गुरुवार, 2 जून 2016

बेदरदी संगी


सुरता तोर रे गोंदा फूल रही रही मोला सताथे।
बिरह के अइसन दुख रे बैरी नंगतेे मोला रोवाथे।
छूरा चलाए हिरदे भीतरी ले डारे तै जान मोर।
जा बैरी तीही खुश रा पूरा होवय अरमान तोर।
गुनत रहिथो रात अउ दिन कइसे भुलाए मोला।
मोर मया पीरित मा बिसवास नइ रिहिस तोला।
मांगे रेहेंव ईशवर ले तोला खाब सजाए दुसर के।
चानी चानी मोर हिरदे ल करदे तै एमा खुसर के।
बगिया मया सजाके सुघ्घर कांटा खुटी जगादे।
बीच मझधार लानके गुंइयां काबर मोला दगादे।
दिए तोर जखम बड़का नासूर बनके पिरावत हे।
तोर सुध मा जिनगी घुरहा ढेला कस सिरावत हे।
तोर खुसी ले मोर खुसी दुख दे तेला सहिगेंव।
जइसने मोर नांव "तोषण"संतोष करके रहिगेंव।
‪#‎आचार्य_तोषण‬

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