बिगड़े ल सुधारत नंइहे बने दिन के गोठ करथे
बेंचत हे खुदे दारू खिसा अपन पोठ करथे
बेचइय्या ल काय चिंता काकर घर के फिक्कर
पियइय्या के संगे तोषण लइका सुवारी मरथे
तोषण कुमार चुरेन्द्र
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