मंगलवार, 30 मई 2017

पानी तै पियादे

पानी तैं पियादे मोला सुन भइय्या मोर.
मिटा जाही बने बाबू पियास तइहा मोर...

बड़ धुर ले आवत हावंवमोर बेटी के गाँव ले
सुरता लेतेंव बरतरीबइठ  थोरिक छाँव में
जीवरा मोर जुड़ा जातिस माढ़े मनमोर
मिटा जाही बने बाबू  पियास तइहा मोर..

हावय बड़धुरिहा संगी मोर गाँव धनगाँव
कोयली जिंहा गावय गाना कंऊवा करे काँव
खरखरा के तीर परथे लेले थोरिक शोर
मिटा जाही बने बाबू पियास तइहा मोर....

सेवा करले पुन कमाले जिनगी के सार हे
जिनगी के नंइहे ठिकाना सार उपकार हे
काहत हावय तोषण ह बात मान मोर
मिटा जाही बने बाबू पियास तइहा मोर.....

तोषण कुमार चुरेन्द्र

इंटरनेट

महिमा इंटरनेट के,बिन एकर का होत।

का छोटे अउ का बड़े,बोझा सबके ढोत।।


ढमाया  इंटरनेट  के,सबला  नाच  नचाय।

दुनिया सब मोहाय हे,कोनों बच नइ पाय।।

सोमवार, 29 मई 2017

किसान


करजा करके खेत बर, लाने खातु किसान।

जेन जमा नँइ कर सके,फंदा  गला बिहान।।

सेवा करइया तै हरस,भुंँइया के भगवान।

भरथस सबके पेट ला,हावस तही किसान।

पानी बादर देख के,खेती करय किसान ।

आँकर सेवर जोत के, बोंथे वोहा धान।।

शनिवार, 27 मई 2017

सका...

दोषी  हूँ  दुनिया  का  सम्हल  ना  सका
मिट्टी  हूँ  दीपक  बनकर  जल ना सका
चाहत    अंधेरे    से    हटने   की   मुझे
डर था इस दिल में तोषण चल ना सका
तोषण कुमार चुरेन्द्र

मंगलवार, 23 मई 2017

सिक्का दस के

*सिक्का दस के*

सबला देवत हे दनादन चोट
  जबले आए दु हजार के नोट
    चिल्हर के बड़ किल्लत देखौ
        दस के सिक्का होवय खोट

जाबे बजार दु हजार धरके
  नंइ दे कोनों चिल्हर करके
    नोट भंजाय के चक्कर में
       मांगेल पड़थे पंइय्या परके

दिखय नहीं दस के सिक्का
  खोजे न मिले इक्का दुक्का
    दंग खा जथव बजार जाके
      लहुट आथंव बनके मुक्का

बात ल कोन फयलाय हे
  सबके जी सकपकाय हे
    कतको फेंकय बहिरी म
      धरके कतको लुकाय हे

बात लबारी मोला लागथे
  सब अपने अपन  हाँकथे
    सही बात जाने नहीं अउ
      दुसर के मोहाटी झाँकथे

रहेर दार हमर गलत हे
  दस के सिक्का चलत हे
    गुल्फी खाथे लइका मन
      धंधा ह फूलत फलत हे

🖋 *तोषण कुमार चुरेन्द्र*🖋

मजदूर

*मजदूर*

===================

मैं भी तो एक मजदूर हूँ

आदत से भी मजबूर हूँ

काम के पीछे लेता दाम

इसीलिए तो मगरूर हूँ

===================

पंछी जो छोड़े अपना डेरा

वैसा ही होता मेरा सवेरा

खूब लगन से काम करूँ

तर हो जाता तन ये मेरा

===================

थका हारा घर को आता

रूखा सुखा खाना खाता

लोरी सुनाती ठंडी हवाएँ

निंदिया रानी मुझे सुलाता

===================

मेरी रोज की यही कहानी

भरता चलूँ मौजो में रवानी

सुनी होगी दादी के मुख से

सुन वही तोषण की जुबानी

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तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगाँव डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ

सीखा

धरती से उठकर चलना सीखा
तनहाई में  खुद  ढलना सीखा
आये  ना  कोई   साथी  अपने
बदहालों  में  भी पलना सीखा
तोषण कुमार चुरेन्द्र
९६१७५८९६६७

सोमवार, 22 मई 2017

तोषण के दोहे

(१)
*प्रेम...बोल तू बोल रे , राह  रही हूँ ताक।*
*बिना प्रेम के जीवरा, देह होय रे खाक।।*

