दोहे तोषण के...
रूप रंग मा का रखे,राखव मीठ जुबान।
मनखे बर उपकार हा,सबके हो पहिचान।।
बादर करिया हे ढँकत ,डेरा दुरिहा गाँव।
घुमरत गरजत देख के,कइसे गोड़ उठाँव।।
होवत अड़बड बेर हे, होगे हावय रात।
शुभ रतिहा कहिले कका,काली करबो बात।।
मोर शोर तै थोर ले, काबर गै ते भूल।
अंतस भीतर पीर हे,लागे जइसे शूल।।
चिरई करथे चाँवले, होवत बड़े बिहान।
राम राम तै बोलके,करले काम महान।।
डोंगा जइसे तन बने,चलै न बिन पतवार।
राम बसे सब जीव जी,उही लगाही पार।
*तोषण कुमार चुरेन्द्र*
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