गुरुवार, 7 जुलाई 2016

॥चिरई के दरद दुख॥

छत्तीसगढ़ी मंच द्वारा महीने के दोनो पखवाडे मे आयोजित छत्तीसगढ़ के पागा कलगी
क्र.१२ बर चित्र अधारित
मोर प्रयास से रचना
॥चिरई के दरद दुख॥
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चिरई कहिथे मनखे ला
झन काटव गा रूख ला
का तुंहर ले देखे नी जाय
हमर मन के दरद दुख ला
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सुवारथ बर अपन तैहर
जंगल ला उजारत हस
रूख राई म बसे चिरई
जिते जियत तै माराथस
देवतहस हमला दुख त
कहां ले पाबे तै सुख ला
का तुंहर ले देखे नी जाय
हमर मन के दरद दुख ला
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तहूं जीव तइसने हमूं जीव
सबला गढ़य भगवान गा
नइ बन सकस इंसान त
झन बन तै शैतान गा
पाप करेबर छोड़ दे तै
यमराज देखही तोर मुख ला
का तुंहर ले देखे नी जाय
हमर मन के दरद दुख ला
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चिरई कहिथे सुनरे मनखे
जिए के हमला अधिकार हे
जंगल झाड़ी के दाना पानी
इही मा हमर संसार हे
सच्चा मनखे विही हरे
समझे सबके सुख दुख ला
का तुंहर ले देखे नी जाय
हमर मन के दरद दुख ला
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आचार्य तोषण
धनगांव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़
इही कविता म मोला तीसरा स्थान मिले हे
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मोला तो यकीन नी होत हे कि मोरो रचना ह पागा कलगी बारह म जगा बनाए हे
एखर बर छत्तीसगढ़ी मंच निर्णायक संचालक अऊ जम्मो सदस्य मन ला सादर धन्यवाद हे
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