाएगा,
अच्छा दिन अब आएगा।
सबका जो सहयोग हो,
यही महा संयोग हो।८।

मिलकर ये सब जानले, 
जा कोरोना ठान ले।
लौट नही वो आएगा, 
मुकी लात अब खाएगा।९।

मिलकर जो सब साथ हो,
जोश-जोश की बात हो।
कोरोना पछताएगा, 
छोड देश अब जाएगा।१०।

कोयल काली जब कुँजे,
भारत माता जय गुँजे।
तोषण मत यूँ हार ना,
कोरोना को मारना।११।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

बेटी//कोरोना

हंसगति छंद अनजान
न जान है न पहचान 
फिर भी एक प्रथम प्रयास
सादर
नमन मंच
मात्रा भार ११/९

बेटी.......

बेटी अपनी जान,जरा सुनले माँ।
कब से हूँ मैं द्वार,करेगी कब हाँ।
निर्मम यह संसार,नमो हे भोली।
नैना तरसे नेह, भरे  कब  झोली।


कोरोना .....

दे दो माँ वरदान,करूँ मैं वंदन।
कोरोना हो दूर,करो अब भंजन।
हरलो माता भार,जरा सुन अर्जी।
खुश हो घर संसार,चले जो मर्जी।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा

गुरुवार, 26 मार्च 2020

विज्ञात जन्मदिन

परम आदरणीय श्री गुरूदेव संजय कौशिक "विज्ञात" जी जन्मदिन की बधाई व शुभाशया के संग एक कुण्डलियाँ समर्पित...

अपनी वाणी से कभी,करे नहीं आघात।
अतुलनीय जो है सदा,हैं कवि रवि विज्ञात।
हैं कवि रवि विज्ञात,रौशनी भरते मग में।
मिले मान सम्मान, सदा ही कलयुग जग में।
कह तोषण कर जोड़,पड़े माला नित जपनी।
मिले गुरू विज्ञात,वाह रे किस्मत अपनी।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.

बुधवार, 25 मार्च 2020

माता की नवरात्रि

सादर नमन
दिनाँक:- 25/03/2020
दिन:- बुधवार
विषय:-चित्राभिव्यक्ति
छंद:- कज्जल छंद में एक प्रयास

आजा  दाती राह फूल।
चरणों  तेरी  न हो धूल।
राजे कर में जो त्रिशूल।
आती  है नव रात मूल।

लाली चुनरी आभ रूप।
है  लगती  मैया  अनूप।
मेरी  माता  है   स्वरूप।
बिखरी  देखो  नई  धूप।

आयी  पावन  चैत रात।
होगी  माता  मुलाकात।
दर्शन  तेरी  बड़ी  बात।
बैरी  की  हो खरी मात।

टेकूँ  नित  मैं  तुझे माथ।
बनकर  दास रहूँ सनाथ।
मिलता है आशीष साथ।
पूजा करते  सिया  नाथ।

कृति
तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.

मंगलवार, 10 मार्च 2020

एसो होरी तिहार मा

होरी तिहार मा...

एसो के होरी तिहार मा
नंगतेहे उधम मचाबो
डोकरा बबा डोकरी दाई
सबला गुलाल लगाबो।।

नई छोड़न भइय्या भउजाई
बड़का बबा अउ बड़की दाई
कका काकी दाई ददा संन
सुघर फगुवा गाबो।
एसो होरी तिहार मा
नंगतेहे उधम मचाबो।

माते सरसो के फुलवारी 
सियान मितान संग संगवारी
धरे गुलाल अबीर हाथ मा
पिचका अजब चलाबो।
एसो होरी तिहार मा
नंगतेहे उधम मचाबो।

रंग पानी के होरी तिहार
बिन पानी हे सब बेकार
जल जीवन हे ए अनमोल
पानी हमन बचाबो।
एसो होरी तिहार मा
नंगतेहे उधम मचाबो।

तोषण धनगंइहा

होरी हे

रंगों का महापर्व होली की
हार्दिक बधाई व शुभाशया
होली विशेष
हाइकु पंच समीक्षार्थ

होलिका दाह~
श्रीफल चढ़ातें है
गाँव के लोग।1।

होली परब~
रंगों से है खेलती
नन्हीं बालाएँ।2।

नील बरन~
धरती को रँगती
फागून रंग।3।

होली की धूम~
नगाड़ा थाप पर
नाचते बाल।4।

फागुवा राग~
बसंत में झूमती
आम्र मंजरी।5।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.