(२)
*आय जगत  तै कंगला , ढेर  दौलत  कमाय।*
*जीयत भरके तोर जी, जुच्छा जमपुर जाय।।*

(३)
*ददा कहे  बेटा मनी, बात मान ले मोर।*
*खेत खार चेतार ले, हाथ चला ते जोर।।*

(४)
*गाँव खार के खेत के , का करथस जी गोठ।*
*बोय जिहाँ कोदो तिली , बने  रहे  गा पोठ।।*

(५)
*धनिया  भाटा  खेखसी , लागे  नदिया तीर।*
*मिरचा नुनछुर डार के , केकड़ी धरके चीर ।।*

(६)
*आवत कुल्फी देखके ,  लइका लागे रोय।*
*पइसा रुपिया माँगके , आसा अपन पुरोय।।*

*तोषण कुमार चुरेन्द्र*

रविवार, 21 मई 2017

ससुर

धनी मनी मोर कका ससुर
कार्तिक राम हे सही ससुर
अपन बेटी मोला बिहा के
होगे जनम भर वो बेकसुर
तोषण कुमार चुरेन्द्र

तलब

इल्तिजा थी मेरे रब से
इंतजार है मुझे तब से
ख़्वाइश थी इंसान की
चला बसा मैं तलब से

तोषण कुमार चुरेन्द्र

पेंड़

पेंड़

बीजा के कहनी हावै अनंत
कहै सुुनै गुनै सब साधु संत

बोंवै बीजा जो खेत किसान
सेवय प्रतिदिन सांझ बिहान

चीर धरणी जे बीजा निकले
मनवा सबै  खुसीया दिखले

पानी खाद संग करे सिंचाई
खरपतवार के है करे निंदाई

जतन कर कर पौधा बनाई
नाना भांति  दवाई खिलाई

पेंड़ बन गया जब धीरे धीरे
तो बैठे छाँव उनके राहगीरे

सावन में  जब पानी बुलावै
मेघ सो मिल झूम नाचेे गावै

लगने लगा जब उसमें फूल
लगे झूलै भँवरे झूलम झूल

फूल से फर न होवत देरी
चिरइ चिरगुन खावय हेरी

पाकल फर के पाकल बीजा
पावै अपन फेर मूल नतीजा

पेंड़ करता है सबकी भलाई
बात समझलो तुन सब भाई

ना हमसे कुछ वो बदले लेता
छाँव फल फूल सब हमें देता

उपकार बहुत वो हमपे करता
कट जाए  पर  आह न भरता

कर जोड़ सबसे मेरी प्रार्थना
पेंड़ कभी लगाके न काटना

एकेक पेंड़ हम सभी लगाएं
अपना भविष्य स्वयं बचाएं

🌴तोषण कुमार चुरेन्द्र🌴

चाटुकार

साधे बर अपन काम  लबर लबर गोठियात देखेहंव
जगा खुद बनाय बर पाछू पाछू पूछी हलात देखेहंव
कथे सियान सिरतो जी  ऊपर राम तरी कसई कस
पाके मउका पीठ पाछू  कटारी जोर घुंसात देखेहंव
तोषण कुमार चुरेन्द्र ९६१७५८९६६७

पेंड़

पेंड़

बीजा के कहनी हावै अनंत
कहै सुुनै गुनै सब साधु संत

बोंवै बीजा जो खेत किसान
सेवय प्रतिदिन सांझ बिहान

चीर धरणी जे बीजा निकले
मनवा सबै  खुसीया दिखले

पानी खाद संग करे सिंचाई
खरपतवार के है करे निंदाई

जतन कर कर पौधा बनाई
नाना भांति  दवाई खिलाई

पेंड़ बन गया जब धीरे धीरे
तो बैठे छाँव उनके राहगीरे

सावन में  जब पानी बुलावै
मेघ सो मिल झूम नाचेे गावै

लगने लगा जब उसमें फूल
लगे झूलै भँवरे झूलम झूल

फूल से फर न होवत देरी
चिरइ चिरगुन खावय हेरी

पाकल फर के पाकल बीजा
पावै अपन फेर मूल नतीजा

पेंड़ करता है सबकी भलाई
बात समझलो तुन सब भाई

ना हमसे कुछ वो बदले लेता
छाँव फल फूल सब हमें देता

उपकार बहुत वो हमपे करता
कट जाए  पर  आह न भरता

कर जोड़ सबसे मेरी प्रार्थना
पेंड़ कभी लगाके न काटना

एकेक पेंड़ हम सभी लगाएं
अपना भविष्य स्वयं बचाएं

🌴तोषण कुमार चुरेन्द्र🌴

भारतीय

अहं है मुझे भारतीय होने का
भारत के लिये तन खोने का
तुम क्या जानो जीना क्या है
मर कर धरती पर सोने का
तोषण कुमार चुरेन्द्र

