मंगलवार, 23 मई 2017

मजदूर

*मजदूर*

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मैं भी तो एक मजदूर हूँ

आदत से भी मजबूर हूँ

काम के पीछे लेता दाम

इसीलिए तो मगरूर हूँ

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पंछी जो छोड़े अपना डेरा

वैसा ही होता मेरा सवेरा

खूब लगन से काम करूँ

तर हो जाता तन ये मेरा

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थका हारा घर को आता

रूखा सुखा खाना खाता

लोरी सुनाती ठंडी हवाएँ

निंदिया रानी मुझे सुलाता

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मेरी रोज की यही कहानी

भरता चलूँ मौजो में रवानी

सुनी होगी दादी के मुख से

सुन वही तोषण की जुबानी

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तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगाँव डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ

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