रविवार, 7 मई 2017

चल पड़ा हूँ...

चल पड़ा हूँ उस राह मैं जहाँ किसी के पैर के निशाँ नहीं है

ढुँढ रहा हाथों मे चिराग लिये खबर मुझे है वो यहीं कहीं है

रहे धरती या आकाश में या खुशबूओं में छिपे फूलों की,

जेहन में बसी है उसकी यादें मुझको राह दिखाती सही है..

तोषण कुमार चुरेन्द्र ९६१७५८९६६७

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