जलन

किसी ने कहा हमसे तोषण क्यों हरकत ऐसी करते हो
कहा हमने सच ही तो बोला है भला तुम क्यो जलते हो
तोषण कुमार चुरेन्द्र

मयखाना

सुप्रभातम्
शुरुवात
सुरा के साथ

*गर शराब मिटाता दिल के सारे गम*
*तो मेरी दुनिया इतनी गमगीन न होती*

त़ोषण कुमार चुरेन्द्र:

आबाद होता देखा नहीं हमने किसी को जमाने में
सवेरे से जाकर जो डुबे रहते हम हैं बुरे मयखाने में

हंसऊला

गरमी के दिन रहय
संगवारी घर मंझनिया बइठे बर गेंव

संगवारी ह अपन टुरा रामु ल कथे जा बेटा
*कोको* लाबे

मेह अलकरहाच खुस होगेंव आज संगवारी घर *कोको* खाय बर मिलही

रामु *कोको* धरके अइस

मेह सन्न खाके पटवा म गिर गेंव

मेह समझत रेहेंव दुसरा *कोको*
ले अइस दुसरा *कोको*



का समझे........ 


*कोको* मतलब

*कोका*
*कोला*
🤣🤣🤣🤣🤣😜🤓😅😆😁

शनिवार, 20 मई 2017

लगा

खुद पर खुद का,नहीं पहरा सा लगा
अब यादों का, जख़म गहरा सा लगा
कैसे?  तुम्हे   भुलाऊं   ओ रांझणा
मंजरे गम की , यहीं  ठहरा  सा लगा
तोषण कुमार चुरेन्द्र

शुक्रवार, 19 मई 2017

हसऊला

क्या जमाना हैं

मुद्दतों बाद खुदा ने हमसे पूछा-बेटा !

जमीं पे आके कर क्या रहे हो ?

हमने कहा -या खुदाया ! जो आप

करते हैं ऊपर से .....

वही कर रहे हैं हम नीचे से ...

भला क्या?खुदा ने हमसे पूछा।

हमने कहा- जहाँ के लोगों को देखने का........

तोषण कुमार चुरेन्द्र

कवि

सुरु जेन हंसाथे कका
रोवाय बर तइयार रथे
रोके खुदे हंसाथे सबला
विहील संगी कवि कथे

जनऊला

*जनऊला*

*(१)*

*आघू कटे नस बने,पाछू कटे बने मुड़ी...*
*बीच कटे सगा बने,बताबे मिलही पुड़ी...*

*(२)*

*आघू हटे झुंड बने,पाछू हटे त पाछू...*
*बीच हटे चुँदी बने,बताबे उत्तर धाँसू...*

*(३)*

*आघू निकले जंगल बने,पाछू निकले बने हाँ ...*
*बीच निकले मार बने,खोजो उत्तर यहाँ वहाँ...*

*(४)*

*आघू बरगे होगे हरा, पाछू बरगे  चाह भरा...*
*बीच बरगे सावन सुरता,उत्तर देदे तेहा जरा...*

*उत्तर.१.सरग.२.बादल.३.हवन.४.मोहरा.*

// *तोषण कुमार चुरेन्द्र*//

बोर..

सब रहते हैं मदमस्त अपने में
किसी की यहाँ कोई शोर नहीं
जा रहा हूँ...सब छोड़ के यारों
हो न जाऊँ  भीड़ मे बोर कहीं
तोषण कुमार चुरेन्द्र

नवा जमाना

*नवा जमाना*

कुकरा के जगा आज देखले
चरबज्जी अलारम बाजथे
सील बाहरी अब घलो नंदागे
प्लास्टिक बाहरीम बुहारथे
पींवरी सुही मा घर चमके जी
आगे चिक्कन पंढ़री चुना देख
भाजी पहिली डबका खावन
जेला तेल संन भुंजथे बघारथे

तोषण कुमार चुरेन्द्र

काया...

