******सत्संगति******
संत मन के संगति करइ हा ही सत्संगति कहलाथे । ए संसार मा जइसने ढंग ले सज्जन पुरुष हे वइसने दुरजन घलो हे। वइसे संत मन कथे पहिली जनम के करम धरम ले गुन अउ दोस हा आथे। मनखे के नवा जनम मा कोई मनखे हा जनम लेत दुरजन नी राहय ।ओहा जइसने संगति करथे वो हा वइसने बन जाथे। अदि सज्जन के संग करथे त सज्जन अउ दुरजन के संग करथे त दुरजन ।
सतसंग करेले मनखे के मन मा नवा नवा सदगुन के जनम होथे। नवा नवा बात सीखे ल मिलथे। सच घलो केहे गेहे सत्संगति हा मुक्ति पाए के निसैनी आए।
संत मन बढिहा एक ठन कथा कथे । एक झन शिकारी ह दु ठन मिठ्ठू लाथे। एक ठन ला चोर ले जथे अउ एक ठन ला साधु पुरुष हा। बेरा ह निकलत जथे। चोर के मिठ्ठू चोरहा भाखा अउ साधु पुरुष के मिठ्ठू सत्संग के भाखा सिखथे। अरथात केहे के तात्पर्य हे कि हम सब ला संत मन के संग करना चहिये।
"बिनु सत्संग बिवेक न होइ।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोइ।।"
-सअभार :कक्षा ७वी के पाठ १३ "सत्संगति" के छत्तीसगढ़ी रूपान्तर।।
अनुवादक: आचार्य तोषण
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टीप: भाखा लेखनी में त्रुटि हुई होगी तो सादर क्षमा याचना।।
संत मन के संगति करइ हा ही सत्संगति कहलाथे । ए संसार मा जइसने ढंग ले सज्जन पुरुष हे वइसने दुरजन घलो हे। वइसे संत मन कथे पहिली जनम के करम धरम ले गुन अउ दोस हा आथे। मनखे के नवा जनम मा कोई मनखे हा जनम लेत दुरजन नी राहय ।ओहा जइसने संगति करथे वो हा वइसने बन जाथे। अदि सज्जन के संग करथे त सज्जन अउ दुरजन के संग करथे त दुरजन ।
सतसंग करेले मनखे के मन मा नवा नवा सदगुन के जनम होथे। नवा नवा बात सीखे ल मिलथे। सच घलो केहे गेहे सत्संगति हा मुक्ति पाए के निसैनी आए।
संत मन बढिहा एक ठन कथा कथे । एक झन शिकारी ह दु ठन मिठ्ठू लाथे। एक ठन ला चोर ले जथे अउ एक ठन ला साधु पुरुष हा। बेरा ह निकलत जथे। चोर के मिठ्ठू चोरहा भाखा अउ साधु पुरुष के मिठ्ठू सत्संग के भाखा सिखथे। अरथात केहे के तात्पर्य हे कि हम सब ला संत मन के संग करना चहिये।
"बिनु सत्संग बिवेक न होइ।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोइ।।"
-सअभार :कक्षा ७वी के पाठ १३ "सत्संगति" के छत्तीसगढ़ी रूपान्तर।।
अनुवादक: आचार्य तोषण
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टीप: भाखा लेखनी में त्रुटि हुई होगी तो सादर क्षमा याचना।।
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