पेंड़
बीजा के कहनी हावै अनंत
कहै सुुनै गुनै सब साधु संत
बोंवै बीजा जो खेत किसान
सेवय प्रतिदिन सांझ बिहान
चीर धरणी जे बीजा निकले
मनवा सबै खुसीया दिखले
पानी खाद संग करे सिंचाई
खरपतवार के है करे निंदाई
जतन कर कर पौधा बनाई
नाना भांति दवाई खिलाई
पेंड़ बन गया जब धीरे धीरे
तो बैठे छाँव उनके राहगीरे
सावन में जब पानी बुलावै
मेघ सो मिल झूम नाचेे गावै
लगने लगा जब उसमें फूल
लगे झूलै भँवरे झूलम झूल
फूल से फर न होवत देरी
चिरइ चिरगुन खावय हेरी
पाकल फर के पाकल बीजा
पावै अपन फेर मूल नतीजा
पेंड़ करता है सबकी भलाई
बात समझलो तुन सब भाई
ना हमसे कुछ वो बदले लेता
छाँव फल फूल सब हमें देता
उपकार बहुत वो हमपे करता
कट जाए पर आह न भरता
कर जोड़ सबसे मेरी प्रार्थना
पेंड़ कभी लगाके न काटना
एकेक पेंड़ हम सभी लगाएं
अपना भविष्य स्वयं बचाएं
🌴तोषण कुमार चुरेन्द्र🌴
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