सच अउ झूठ के माया हे
अंधियारी मन के छाया हे
देखले बने जाके बिडियो
कृष३ में काल के काया हे

धरम करम

करम करत उमर पहागे करिया चुँदी होगे सफेद
धरम करत जीवन बीते बदरा गोठ ओती खेद
देखाय खाय के दांत ल एक्के बरोबर तै जतन
पुन के गघरी तभे भरही जब पेंदी नंइ रही छेद

मया

तोर मोर  बंधना  मया के  छुटे ना संसार म
झन होय कभू कमी जोही तोर मोर प्यार म
हवय  गजब  अगोरा  मोर हिरदे  के भीतरी
बइठे  गुनंव  तोला  नदिया  नरवा कछार म
// *तोषण कुमार चुरेन्द्र* //९६१७५८९६६७//

गुरुवार, 18 मई 2017

राजा

🦁🦁🦁🦁🦁🦁🦁🦁🦁🦁🦁
हूँ राजा मैं इस जंगल का कोई मुझे ना छेड़ना
😎😎😎😎😎😎😎😎😎😎😎
देता नहीं दिखाई कुछ भी आँखे नहीं तरेरना...
💪💪💪💪💪💪💪💪💪💪💪
आ जाते औकात पे जब अपनी भी नहीं सुनते..
🏑🏑🏑🏑🏑🏑🏑🏑🏑🏑🏑
कच्चे नहीं खिलाड़ी हम सोच समझ के खेलना...
🖌🖌🖌🖌🖌🖌🖌🖌🖌🖌🖌

तोषण कुमार चुरेन्द्र

कविता


कलम के सियाही कभू सिराय नहीं...
हमर मनवा के कविता नंदाय नहीं...
खुसी खुसी शुभकामना भेजत हवन
कतको बांधव मैंहा पार बंधाय नहीं
तोषण कुमार चुरेन्द्र

माँ

देखता जब तस्वीर आपकी

आँसू...आँख से आ जाती है

हाथ..थाम संग चलना सीखा

ओ *माँ*...बहुत याद आती है

___🖋तोषण कुमार चुरेन्द्र

देस के खातिर जीबो...

*देस के खातिर जीबो*
===================
कहिथे मन संगवारी मोरो
देस के खातिर जीबो...
अवघड़िया शंखर जइसन
हलहल जहर पीबो...
===================
दाई ह राखे नव महीना ले
कोख म अपन पोटार के
जनम से लेके मरनी तक
धरती ह रखे हे सँवार के
छाती ले बोहे बनके गोरस
अमरित पानी पीबो....
कहिथे मन संगवारी मोरो
देस के खातिर जीबो...
अवघड़िया शंखर जइसन
हलहल जहर पीबो...१
===================
खेले जिंहाँ राणा शिवा
हमुला आथे मरेबर इंहाँ
लछमी तात्या के रनांगन
पांडव जीते युद्ध जिंहाँ
भगत अजाद सुखदेव सही
हमुहा मरके जीबो...
कहिथे मन संगवारी मोरो
देस के खातिर जीबो...
अवघड़िया शंखर जइसन
हलहल जहर पीबो...२
===================
कसम लाल बाल पाल के
अब बैरी ल धुर्रा चटाइंगे
आगुम आही बैरी दुसमन
राखर म ओला मिलाइंगे
भरके बोरा धरके सुंतरी
सुजा म जमके सीबो....
कहिथे मन संगवारी मोरो
देस के खातिर जीबो...
अवघड़िया शंखर जइसन
हलहल जहर पीबो...३
===================
आतंकी नक्सली के कारन
लाख बिपत ल सहत हवन
कब जागही भाग हमर जी
गोठ अतरी भर कहत हवन
बरा चुरोय म कहीं नी होवय
नास बर एकर भीड़बो...
कहिथे मन संगवारी मोरो
देस के खातिर जीबो...
अवघड़िया शंखर जइसन
हलहल जहर पीबो...४
===================
*तोषण कुमार चुरेन्द्र*
*धनगाँव डौंडी लोहारा*
===================
arhkepagakalagi.blogspot.com

बेटी

*बेटी*

*बेटी हंव  छत्तीसगढ के*
*जग म  अलख  जगाहूँ*
*दाई ददा के देखे सपना*
*एक  दिन मैं  सिरजाहूँ*

*गरब करही मोर देस जब*
*स्व देस खातिर मर जाहूँ*
*आगु आही जेन बैरी मोर*
*मैं सोजहे पताल पहुचाहूँ*

*रोथे जेन हर बेटी जनम म*
*ओ दाई ददा ल धिक्कार हे*
*बेटा बरोबर राखव महूँ ला*
*जीए  के मोरो अधिकार हे*

