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हूँ राजा मैं इस जंगल का कोई मुझे ना छेड़ना
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देता नहीं दिखाई कुछ भी आँखे नहीं तरेरना...
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आ जाते औकात पे जब अपनी भी नहीं सुनते..
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कच्चे नहीं खिलाड़ी हम सोच समझ के खेलना...
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तोषण कुमार चुरेन्द्र
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