*मजदूर*
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मैं भी तो एक मजदूर हूँ
आदत से भी मजबूर हूँ
काम के पीछे लेता दाम
इसीलिए तो मगरूर हूँ
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पंछी जो छोड़े अपना डेरा
वैसा ही होता मेरा सवेरा
खूब लगन से काम करूँ
तर हो जाता तन ये मेरा
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थका हारा घर को आता
रूखा सुखा खाना खाता
लोरी सुनाती ठंडी हवाएँ
निंदिया रानी मुझे सुलाता
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मेरी रोज की यही कहानी
भरता चलूँ मौजो में रवानी
सुनी होगी दादी के मुख से
सुन वही तोषण की जुबानी
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तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगाँव डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ
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