*बेटा बनाथे ददा ल भिखारी*
*बेटी ह बनाथे महादानी गा*
*बात अगर ते समज जबे त*
*कहिलाबे मुनि तै ग्यानी गा*

*बेटी मैं तारौं दुठन कुल ला*
*बगिया कस घर संसार गा*
*ददा दाई के बड़ मया पाथों*
*ससुर सास के दुलार गा*

*मैं बेटी अंव रुप अब्बड़ हे*
*दाई भौजी  देरानी  काकी*
*मोसी फुफु दीदी कस मैंहा*
*बहिनी बनके बाँधव राखी*

*बेटा बेटी हे एक समान गा*
*झन पालव गा मन में भरम*
*बेटी बचाना हे बेटी पढ़ाना*
*सबके बने इही धरम करम*

©®
*तोषण कुमार चुरेन्द्र*

सोमवार, 8 मई 2017

मानवता

मानवता के मन मन्दिर में
  ज्योति जला दिव्य ग्यान की
    आन  पड़ी है  आज जरूरत
      मानवता   की   पहचान  की
       आडम्बर  के  पहने चोले सब
         भ्रमण  कर  रहें  हैं  लोग यहाँ
           गुंजन होनी  चाहिए  भूमि पर
             श्री कृष्ण के गीता बखान की

तोषण कुमार चुरेन्द्र

सीख

💐💐💐💐💐💐💐
बढ़िहा बढ़िहा सीख हे ,देवत सबला ग्यान .
💐💐💐💐💐💐💐
आवव सबला सीख के ,करबो एखर मान...
💐💐💐💐💐💐💐

दारू

बिगड़े ल सुधारत नंइहे बने दिन के गोठ करथे
बेंचत हे खुदे दारू खिसा अपन पोठ करथे
बेचइय्या ल काय चिंता काकर घर के फिक्कर
पियइय्या के संगे तोषण लइका सुवारी मरथे
तोषण कुमार चुरेन्द्र

रविवार, 7 मई 2017

फना

फऩा होने चला हूँ आज फिर माँ के कदमों तले
होगी रहमत खुदा की फिर आऊंगा माँ की गोद में
तोषण कुमार चुरेन्द्र

रूख़सत...

हो जाऊँ जो रूखसत तेरी दुनियाँ से "तोषण"
गुजारिश़ है समेट लेना अपनी यादों के पन्नों में
तोषण कुमार चुरेन्द्र

चल पड़ा हूँ...

चल पड़ा हूँ उस राह मैं जहाँ किसी के पैर के निशाँ नहीं है

ढुँढ रहा हाथों मे चिराग लिये खबर मुझे है वो यहीं कहीं है

रहे धरती या आकाश में या खुशबूओं में छिपे फूलों की,

जेहन में बसी है उसकी यादें मुझको राह दिखाती सही है..

तोषण कुमार चुरेन्द्र ९६१७५८९६६७

बुधवार, 3 मई 2017

हरदी के रंग

दुलहिन के  अंग-अंग रंगत हे कांचा हरदी के रंग
भंवरा के जाही पिया घर छोंड़ सब सखी के संग
सपना...सजावत आँखी म पुलकावत हे तन-मन
दाई ददा ल...छोंड़े के दुख पिया मिलन के उमंग

तोषण कुमार चुरेन्द्र

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

मरना होगा

जिंदा गर रहना है साहब तो मरना होगा"
याद करें दुनिया ऐसा कुछ करना होगा"
महान होता नहीं कोई यूँ ही जहान में"
महानता पाने काज महान करना होगा"
तोषण कुमार तोषण कुमार चुरेन्द्र

फना...

फना... होने चले हम....उनके प्यार पर
मजाक...ना उड़ाना कभी..इस हार पर
दो साहिलों को...जोड़ा है. हमने तोषण
दूर जो रहे जमाने से कभी मझधार पर
तोषण कुमार चुरेन्द्र

कविता

निकल  धरिणी के गर्भ से  बन सरिता वो बहती है ।
कलकल छलछल करती हुई वअग्रसर वो रहती है ।
गहन तिमिर से मुझे निकालो दुनियाँ के गुलजार में ,
अंतर्निहित दबी  प्रतिभा मेरी  कविता वो कहती है ।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र  ९६१७५८९६६७

तड़प रही है

तड़प रही है कब से देखो मेरी हाथ तलवार लिये
छोड़ूं ना अब नक्सलियों को तीव्र ललकार लिये
बहुत हो चुका अत्याचार अब नामुराद दरिंदों का
छत्तीसगढ का मै लाल बरसूँगा बस फुंकार लिये
तोषण कुमार चुरेन्द्र