प्रेम सद्भाव

*प्रेम सदभाव लिये,*
              *एकता संदेश दिये,*
*होली का त्योहार हमें,*
              *यही सिखलाती है।*
*रंग सराबोर करे,*
              *सुमता के राह गढ़े,*
*सतरंगी रंग सदा,*
              *पाठ ये पढ़ाती है।*
*आओ मिल हम साथी,*
              *मिलके मनाये होली,*
*बसंत बयार लिये,*
              *कोयलिया गाती है।*
*रंगीला परब भावे,*
              *मन मेरा नाचे गावे,*
*फाग की नगाड़ा अब,*
              *राग जो सुनाती है।।*

*तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा*
*डौंंडी लोहारा बालोद छ.ग.*

होरी हे

छत्तीसगढ़ी कुण्डलियाँ

आनी बानी रंग हे,
           घोर-घोर के घोर।
बइरी मन हर देख के,
           नाचे मुड़ चिभोर।
नाचे मुड़ चिभोर,
           थाप सुनके नंगारा।
दुरिहा इरषा होय,
            रहे गा भाईचारा।
रंगव सातो रंग,
            बचाके संगी पानी।
भजिया गुजिया संग,
            चुरे खइ आनी बानी।

तोषण धनगंइहा

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

बड़े दिनों बाद

बड़े दिनों बाद...

बड़े दिनों बाद एक बात दिल में आई है।
अपनों के भीड़ में भी कितनी तन्हाई है।

गुजारा हुआ हर पल आज कहता है मुझसे,
अब तेरी वफा में न जाने ये कैसी रूसवाई है।

बहती ये हवाएँ भी सदाएँ देती है हमको,
पहले की वफा हँस कर फिर क्यूँ बेवफाई है।

लौटकर न आना कभी जा अब दूर कहीं,
मेरे दिल की गली से सब दिन की बिदाई है।

ये फिजायें ये गुलशन भी बातें नहीं करते,
कहते ही रहते हमें ये "धनगंइहा" हरजाई है।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
उपाध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद
ईकाई डौंडी लोहारा

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

आभार

कोटि कोटि आभार

जनता हो धनगाँव के,देहव मया दुलार।
हिरदे ले काहत हवँव,तुम सबला आभार।।
तुम सबला आभार, चुने जी हावव मुखिया।
रखहूँ सबके मान,रहय जे कौनों दुखिया।।
हँव तोषण सरपंच,बनाहूँ सबके बनता।
सेवा रहिही पोठ,संग जब देवय जनता।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र'धनगंइहा'(कवि)
नवनिर्वाचित सरपंच, ग्राम पंचायत धनगाँव
उपाध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

पेट

*कुण्डलियाँ*

_*पेट*_

_*भरता जिसका पेट है,रहे वही है मौन।*_
_*दीन दुखी लाचार को, पुछे भला अब कौन।।*_
_*पुछे भला अब कौन,काम जब बन है जाता।*_
_*स्वार्थ का संसार,कौन है किसको भाता।।*_
_*रहे कहाँ से ध्यान,नहीं मन अब कुछ करता।*_
_*चंगा रहे शरीर,पेट है जब जब भरता।।*_

