
हमर गुरू -चेला परंपरा
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अपन पुरखौती के पन्ना ल लहुटाके अगर देखथन त वहू में गुरू के महिमा के बखान करे गेहे -
"गुरूर्बह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरू:साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नम:॥
हमर समाज के संरचना में गुरू चेला के बड़ महत्व हे। गुरू के किरपा ले हमर भीतरी छिपे अंधियारा ल दूरिहा भगाथे। सोज रद्दा म रेंगाथे।गुरू ह भगवान ल पाए के रद्दा बताथे। तभे तो कबीर दास ह घलक केहे हे
"गुरू गोविन्द दोऊ खड़े काके लागू पाय।
बलिहारी गुरू आपकी गोविन्द दियो बताय।।"
पहिली जमाना म गुरूकुल के चलन रहय जिंहा राजा घर के लइका अउ गरीब घर के लइका सबझन गुरू के आसरम में रहिके ही दाई ददा के मया अउ जिनगी जिए शिकछा मिले। गुरू के आसरम म रहिके चेला ह समरसता ,आज्ञाकारिता, मितवयता,अउ नाना परकार के सदगुन ल गरहन करथे। राम चरित्र मानस म बाबा तुलसीदास जी ह घलक केहे हे-
"अनुज सखा संग भोजन करहिं।
मातु पिता आज्ञा अनुसरहिं।"
गुरू ह समझ जाय कि कोन चेला मा का गुन हे । तेकर हिसाब लेके ओला ओखर रद्दा म आघू बढाय के उदीम करथे।
सफल गुरू विही ल माने गेहे जेन हा अपन चेला ल आघू बढे बर प्रेरित करथे अऊ समय समय म रद्दा घलक बताथे।
भगवान ले ऊपर गुरू के आसन हे।सबले जादा मान सम्मान हे। एखर गरिमा ल हम सब गुरूजन अउ शिक्षक मन ला गुरु चेला के परंपरा बरकरार रखना चाही।
आचार्य तोषण
सरस्वती शिशु मंदिर
उच्च माध्यमिक विद्यालय
डौंडीलोहारा बालोद(छ. ग.)
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