करले जोरा

कोसिस कर गढ़ना गढ़़ हमु मनला बढ़ा तंहूँ बढ़
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करले  जोरा  जाय के, भजले तैहा राम।
काया माया सब रही, पाले तै विसराम।।
@@@@@@@@@@@@@@@@@
ध्येय सबन के एक हो, पावव सबले ग्यान।
ग्यान बटत हे रोज के,आवव करलव पान ।।
#########################
तोषण कुमार चुरेन्द्र

नहीं जानते

नहीं जानते दुनिया वाले हमें कसूर हमारा नहीं है
नही है कोई गम जो नाम सूची मे हमारा नहीं है
दिया है जीवन हमे रब ने बड़े नसीबों से तोषण
देश पे मिटना भला किसको जहाँ में प्यारा नहीं है
तोषण कुमार चुरेन्द्र

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

महतारी के पतिया

छत्तीसगढ के जम्मो लइका सियान
जवान ल
*छत्तीसगढ महतारी के पतिया*
💐💐💐💐💐💐
कका रचना मोरो पढ़ लेतेव
बिचार थोरिकिन  कर लेतेव
👏👏👏👏👏👏
दाई के गोदी म बेटा मरत हे
कलहर  के  गोहार  करत हे
😭😭😭😭😭😭
सुन छत्तीसगढिहा बेटा मोर
करव  नही गा  काबर  शोर
😳😳😳😳😳😳
देखत रहू कब तक अइसने
पहिली ले वइसनेके वइसने
🤺🤺🤺🤺🤺🤺
नक्सली ल जो धुर्रा चटावव
मोर दुध के करजा चुकावव
🏋‍♀🏋‍♀🏋‍♀🏋‍♀🏋‍♀🏋‍♀
जेन असल हे मोर औलाद रे
बनके बरस तै जा फौलाद रे
🤺🤺🤺🤺🤺🤺
लेना हे सबके इंतकाम तोला
दे बैरी के मुड़ी काटके मोला
⚔⚔⚔⚔⚔⚔
मरना हे तोला सौ ल मार के
छत्तीसगढ ला बने संवार के
🖋🖋🖋🖋🖋🖋
तोषण कुमार चुरेन्द्र
९६१७५८९६६७

रविवार, 23 अप्रैल 2017

बेटी

एक दिन मोर अंगना म किलकारी मारत ,चिरइ सही चहकत ,कोयली बरोबर कुहुकत,मोर बेटी ह खुशी के पेटारा धरके अइस ,जेकर गोड़ के माड़त मोर घर म दुख दरिदरी बिपत्ति जतिक रिहिस सब ह हवा के बड़ोड़ा सही उड़ागे,काबर सियान मन कथे बेटी ह साकछात माता लछमी के सरुप हरे ओकर घर म आय से घर के आव भाव बदल जथे वइसने मोरो बदल गे। तितली बरोबर एती ले ओती घर के चारो कोती गिंजरे ।हंसी ठिठोली करत अपन तोतरी भाखा म मोला जब ददा कहे। त मोर अंतस ल अजब सकुन मिले करेजा ल ठंडक मिले।जेन बेटी ह पेट के बल घसलत माड़ी के सहारा मड़ीयात ठुमुक ठुमुक रेगत कइसे बड़े होगे ,दिन कइसे निकलिस पताच निचलिस ।आज मोला बड़ दुख होवत जेन बेटी ल ननपन ले पालत पोसत बड़े करेंव आज उही अपन करेजा के टुकड़ा ल अपन तन ले अलग करके ओला अपन लेे कोस दुरिहा दुसर के डेहरी म बिदा करत हंव। अब कोन मोला चाय पानी बासी पेज बर हांक पार ही---

"आ ददा एदे चाय ,एदे पानी ,एदे बासी।"

तोषण कुमार चुरेन्द्र

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

गंगा मंइय्या

तोर मया के बरसा दाई झुमर झुमर के बरसय।
आस पूरो सबके माता झन कोन्हो ह तरसय।।
जल भीतरी ले जनम धरे गंगा मंइया कहाय।
नर नारी सब भक्तन मन के आस ल तै पुराय।।

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

मया के चिनहा

तोर मया के चिनहा ल
राखे रहूं सजाके।
मोर हिरदे के कुरिया म
ठोहूं तारा लगाके।

अगोरा म तोर बइठे हावंव
रद्दा म नैना गड़ाके।
कतिक दिन ले देखहूं मैंहा
लहूं चूरी पहिराके।।