_*भूखा रहकर कब तलक,कैसे भजन सुनाय।*_
_*मुख से निकले राम जी,दिल से निकले हाय।।*_
_*दिल से निकले हाय,पेट जब भूखो मरता।*_
_*होकर के मजबूर,काम है फिर भी करता।।*_
_*दिन गये है बीत,खाय जो पत्ता सूखा।*_
_*रहकर सब यूँ मौन,सहो जी बनकर भूखा।*_

_*तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा*_

चुनाव माहोल

माहोल चुनाव बड़ छाए हे।
सबो समिति आगू आए हे।
मांग अड़बड़ हवय तिरपटहा,
प्रत्याशी के मति छरियाए हे।


जेन मिलथे सब काहत हे,
तुहीच ल देबोन वोट हम।
तोला रहिबोन सब चिनके,
फेर झिन करबे नोट कम।
जनता मन के चारो कोती,
हाथ दुनों अभी हरियाए हे।
मांग अड़बड़ हवय तिरपटहा,
प्रत्याशी के मति छरियाए हे।

आथे जब गाँव मा प्रत्याशी,
जनता ल गजब रिझाए बर।
देखा के अपन चुनाव चिनहा,
लगथे गा सुग्घर बताए बर।
बिना नोट के वोट नंइ मिले,
भीड़ लोगन नेता ल चेताए हे।
मांग अड़बड़ हवय तिरपटहा,
मति प्रत्याशी के छरियाए हे।

रीत हे देखव याहा कइसे ,
दानी ह लालची होवत हे।
अपन मत के दान करेबर,
ये पइसा खातिर रोवत हे।
गाँव समाज ल छोड़ सब,
अपनेच सुवारथ सधाए हे।
मांग अड़बड़ हे तिरपटहा,
मति प्रत्याशी के छरियाए हे।

गाँव के बढ़िहा विकास करय,
अइसन मुखिया बनावव जी।
मिलजुल के मोर संगी साथी,
गाँव ल सरग सजावव जी।
सच्चा ल चुनव अच्छा चुनव,
अतरी 'धनगंइहा' सोरियाए हे।
मांग अड़बड़ हे तिरपटहा,
मति प्रत्याशी के छरियाए हे।
माहोल चुनाव बड़ छाए हे।
सबो समिति आगू आए हे।
मांग अड़बड़ हवय तिरपटहा,
प्रत्याशी के मति छरियाए हे।


तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
उपाध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.
२०/०१/२०२०
९५७५०७०६८९

बुधवार, 15 जनवरी 2020

तुमने जो अगर(परमानंद प्रकाश)

....................................................

तुमने जो अगर दिल से पुकारा नहीं होता 
तुम आज मेरे तो, मै तुम्हारा नहीं होता

मै मर ही गया था, तेरे इस जुल्म-ओ- सितम से
जो रब का अगर मेरे इशारा नहीं होता

जिस रात मेरे ख्वाब मे आती नहीं है तू 
उस रोज मेरे दिन का गुजारा नहीं होता

हाँ साँथ मेरे तू जो चले राह में तो ठीक 
बिन तेरे मुझे चलना गवारा नही होता

"परमा" को तेरा प्यार अगर होता जो हासिल
तो गर्दिशो मे मेरा सितारा नही होता

- परमानंद प्रकाश,गुरुर,छत्तीसगढ

सोमवार, 13 जनवरी 2020

जाबो मतदान करे

घनाक्षरी

जाबो मतदान करे,हक ये हमर हरे,
मिले हावे मोका येला, कभु नी गंवाना हे।

चुनबो अपन नेता,सबके हावै चहेता
सुनो मोर भैय्या भौजी,विहीला जिताना हे।

गाँव के बिकास करे,दीन दुख दूर करे,
फले फूले गाँव सारी,सुग्घर बनाना हे।

सुनो सब नर नारी,मिले हावै अब पारी,
देश अउ समाज ला,सुदृढ़ सजाना हे।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
उपाध्यक्ष
मधुर साहित्य परिषद
डौंडी लोहारा

