शनिवार, 20 मई 2017

लगा

खुद पर खुद का,नहीं पहरा सा लगा
अब यादों का, जख़म गहरा सा लगा
कैसे?  तुम्हे   भुलाऊं   ओ रांझणा
मंजरे गम की , यहीं  ठहरा  सा लगा
तोषण कुमार चुरेन्द्र

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