मोर मया के कुरिया ल
कब तै अंजोर करबे।
बिन रंग मोर दुनिया ल
कब सतरंगी रंग भरबे।।

मोरो सुध तै लेले पगली
बइहा बरन मोर हाल हे।
बिन तोर जिनगी बिताना
मोर जी के जंजाल हे।

मया के चिनहा देके तैहा
जादा काबर तड़पात हस।
अंगना मोर आहूं कहिके
काबर टुंहू देखात हस।।

मर जहूं तोर सुधरई मा
जादा झन बेकरार कर।
कर मोर संग बिहाव पगली
जिनगी के मोर उद्धार कर।।

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

तलबगार

टुटे दिल का कोई खरीद दार नहीं होता

आँखों में नमी ,इश़्के  गुलज़ार नही होता

होती है तन्हाई का मंजर और यादों का समंदर

चाह रह जाती अधूरी कोई तलबगार नहीं होता

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

किसको

दिल के हालात कहो सुनाऊं किसको
विरह की वेदना दिखाऊं किसको
ये जो शहर हैं वो मुर्दों का "तोषण"
दिन के उजालो में भला जगाऊं किसको..

तन्हाई

मेरी तन्हाई को देखकर हंस रही थी वो इस कदर

आँसू पोछने भी नहीं आई कमबख़्त अकेला जानकर....

दिल

पी लेता हूँ शराब
जाकर मयखाने में

उनकी यादों को
दिल से मिटाने को

कमबख़्त है उनकी यादें
मिटी नहीं इस दिल से

याद मिटाते इक दिन ये
कमज़र्फ दिल ही मिट गया....

बिहाव

का बतांव साहब

बर बिहाव के सिजन चलत हे
बाजा घलक नंगतेहे ददकत हे
इंकर बाजा गाजा चक्कर मजी
का बताव नींद घलो नंइ परत हे

फना

लग गई नजर किसकी,बसंत बहार पर/
गुल नहीं कंटक खिलती,अब गुलजार पर/
बंद करें युद्ध लड़ना,अमन रहे जमीं
कर फना जनम अपना,पुनित संसार  पर

तोषण कुमार चुरेन्द्र

दिल

भूले तो जाते उसे है जो दिमाग में रहते है
आप तो वो शख़्स है हमारे दिल में रहते है

पैमाने में

जिंदगी बीत गई मयखानें में
कोई बदलाव न आया जमाने में
बची है ही नहीं अब जिस्मो जान में
रोज पीते हे लहू पर लहू को पैमाने मे

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

लेने के देने की

#लेने के #देने की

खा-खाकर ठोकरें बड़ा हुआ हूँ

आदत नही मेरी ठोकर देने की,

फूल बरसा ,काँटें बिछा राहों पर

नसीब समझ आदत है लेने की,

मिलेगा यहीं कहीं जाएगा नहीं

करदे भले देरी रब मुझे देने की,,

बाज़ न आऊँ आदत से अपनी

चाहे पड़ जाए लेने के देने की,,

तोषण कुमार चुरेन्द्र
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सोमवार, 3 अप्रैल 2017

बाटल अदधी अउ चपटी म

घुमेबर चलदेंव मेंह एकदिन गउ दारु भट्ठी म
का मोहनी डराय रथे बाटल अदधी अउ चपटी म

देखेव जाके जब अनर बनर
पियत बइठे सब जतर कतर
चांटत रहे नुन पीये के हे धुन
चाबवत चना ल कटर कटर

चलायके नंइहे सकति फेर चड़के जावै फटफट्टी म
का मोहनी डराय रथे बाटल अदधी अउ चपटी म

सुआरी लइका के मोह नंइहे
दानापानी के थोर संसो नंइहे
लगेहे लत इंहां पियकड़ु के
कोनों चाहे अब कहीं कइहे

पीयेबर पइसा निही त पइसा भिड़ाय चोरकट्टी म
का मोहनी डराय रथे बाटल अदधी अउ चपटी म

हर पियकड़ु जेब म अधार धरथे
पइसा नी रही जोगड़ कोनो करथे
संगवारी खोजथे पियकड़ु अपन
जीते जीयत पीही पीते पीयत मरथे

अलप समय पियइया ल जात देखेव मरघट्टी म
का मोहनी डराय रथे बाटल अदधी चपटी म

तोषण कुमार चुरेन्द्र
९६१७५८९६६७
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शुक्रवार, 31 मार्च 2017

राम राम...

