गुरुवार, 2 जून 2016

दोहा

मन मलीनता धोए नहीं,पावडर रहे पोताय।
दुनिया के चकाचौंध मा, सबझन लगे मोहाय।
आज देखव जमाना ला,कोन डहर मा हे जात।
आतंकवाद नक्सलवाद मा, होवत हे रक्तपात।
दारू पियय दरूहा संगी,तिरिया लइका ह रोय।
हरताल सब दिन करय,फेर भट्ठी बंद कब होय।
नान्हे बड़े के मुंह ले ,निकलत गुंगवा के फूंक।
पाऊच खाए कचर कचर, जतर कतर दे थूक।
‪#‎आचार्य_तोषण‬
8 घंटे· सार्वजनिक अधिक पसंद करें टिप्पणी करें साझा करें Santosh Pharikarऔर3 अन्य लोगोंलोगों को यह पसंद है.
‪#‎रमेश_चौहान‬ :-तोषण भाई ये तोर कविता हा दोहा के नकल आय, थोकिन कहू मेहनत कर देबे ता ये असल के दोहा हो जही,, बस मात्रा गिने ला सीख जा, तोर मा क्षमता हे, मोला पूरा विश्वास हे तैं छंद बद्ध रचना कर सकत हस ।
मन ला तैं धोये नही, मुॅह पावडर लगाय ।
चकाचौंध ला देख के, सबो रहंय मोहाय ।।
देख जमाना आज तैं, कोन डहर हे जात ।
आतंक नक्सलवाद ले, मचे हवे उत्पात ।।
दारू पियय दरूहा मनन, तिरिया लइका रोय ।
कोनो दिन बादर रहय, भठ्ठी बंद न होय ।।
बड़े होय के छोट गा, छोड़त हावे फूॅक ।
कचर कचर पाउच गटक, कोनो कोती थॅूक ।।

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