मंगलवार, 23 मई 2017

सिक्का दस के

*सिक्का दस के*

सबला देवत हे दनादन चोट
  जबले आए दु हजार के नोट
    चिल्हर के बड़ किल्लत देखौ
        दस के सिक्का होवय खोट

जाबे बजार दु हजार धरके
  नंइ दे कोनों चिल्हर करके
    नोट भंजाय के चक्कर में
       मांगेल पड़थे पंइय्या परके

दिखय नहीं दस के सिक्का
  खोजे न मिले इक्का दुक्का
    दंग खा जथव बजार जाके
      लहुट आथंव बनके मुक्का

बात ल कोन फयलाय हे
  सबके जी सकपकाय हे
    कतको फेंकय बहिरी म
      धरके कतको लुकाय हे

बात लबारी मोला लागथे
  सब अपने अपन  हाँकथे
    सही बात जाने नहीं अउ
      दुसर के मोहाटी झाँकथे

रहेर दार हमर गलत हे
  दस के सिक्का चलत हे
    गुल्फी खाथे लइका मन
      धंधा ह फूलत फलत हे

🖋 *तोषण कुमार चुरेन्द्र*🖋

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