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

विचार

*किसी के चरित्र पर कीचड़ उछालने से पहले अपने निगेहबान की निगरानी रखें कि स्वयं कहाँ है। पक्षी हो या विपक्षी मनुष्य के अंतर्निहित गुण और अवगुण होना स्वभाविक है। लेकिन गुण की अधिकता के कारण अवगुण का निशान छिप जाता है शायद यह ज्ञान कीचड़ उछालने वाले के समझ से परे लगता है। कर भी क्या सकते है।कहा गया है कि*
_*" फुलै फरै ना बेत,जलधि जो बरसहि सुधा।*_
_*मुरख जान ना चेत,मिले जो गुरु बिरंचि सम।।"*_

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

उम्मीदवार के ब्यथा

*उम्मीदवार के ब्यथा*

सऊँख मोरो जी चर्राय राहय
जाके फारम फटले भरदेंव।
लड़हूँ महूँ चुनाव अब कहिके 
गाँव भर मा ढिंढोरा करदेंव।।

बनेबर बर तो मैं बनगे हावँव
सरपंच पद उम्मीदवार मँय।
आगू पाछू मोर कोनों नंइ घूमय
कइसे के करिहँव परचार मँय।।

बीजा छीतेहँव धनहा डोली मा
पानी ला घलोक देवइय्या नंइहे।
लेना जी लेना सबोझन कहिथे
संग में रेंगइय्या कोनो नंइहे।।

देख के कहिथँव ये दूनियादारी
एक बात तो अब समझ आथे।
चलथे जी ओकर आगू पीछू मा
जेन हर पाँवपूट चेपटी पियाथे।।

मँय हर रहिगेंव सिधवा सादा
दाँव पेंच मोला आवय नहीं।
सुनेंव वो मनखे कभू नंइ जीते
जेन कभू पियाय खवावय नहीं।।


मुड़ी ह फिजगेहे पानी मा तब
सुरा ला का अब  डरराना हे।
होही जइसन राम जी राखय
पाँव नंइ चिटको हटाना हे।।

कहिथे तोषन सुनगा भैय्या
डर के आघू मा ही जीत हे।
नहीं काहत हे बहिरी ले जेन
भीतरे भीतर ले तोर मीत हे।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंडी लोहारा बालोद छ.ग.
9575070689

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

बतिया

अलंकार की जानकारी

एक प्रयोग और देखें (सफल निष्फल के निर्णायक आप) 

*श्लेष अलंकार:-*
*एक शब्द में एक से अधिक अर्थ जुड़े हों (जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो किंतु प्रसंग भेद में उसके अर्थ अलग-अलग निकलते हों वहाँ पर श्लेष अलंकार होता है।*
*1 काँसा* 
*2 भाव*

*मानवीयकरण अलंकार:-* 
*अमानव ( प्रकृति, पशु-पक्षी व निर्जीव पदार्थ में मानवीय गुणों का आरोपण करना मानवीयकरण अलंकार कहलाता है* जैसे:- 
*काँसा मूरत रो रही*

*विप्सा अलंकार;-* 
*मनोभावों को प्रकट करने के लिए शब्द को दुहराना (विप्सा-दुहराना)* जैसे 
*छि: छि: -- तिरस्कृत , घृणा योग्य*

'कौशिक' काँसा हिय व्यथा, रोया काँसा जातु।
काँसा मूरत रो रही, भिक्षु-पात्र, लघु, धातु ।
भिक्षु-पात्र, लघु, धातु, भाव बिन पीछे रहते।
कौन समझता दर्द, सुनाकर किसको कहते॥
छि: छि: उठता प्रश्न, बने फिर कैसे लौकिक। 
भिक्षु-दान, लघु, धातु, विवाहों में क्यों 'कौशिक' ॥ 
*संजय कौशिक 'विज्ञात'*