राम राम जी संगीं हो,लेव राम के नांव..
काज बने गा भोर के,महूं परत हंव पांव...

हांथ जोड़ के विनय हे ,धरंव चरन मा सीस..
मोर सदा मन लगे रत,परम पिता जगदीस...

तोषण कुमार चुरेन्द्र

सीख


पाके  तोरे  सीख  ला, देहुं  सदा  मैं ध्यान.
करहुं  निरंतर  चेष्टा,  लेहुं  मरत  ले  ग्यान..
लेहुं मरत ले ग्यान, भूल ही  नही जियत ले.
हावंव मतिमंद सखा,पड़े जी नीर पियत ले..
सुन  तोषण के बात, रचे छंद ग्यान बुझाके.
गलती  होही   सही,  सीख  ला  तोरे  पाके..
तोषण कुमार चुरेन्द्र

दीनानाथ...

मेरा आशीर्वाद सदा तेरे साथ है
कर्म करना ही सदा तेरे हाथ है
मिलता वही रहता जो नसीब में
हरने वाला दुख वो दीना नाथ है
तोषण कुमार चुरेन्द्र ९६१७५८९६६७

गुरुवार, 30 मार्च 2017

नवदिन राती

मोर शीतला के दरबार में बरे जोत दिन राती
सरधा के करसा मड़ाएंव भक्ति जलाएंव बाती
कोनों मनावय जात्रा करके उंनडत जावय कोनों
सेवा बजावंव माता के मैं जागंव नवदिन राती
तोषण कुमार चुरेन्द्र ९६१७५८९६६७

नवदिन राती

मोर शीतला के दरबार में बरे जोत दिन राती
सरधा के करसा मड़ाएंव भक्ति जलाएंव बाती
कोनों मनावय जात्रा करके उंनडत जावय कोनों
सेवा बजावंव माता के मैं जागंव नवदिन राती
तोषण कुमार चुरेन्द्र ९६१७५८९६६७

आपको...

आपसे ही पाया हमने दे रहे हैं आपको
नही कुछ है पास जो दे सके हैं आपको
यादें सिर्फ है पास मेरे उन बीते लम्हो की
आते हैं याद आप याद मैं आऊँ आपको

तोषण कुमार चुरेन्द्र

मोहब्बत...

सिला  भी  हमें  अज़ीब मिला  तेरी मोहब्बत का
दागदार नही हम लगाओ न इल्ज़ाम तोहम्मत का
गुनाह किये  जो तुमसे  इकरार कर बैठे "तोषण"
होठों पे आता नहीं अब नाम कभी  मोहब्बत का
तोषण कुमार चुरेन्द्र

बुधवार, 29 मार्च 2017

छत्तीसगढ मोर मान रे...

छत्तीसढ़ मोर मान रे..

मैं टुरा छत्तीसगढिहा छत्तीसगढ मोर मान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

कोरा जेखर खेलेंव कुदेव छंइहा जेखर बाढेंव
गाएंव गाना पारेंव हाना कोयली कुहूकी पारेंव
हरियर हरियर दाई के अचरा सोनहा कस धान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

चंदर पुरहिन बिलई माई डोंगड़गढ़ बमलाई
रतनपुरहिन माहामाई संबलपुर समलाई
दंतेवड़हिन दंतेसिरी जग बढावय मान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

बीर नरायेन के जनमभूमि श्रृंगी  के गाँव हे
भगत माता कर्मा जिंहाव शबरी के ठाँव हे
बरसे नवधा भक्ति जिंहा राम करथे बखान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

भेलई कोरबा दल्ली राजहरा  सबके आस पुरोवत हे
देस परदेस ल भाईचारा म तार ले तार जुड़ोंवत हे
अमर होगे मैतरी गार्डन भारत बधिन मितान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

जेकर कोरा उपजत हावय हीरा मोती पन्ना
चना राहेर कोदो तिली भर्री जागेहे गन्ना
दुनिया भर होवत हावय मोर छत्तीसगढ के मान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

बोलव सुनव गावव बजावव छत्तीसगढिही बोली
मया पीरीत के घोरे सरबत करव हँसी ठिठोली
हाँथ जोड़के "तोषण" घलो सुनावत हे तान रे
एखर खातिर मोर संगी दे देहूं जान रे

रचना:-
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगाँव डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ
४९१७७१
मो.९६१७५८९६६७
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राम नाम

राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...