शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

जुबां से चाहकर

जुबां से चाहकर कुछ कहे न कहे संगदिल
निगाहें तेरी हाल-ए-दिल बयां कर देती है.
मुरीद हूं तेरी मदभरी अदाओं का जालीम
रूह के इक कोने में मेरी घर कर देती है.
तेरे हुस्ने आफताब की क्या तारीफ करू
 रश्मियों की बारिश में खुद संवर लेती है .
हो अंधेरी रात अगर तो मुझे शिकवा नहीं
बन उजाला राह मेरी शम्मा बिखर लेती है
सिहर जाऊं अगर तन्हा रातो में "तोषण"
आगोश में तेरी यादें मुझको भर लेती है.
 #आचार्य_तोषण

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

राम नाम

राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...