शब्द- अर्थ 

*'जातु' अवयव* (कदाचित्) कभी 
काँसा - कनिष्ठ, भिक्षुक पात्र, धातु 
भाव- भावना/ मूल्य/ भाव (गूढ़ विचार) 
भिक्षु - भिखारी 
कनिष्ठ- लघु

चरण 11, लघु के बाद यति 
लघु का अर्थ कनिष्ठ: 
बहन के फेरों के बाद जब बहन पहली बार दुल्हन बन ससुराल जाती है तब कनिष्ठ महत्वपूर्ण हो जाता है उसे साथ भेजा जाता है।

*धातु-काँसा* लड़की के विवाह के समय दान दिया जाने वाला काँसा का बर्तन खाण्ड कटोरा कहलाता है। (इसके पीछे की परंपरा का अर्थ भिन्न भिन्न स्थान पर भिन्न हो सकता है और कुछ स्थान पर यह परंपरा हो ही ना ऐसा भी हो सकता है) उत्तर भारत में ऐसा बहुतायात देखने में आता है। जिसका अर्थ यह माना जाता है कि आज से हम दोनों परिवार इस कटोरे की तरह एक हुए और हमारे संबंध इतने ही मधुर रहेंगे जितनी इसमें देसी घी और खण्ड हैं 
प्रश्न यही कि काँसा प्रयोग मृत प्रायः हो चुका है ऐसे में इसकी शुद्धता और आवश्यकता परम्पराओं में जीवित है जहाँ काँसा का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है।

*2 भाव* 
धातु ... भाव मूल्य (सोने सी महंगी न हो)
लघु .... भाव विचार (समानता का भाव न हो)
भिक्षु .... भाव दान का (दानवीर के दान करने के  भाव न हों) 

इनके बिना पीछे रहते हैं

देखा बिकता वोट

सोमवार, 16 दिसंबर 2019

अंडा

समीक्षा मे...

_*कुण्डलियाँ*_

_*कैसी ये सरकार है,देता हाथ मड़ोड़।*_
_*पोषकता के नाम पर,गजब निकाला तोड़।।*_
_*गजब निकाला तोड़,गुरू  खिलवाते अंडा।*_
_*कह तोषन कर जोड़,नही बरसाओ डंडा।।*_
_*करते नित जो भोग,और होगी मति वैसी।*_
_*रोध करें पुर जोर,नियम है कैसी कैसी।।*_
 
_*तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा*_
_*डौंडी लोहारा बालोद छत्तीसगढ़*_

कुमकुम वेणी

●●●●●कलम की सुगंध छंदशाला●●●●●
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
            कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु
★★★★★★★★★★★★★★★★
              दिनांक - 16.12.19
★★★★★★★★★★★★★★★★
              कुण्डलियाँ (1) 
                विषय-वेणी

लाती मन मुस्कान ये,देख अजब श्रृंगार।।
वेणी है अभिन्न अंग,शोभित होती नार।
शोभित होती नार,खिले गजरा इठलाती।
मन को भाती साज,रूप यौवन मधुमाती।।
कह तोषन कविराज,शाम या पवन प्रभाती।
वेणी कैसी साज,सोच है हिय मे लाती ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★
              कुण्डलियाँ (2) 
              विषय-कुमकुम

कुमकुम से ही शान है,माने नारी आज।
शोभित नारी जिंदगी,नारी का है ताज।।
नारी का है ताज,मान है जग में पाता।
रहे सदा जो साथ,बलम से निर्मल नाता।।
कह तोषन कविराज,रहो कभी नहीं गुमसुम।
हे भारत की नार,माँथ सिरजाओ कुमकुम।।
★★★★★★★★★★★★★★★★
             रचनाकार का नाम
      तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
    डौंडी लोहारा बालोद, छत्तीसगढ़

वोट

माँगत माँगत बीतगे,मोर सुबे ले शाम।
वोट मिले मोला कहीं,कर लेहूँ आराम।।
कर लेहूँ आराम,पाँव बड़ मोर पिरागे।
खसकत हावे नोट,मोर पनही घलो घिसागे।।
मिलही कतका वोट,गुनँव मैं जागत जागत।
रेगँव खोरे खोर,वोट मै माँगत माँगत।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंडी लोहारा बालोद छत्तीसगढ़

वेणी कुमकुम


*वेणी*
अधोभाग में झूमती,पृष्ठभाग बन नाग।
वेणी तेरी हर छटा,गाती फगुवा राग।
गाती फगुवा राग,नगाड़ा हिवड़ा बाजे।
नागिन सम इठलाय,संग नित गजरा साजे।
कह तोषन कर जोरि,साध कोई नवी सधो।
नयनन भी हरषाय,देख वेणी भाग अधो।।

*कुमकुम*
कुमकुम भाग्य नार की,बाग पुष्प महकाय।
चुटकी भर सिन्दूर से,जीवन है सिरजाय।।
जीवन है सिरजाय,रही है सदा सुहागिन।
जिनके रहे न माथ,नार ये बड़ी अभागिन।।
जीवन का श्रृंगार, कभी रखे नहीं गुमसुम।
है सजनी का प्यार,जगाती भाग्य कुमकुम।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
डौंडी लोहारा बालोद छत्तीसगढ़
५:३५अपरान्ह मंगलवार १७/१२/१९

माथ पकड़ रोता रहा


*-:तोषन के दोहे पंच:-*


माथ पकड़ रोता रहा, बदरा देख किसान।

हुई मिजाई है नहीं, पड़ा धान खलिहान।।१।।


टिपटिप करती ही रही, देखो आधी रात।

बिन दुल्हा जस है लगे, बिन मौसम बरसात।।२।।


ध्यान नहीं दिन रात की , घड़ी घड़ी आँसू धार।

मन आया तो हँस लिये, ये मेघा कचनार।।३।।


पड़े समय की मार जब, मरते जात किसान।

बिन मौसम बरसात ये, कैसा ये दिनमान।।४।।


मिट्टी में है मिल गई, देखे सपने सार।

जीना मरना क्या कहें, है किसान लाचार।।५।।



तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा

डौंडी लोहारा बालोद छत्तीसगढ़

रविवार, 15 दिसंबर 2019

दान

प्रदत्त विधा:- घनाक्षरी
विषय   :- दान
दिनांक:- 15/12/19 रविवार
★★★★★★★★★★★★★★
गाथा दान के हे बड़े,छोटे बड़े सब करे,
बड़े बड़े ऋषि मुनि,करते बखान है।

दानी राजा हरिश्चंद्र,तज दिये राजपाठ,
दान का प्रमाण दिया,जाने ये जहान है।

कबूतर प्राण खातिर,राजा शिवि माँस त्यागे,
दिया सीख मानवता,गाते जो पुराण है।।

दान करो मिल सब,अर्थ कर्म ज्ञान सेवा,
महिमा दानवीरों की,सबसे महान है।
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगंइहा डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ़

समय


*सुधारोपरांत सादर समीक्षार्थ*

विधा दोहा
विषय समय
दिनांक १६/१२/१९
दिन सोमवार
★★★★★★★★★★★★★★
समय कभी रुकता नहीं,नहीं कहीं है ठौर।
गाती कोयल जान कर,झूमे अमिया बौर।।१।।

समय देख कर ही रखें ,एक एक पग फूँक।
आएगा यमराज जब,हो जाएगा मूक।।२।।

समय बड़ा बलवान है, करें समय में काम।
समय चाल को जान कर ,मत कर तू आराम।।३।।

समय एक सा है नहीं,सबको नाच नचाय।
राजा दानी कर्ण भी,इसका पार न पाय।।४।।

नहीं समय पर बस यहाँ, गर्व न कर इंसान।
मिट जानी है जिन्दगी, चलना है शमशान।।५।।
★★★★★★★★★★★★★★
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगंइहा डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ़

राम नाम

राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...